भोपाल। मध्यप्रदेश के अस्पतालों में अब मरीजों को केवल न्यूक्लिक एसिड टेस्ट (NAT) से जांचा गया रक्त ही उपलब्ध कराया जाएगा। स्वास्थ्य विभाग ने यह बड़ा फैसला दिसंबर में सतना जिला अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित चार बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने की घटना के बाद लिया है। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में चरणबद्ध तरीके से यह नई व्यवस्था लागू की जा रही है। इंदौर और भोपाल के शासकीय मेडिकल कॉलेजों में पहले से NAT मशीनें स्थापित हैं, जबकि अब सभी संभागीय मुख्यालयों में इनकी स्थापना की तैयारी की जा रही है।
संभागीय मुख्यालयों में लगेंगी NAT मशीनें
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, NAT मशीनें सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अधिक रक्त संग्रहण वाले जिला अस्पतालों में लगाई जाएंगी। यहां जांचा गया रक्त अन्य अस्पतालों के ब्लड बैंकों तक भेजा जाएगा। मशीनों की स्थापना निजी कंपनियों के माध्यम से की जाएगी और उन्हें प्रति टेस्ट के हिसाब से भुगतान किया जाएगा। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि जिला अस्पतालों में सभी ब्लड ग्रुप का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहे, ताकि आपात स्थिति में बिना जांचे रक्त चढ़ाने की नौबत न आए।
पांच बीमारियों की होगी सूक्ष्म जांच
रक्तदान से प्राप्त ब्लड में एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी, मलेरिया और वीडीआरएल (यौन संचारित रोग) सहित पांच प्रमुख बीमारियों की जांच की जाती है।
अब तक कई जगह एचआईवी की जांच रैपिड किट या एक्लिया टेस्ट से की जाती थी। लेकिन NAT तकनीक से संक्रमण का पता अधिक सटीकता से लगाया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि एचआईवी का विंडो पीरियड घटकर लगभग 15 दिन रह जाता है, जिससे संक्रमण की शुरुआती अवस्था में ही पहचान संभव हो सकेगी।
क्या है विंडो पीरियड?
विंडो पीरियड वह अवधि होती है, जब शरीर में संक्रमण के विरुद्ध एंटीबॉडी विकसित नहीं हुई होतीं, इसलिए सामान्य जांच में बीमारी पकड़ में नहीं आती। NAT तकनीक इस अवधि को काफी कम कर देती है, जिससे संक्रमित रक्त चढ़ने का जोखिम घटता है।
बदले में रक्तदान की व्यवस्था में आएगी कसौटी
नई व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौती यह रहेगी कि ब्लड बैंकों में सभी ग्रुप का पर्याप्त रक्त उपलब्ध रहे। अधिकतर मामलों में मरीज के परिजन या परिचित रक्तदान करते हैं और बदले में ब्लड दिया जाता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि NAT से जांचा गया सुरक्षित रक्त ही मरीजों तक पहुंचे। प्रदेश सरकार का यह निर्णय रक्त सुरक्षा की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
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