भोपाल डेस्क. भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी वैचारिक बहुलता है। अलग-अलग विचारधाराओं, सामाजिक समूहों और राजनीतिक दृष्टिकोणों का सह-अस्तित्व लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी विशेषता है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है; वास्तव में, स्वस्थ असहमति ही सरकार को निरंकुश होने से रोकती है। समस्या तब पैदा होती है, जब वैचारिक मतभेद व्यक्तिगत वैमनस्य, राजनीतिक प्रतिशोध और हर परिस्थिति में एक-दूसरे को गलत सिद्ध करने की प्रवृत्ति में बदलने लगते हैं। जब किसी नीति का मूल्यांकन उसके राष्ट्रीय परिणामों के बजाय इस आधार पर होने लगे कि उसे किस दल ने प्रस्तुत किया है, तब राजनीति का विवेक दलगत निष्ठा के सामने कमजोर पड़ने लगता है। राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने का अर्थ विपक्ष का अंत या सरकार के प्रति बिना शर्त समर्थन नहीं है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास जैसे विषयों पर राजनीतिक दल अपने मतभेदों के बावजूद न्यूनतम साझा सहमति विकसित कर सकें।
संसद में गतिरोध और संवाद की कमी
संसद किसी भी लोकतंत्र में केवल कानून बनाने की संस्था नहीं होती; वह राष्ट्रीय विवेक, जनाकांक्षाओं और सार्वजनिक असहमति को संवैधानिक अभिव्यक्ति देने वाला सर्वोच्च राजनीतिक मंच भी है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75 के अंतर्गत केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार और संसद के बीच संवाद, प्रश्नोत्तर, बहस तथा जवाबदेही लोकतांत्रिक शासन की अनिवार्य शर्तें हैं। लेकिन जब सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगन, नारेबाजी, व्यवधान और परस्पर आरोपों की भेंट चढ़ती है, तब केवल कुछ संसदीय घंटे नष्ट नहीं होते, बल्कि नागरिकों की समस्याओं पर सार्थक चर्चा के अवसर भी कम हो जाते हैं। संसदीय गतिरोध जब लंबे समय तक चलता है, तो राजनीतिक संवाद का स्थान सड़क पर होने वाले टकराव और उग्र प्रदर्शनों को मिलने लगता है। इसलिए लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करने के लिए संसद में व्यवस्थित बहस, सर्वदलीय संवाद, समयबद्ध चर्चा और संसदीय समितियों की प्रभावी भूमिका को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
लोकतंत्र की कार्यसंस्कृति में नवाचार का समय
लोकतंत्र कोई स्थिर राजनीतिक संरचना नहीं, बल्कि समय और समाज के साथ विकसित होने वाली शासन-पद्धति है। भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, नियमित चुनावों, सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। फिर भी, इन उपलब्धियों का अर्थ यह नहीं कि लोकतंत्र की कार्यप्रणाली में सुधार की कोई गुंजाइश शेष नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या हम केवल चुनावी लोकतंत्र को मजबूत करने पर ध्यान देंगे, या विचार-विमर्श, नीति-निर्माण और नागरिक भागीदारी वाले लोकतंत्र को भी उतना ही महत्त्व देंगे। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपनी पुस्तक इंडिया 2020 में विकसित भारत का व्यापक स्वप्न प्रस्तुत किया था। उस स्वप्न की प्राप्ति के लिए प्रशासनिक दक्षता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक सहभागिता के साथ ऐसी राजनीतिक संस्कृति भी आवश्यक है, जो दीर्घकालिक लक्ष्यों को अल्पकालिक चुनावी लाभ से ऊपर रख सके। भारत को जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोजगार, कृषि उत्पादकता, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा की गुणवत्ता जैसी चुनौतियों से दशकों तक जूझना है।
राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा पर चर्चा
