इक्कीसवीं सदी में किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति का आकलन केवल उसकी आर्थिक वृद्धि या सैन्य सामर्थ्य से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि वह अपने उद्योगों, परिवहन, कृषि, अस्पतालों, डिजिटल अवसंरचना और करोड़ों नागरिकों को कितनी विश्वसनीय, सस्ती तथा स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है। भारत के सामने यह चुनौती विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को चौबीसों घंटे बिजली चाहिए। कोयले पर अत्यधिक निर्भरता, आयातित जीवाश्म ईंधनों की कीमतों में उतार-चढ़ाव और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम दीर्घकालीन ऊर्जा नियोजन को जटिल बनाते हैं। सौर और पवन ऊर्जा भावी व्यवस्था के अनिवार्य स्तंभ हैं, लेकिन उनकी उत्पादन क्षमता मौसम और समय के अनुसार बदलती रहती है। ऐसे परिदृश्य में परमाणु ऊर्जा का महत्त्व बढ़ जाता है क्योंकि यह कम कार्बन उत्सर्जन के साथ निरंतर बिजली उपलब्ध करा सकती है। भारत की परमाणु नीति का मूल उद्देश्य ऊर्जा उत्पादन को राष्ट्रीय वैज्ञानिक क्षमता, रणनीतिक स्वायत्तता और दीर्घकालीन संसाधन नियोजन से जोड़ना रहा है। अब आवश्यकता है कि इस नीति को नई तकनीकों, पारदर्शी नियमन और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाए।
कोयले की सीमाएँ और बढ़ती बिजली माँग
भारत की ऊर्जा नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बिजली की माँग बढ़ने के साथ विश्वसनीय आपूर्ति भी सुनिश्चित करनी है। कोयला अभी देश की विद्युत व्यवस्था का प्रमुख आधार है और निकट भविष्य में इसकी भूमिका समाप्त नहीं होने वाली। इसलिए यह कहना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं होगा कि भारत के कोयला भंडार तत्काल समाप्त हो रहे हैं। वास्तविक चिंता यह है कि कोयला एक सीमित, गैर-नवीकरणीय संसाधन है जिसका निष्कर्षण, परिवहन, दहन और पर्यावरणीय प्रभाव दीर्घकालीन आर्थिक लागत पैदा करते हैं। घरेलू कोयले की उपलब्धता का अर्थ यह नहीं कि हर संयंत्र को हर समय आवश्यक गुणवत्ता और मात्रा में ईंधन सहजता से मिलता रहेगा। जैसे-जैसे विद्युतीकरण, शहरीकरण, वातानुकूलन, इलेक्ट्रिक परिवहन, डेटा केंद्र और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उद्योग बढ़ेंगे, वैसे-वैसे निरंतर बिजली की जरूरत भी बढ़ेगी। केवल सौर पैनलों और पवन टर्बाइनों की स्थापित क्षमता गिनना पर्याप्त नहीं होगा। सूर्य न निकलने और हवा कमजोर पड़ने पर बिजली कहाँ से आएगी, यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। बैटरी भंडारण, पंप्ड स्टोरेज, मजबूत पारेषण नेटवर्क, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा का संयुक्त विकास इस चुनौती का व्यावहारिक उत्तर है। भारत को कोयले से अचानक विमुख होने के बजाय ऐसी ऊर्जा व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें परमाणु ऊर्जा धीरे-धीरे कम-कार्बन, स्थिर और विविधतापूर्ण बिजली आपूर्ति का महत्त्वपूर्ण आधार बने।
भारतीय परमाणु नीति: वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की यात्रा
भारत का परमाणु कार्यक्रम किसी तात्कालिक ऊर्जा संकट की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दूरदर्शी वैज्ञानिक नियोजन का परिणाम है। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा की परिकल्पना ने देश की सीमित यूरेनियम उपलब्धता और विशाल थोरियम संसाधनों को ध्यान में रखकर तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की आधारशिला रखी। पहले चरण में प्राकृतिक यूरेनियम पर आधारित दाबित भारी जल रिएक्टर हैं। दूसरे चरण में प्रयुक्त ईंधन से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग तीव्र प्रजनक रिएक्टरों में किया जाता है जिससे विखंडनीय पदार्थ का विस्तार होता है और थोरियम उपयोग का मार्ग खुलता है। तीसरे चरण में थोरियम-232 से रिएक्टर के भीतर यूरेनियम-233 तैयार कर ऊर्जा उत्पादन की परिकल्पना है। स्वदेशी दाबित भारी जल रिएक्टर कार्यक्रम औद्योगिक स्तर पर विकसित हो चुका है और कल्पक्कम में स्वदेशी प्रोटोटाइप तीव्र प्रजनक रिएक्टर ने अप्रैल 2026 में प्रथम क्रांतिकता प्राप्त कर दूसरे चरण में प्रवेश का महत्त्वपूर्ण पड़ाव पार किया। यह उपलब्धि उत्साहजनक है, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन और तीसरे चरण की पूर्ण सफलता के समान नहीं समझनी चाहिए। रिएक्टरों का निर्माण, सुरक्षा परीक्षण, ईंधन चक्र, लागत नियंत्रण और दीर्घकालीन संचालन—इन सभी मोर्चों पर निरंतर प्रगति आवश्यक है। सरकार ने 2047 तक लगभग 100 गीगावाट परमाणु विद्युत क्षमता का लक्ष्य रखा है जबकि 2031-32 तक लगभग 22 गीगावाट क्षमता तक पहुँचने की योजना है। इन लक्ष्यों के लिए समयबद्ध क्रियान्वयन, स्वदेशी उपकरण निर्माण, प्रशिक्षित मानव संसाधन और सक्षम नियामकीय व्यवस्था चाहिए।
परमाणु ईंधन की उपलब्धता और बंद ईंधन चक्र
किसी भी परमाणु ऊर्जा नीति की वास्तविक मजबूती उसके रिएक्टरों की संख्या से अधिक इस बात पर निर्भर करती है कि उसे ईंधन कितनी विश्वसनीयता से मिलता है। भारत के पास यूरेनियम संसाधन हैं, लेकिन घरेलू उपलब्धता और भावी विस्तार की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना महत्त्वपूर्ण है। आयातित यूरेनियम तथा अंतरराष्ट्रीय असैनिक परमाणु सहयोग ने अतिरिक्त विकल्प खोले हैं, फिर भी दीर्घकालीन ऊर्जा सुरक्षा का आधार स्वदेशी ईंधन संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग होना चाहिए। प्रयुक्त परमाणु ईंधन के पुनर्संसाधन और उपयोगी पदार्थों की पुनर्प्राप्ति को विशेष महत्त्व दिया गया है। बंद ईंधन चक्र का उद्देश्य एक चरण से निकले पदार्थों का दूसरे चरण में उपयोग करके सीमित विखंडनीय संसाधनों की उपयोगिता बढ़ाना है। पुनर्संसाधन सरल या जोखिम-मुक्त प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए उच्चस्तरीय प्रौद्योगिकी, विकिरण सुरक्षा, परमाणु सामग्री का कठोर लेखा-जोखा और रेडियोधर्मी अपशिष्ट का सुरक्षित प्रबंधन अनिवार्य है। ईंधन आपूर्ति के विविध स्रोत, घरेलू खनन की पर्यावरणीय जवाबदेही, ईंधन निर्माण क्षमता और दीर्घकालीन रणनीतिक भंडार विकसित किए जाने चाहिए। भारत को ऐसा ढाँचा बनाना होगा जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग से लाभ मिले, लेकिन किसी एक विदेशी आपूर्तिकर्ता या भू-राजनीतिक परिस्थिति पर अत्यधिक निर्भरता न बने। ऊर्जा आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि वैश्विक साझेदारी के बीच अपने निर्णायक विकल्प सुरक्षित रखना है।
थोरियम: भारत की भू-संपदा को ऊर्जा में बदलने की चुनौती