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा पर गंभीर और खुली चर्चा की जा सकती है। सामान्य अर्थ में राष्ट्रीय सरकार ऐसी व्यवस्था को कहा जाता है, जिसमें प्रमुख राजनीतिक दल या विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह किसी असाधारण राष्ट्रीय परिस्थिति अथवा व्यापक सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए साझा शासन में भागीदारी करते हैं। अनेक देशों में युद्ध, राष्ट्रीय संकट या अत्यंत अस्थिर राजनीतिक परिस्थितियों के दौरान व्यापक गठबंधन सरकारें गठित हुई हैं। भारत में भी राष्ट्रीय सरकार अथवा सर्वदलीय सरकार की अवधारणा पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। इस विचार के पक्ष में सबसे मजबूत तर्क यह है कि यदि प्रमुख राजनीतिक दल कुछ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर साझा सहमति बना लें, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, ऊर्जा, अनुसंधान, न्यायिक सुधार और मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक नीतियों को अपेक्षाकृत अधिक स्थिरता मिल सकती है। हालांकि, राष्ट्रीय सरकार का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि सभी दल सत्ता में शामिल हो जाएँ और विपक्ष की भूमिका समाप्त हो जाए।
चंद्रशेखर काल की स्मृति से सबक
भारत के राजनीतिक इतिहास में राष्ट्रीय सरकार की अवधारणा को समझने के लिए 1990 के दशक की शुरुआत का दौर उल्लेखनीय है। नवंबर 1990 में चंद्रशेखर ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से केंद्र में सरकार बनाई थी। यह सरकार जनता दल से अलग हुए समूह के समर्थन और कांग्रेस की राजनीतिक सहमति पर निर्भर थी। मार्च 1991 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया, जिसके बाद सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। यह उदाहरण बताता है कि व्यापक राजनीतिक सहयोग के बिना अल्पमत सरकार की स्थिरता कितनी कठिन हो सकती है। हालांकि, चंद्रशेखर सरकार को औपचारिक अर्थ में सर्वदलीय राष्ट्रीय सरकार कहना ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं होगा। चंद्रशेखर के अनुभव से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उभरता है कि क्या राजनीतिक दल किसी साझा राष्ट्रीय कार्यक्रम पर सहमत होकर सरकार को स्थिरता दे सकते हैं, या उनका सहयोग केवल तत्कालीन सत्ता-समीकरणों तक सीमित रहता है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में इस प्रश्न का उत्तर आसान नहीं है।
दीर्घकालिक नीतियों की निरंतरता जरूरी
यदि प्रत्येक नई सरकार पिछली सरकार की नीतियों को केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर बदलने लगे, तो राष्ट्रीय संसाधनों और प्रशासनिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा निरंतरता के अभाव में व्यर्थ हो सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक नवाचार का अर्थ केवल कोई नया संवैधानिक ढाँचा तैयार करना नहीं है। इसमें चुनावी सुधार, राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता, आंतरिक दलगत लोकतंत्र, संसदीय समितियों को सशक्त बनाना, सार्वजनिक नीतियों का स्वतंत्र मूल्यांकन और नागरिकों के लिए नियमित परामर्श मंच विकसित करना भी शामिल है। नवाचार का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी, सहभागी और जवाबदेह बनाए। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य तभी हासिल हो सकेगा, जब राजनीतिक दल अल्पकालिक लाभ से ऊपर उठकर दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर ध्यान केंद्रित करें। संस्थागत सुधार और रचनात्मक विमर्श की संस्कृति विकसित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
राष्ट्रहित को दलगत हित से ऊपर रखने का मार्ग
लोकतंत्र में दल राष्ट्र की सेवा का माध्यम हैं, राष्ट्र स्वयं किसी दल की राजनीतिक संपत्ति नहीं। असली चुनौती मतभेदों के बीच सहयोग की संस्थागत व्यवस्था विकसित करना है, ताकि सरकार का अस्तित्व केवल दलगत गणित पर निर्भर न रहे और राष्ट्रीय नीतियों की निरंतरता सुनिश्चित हो सके। राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा न्यूनतम कार्यक्रम और दीर्घकालिक नीति-सहमति विकसित करने की संभावना लोकतांत्रिक विमर्श के योग्य है। युवा लोकतंत्र को अधिक नवाचारी बनाने का अर्थ है कि वह अपनी उपलब्धियों पर संतुष्ट न रहे, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप अपनी कार्यसंस्कृति को निरंतर परिष्कृत करे। 2047 का स्वप्न तभी साकार होगा, जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ विवेकपूर्ण, उत्तरदायी और दूरदर्शी बनेंगी।