भारत की परमाणु ऊर्जा संबंधी सबसे विशिष्ट संभावनाओं में थोरियम का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। समुद्रतटीय खनिज बालू क्षेत्रों में मोनाजाइट पाया जाता है जिसमें थोरियम मौजूद रहता है। केरल और ओडिशा सहित कुछ तटीय क्षेत्रों में इसकी उपलब्धता दीर्घकालीन रणनीतिक बढ़त प्रदान कर सकती है। लेकिन वैज्ञानिक तथ्य स्पष्ट है कि थोरियम-232 स्वयं सीधे सामान्य परमाणु ईंधन की तरह विखंडन करके ऊर्जा उत्पन्न नहीं करता। यह एक उर्वर पदार्थ है जिसे उपयुक्त रिएक्टर में न्यूट्रॉन ग्रहण करने और आगे की प्रक्रियाओं से विखंडनीय यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना पड़ता है। इसलिए थोरियम को सीधे उपयोग योग्य ईंधन में बदल देने की कल्पना के बजाय ऐसी तकनीक विकसित करना अधिक यथार्थवादी लक्ष्य है जो उसके रूपांतरण, ईंधन निर्माण, रिएक्टर में उपयोग और पुनर्चक्रण को सुरक्षित तथा आर्थिक रूप से व्यवहार्य बना सके। भारत ने थोरियम आधारित ईंधन पर शोध, विकिरण परीक्षण और यूरेनियम-233 उत्पादन से संबंधित कार्य किए हैं। अब इस शोध को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत है। उन्नत रिएक्टरों, ईंधन पुनर्संसाधन, पदार्थ विज्ञान, विकिरण सुरक्षा और दीर्घकालीन परीक्षणों में पर्याप्त निवेश करना होगा। थोरियम भारत के लिए ऊर्जा आत्मनिर्भरता का महत्त्वपूर्ण आधार बन सकता है, लेकिन उसे तत्काल उपलब्ध समाधान मानना वैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित होगा। वास्तविक सफलता तब होगी जब इस संसाधन को प्रयोगशाला से आगे ले जाकर व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी, सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा प्रणाली का हिस्सा बनाया जा सके।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी: निवेश के साथ जवाबदेही
परमाणु ऊर्जा क्षमता को बड़े पैमाने पर विस्तारित करने के लिए सरकारी संसाधनों के साथ निजी क्षेत्र की पूँजी, विनिर्माण क्षमता और नवाचार को भी जोड़ना होगा। दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त सतत परमाणु ऊर्जा दोहन एवं संवर्धन अधिनियम यानी एसएचएएनटीआई अधिनियम ने निर्धारित लाइसेंस और नियामकीय सुरक्षा अनुमोदनों के अधीन निजी क्षेत्र को परमाणु सुविधाओं की स्थापना तथा संबंधित गतिविधियों में भागीदारी का कानूनी मार्ग प्रदान किया है। इससे परियोजना वित्तपोषण, घरेलू उपकरण निर्माण, ईंधन निर्माण, अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास में अतिरिक्त अवसर पैदा हो सकते हैं। सार्वजनिक-निजी भागीदारी का अर्थ केवल निजी निवेश आकर्षित करना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य भारतीय उद्योगों को उच्च गुणवत्ता वाले रिएक्टर उपकरण, विशेष मिश्रधातुओं, नियंत्रण प्रणालियों, डिजिटल निगरानी और उन्नत ईंधन प्रौद्योगिकी के विकास में सक्षम बनाना भी होना चाहिए। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, औद्योगिक ताप आपूर्ति तथा ऊर्जा-गहन उद्योगों के लिए समर्पित संयंत्रों पर व्यवहार्यता आधारित शोध आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन परमाणु क्षेत्र सामान्य व्यावसायिक उद्योग नहीं है। इसमें स्वतंत्र एवं सक्षम नियमन, सुरक्षा मानकों का अनुपालन, स्पष्ट दायित्व निर्धारण, आपातकालीन तैयारी, रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन और प्रभावित समुदायों के अधिकार सर्वोपरि रहने चाहिए। निजी भागीदारी से लागत और निर्माण समय कम करने का प्रयास तभी सार्थक होगा जब सुरक्षा पर कोई समझौता न हो और जनता का विश्वास बना रहे।
स्वच्छ ऊर्जा के लाभ और सुरक्षा की अनिवार्यता
परमाणु ऊर्जा का सबसे बड़ा पर्यावरणीय लाभ यह है कि रिएक्टर संचालन के दौरान कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों की तरह कार्बन डाइऑक्साइड का प्रत्यक्ष उत्सर्जन नहीं होता। जीवनचक्र के आधार पर भी इसका ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन सामान्यतः कम पाया जाता है और वह जलवायु परिवर्तन से निपटने में योगदान दे सकती है। भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस दिशा में परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता का संयोजन महत्त्वपूर्ण हो सकता है। फिर भी परमाणु ऊर्जा को पर्यावरणीय प्रभावों से पूरी तरह मुक्त बताना सही नहीं होगा। यूरेनियम खनन, ईंधन निर्माण, संयंत्र निर्माण, जल उपयोग, रेडियोधर्मी अपशिष्ट और संयंत्र के जीवनकाल समाप्ति के बाद निष्क्रियकरण जैसे पहलुओं का जिम्मेदार प्रबंधन आवश्यक है। परमाणु दुर्घटना की संभावना कम रखने के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा, स्वतंत्र नियामकीय निगरानी, नियमित परीक्षण और प्रभावी आपातकालीन व्यवस्था चाहिए। स्थानीय समुदायों को परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव, सुरक्षा प्रोटोकॉल और आपदा प्रबंधन योजनाओं की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। रेडियोधर्मी अपशिष्ट का सुरक्षित भंडारण और दीर्घकालीन प्रबंधन किसी भी विस्तार योजना का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। भारत को परमाणु ऊर्जा के लाभों का आकलन केवल बिजली उत्पादन या कार्बन उत्सर्जन के आधार पर नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवनचक्र की लागत, जल संसाधनों, पर्यावरणीय प्रभाव और सुरक्षा जोखिमों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
2047 तक ऊर्जा सुरक्षा का व्यावहारिक रोडमैप
भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प में परमाणु ऊर्जा को दीर्घकालीन रणनीतिक अवसंरचना का दर्जा देना चाहिए। लगभग 100 गीगावाट परमाणु विद्युत क्षमता का लक्ष्य महत्त्वाकांक्षी संकेत है, लेकिन सफलता चरणबद्ध और व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। पहले चरण में निर्माणाधीन रिएक्टरों को समय पर पूरा करना, स्वदेशी 700 मेगावाट दाबित भारी जल रिएक्टरों के अनुभव का विस्तार करना और घरेलू आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाना आवश्यक है। दूसरे चरण में तीव्र प्रजनक रिएक्टरों के संचालन अनुभव, ईंधन चक्र की विश्वसनीयता और आर्थिक व्यवहार्यता को सुदृढ़ करना होगा। तीसरे चरण के लिए थोरियम आधारित रिएक्टरों तथा यूरेनियम-233 ईंधन चक्र पर निरंतर अनुसंधान और प्रदर्शन परियोजनाओं में निवेश बढ़ाना चाहिए। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों, उन्नत सुरक्षा प्रणालियों और डिजिटल नियंत्रण तकनीकों पर शोध को बढ़ावा दिया जा सकता है बशर्ते उनकी लागत, सुरक्षा और वास्तविक उपयोगिता का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाए। केंद्र सरकार, राज्यों, वैज्ञानिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और निजी उद्योगों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारियों वाला समन्वय तंत्र बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक बड़ी परियोजना के लिए लागत, समयसीमा, सुरक्षा समीक्षा और स्थानीय पर्यावरणीय प्रभाव की सार्वजनिक निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए। परमाणु विज्ञान में प्रशिक्षित अभियंताओं, तकनीशियनों, सुरक्षा विशेषज्ञों और अनुसंधानकर्ताओं की नई पीढ़ी तैयार करना अनिवार्य है। ऊर्जा नीति को केवल स्थापित क्षमता के आँकड़ों से नहीं, बल्कि उत्पादित बिजली, आपूर्ति की विश्वसनीयता, प्रति इकाई लागत, घरेलू तकनीकी योगदान और पर्यावरणीय प्रदर्शन से मापा जाना चाहिए।