भोपाल डेस्क. भारतीय संस्कृति में विजयादशमी केवल रावण-वध की स्मृति नहीं, बल्कि उस गहन सत्य की उद्घोषणा है कि अन्याय पर न्याय, अहंकार पर विवेक और निराशा पर आत्मबल की विजय संभव है। किंतु इस विजय के पीछे छिपे आध्यात्मिक दर्शन को समझने के लिए सूर्यवंशी राम के उस स्वरूप को देखना आवश्यक है, जो युद्धभूमि में उपस्थित है, किंतु विजय को लेकर निश्चिंत नहीं। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कालजयी कविता राम की शक्ति-पूजा इसी मानवीय क्षण को असाधारण गहराई प्रदान करती है। इसमें राम केवल सर्वशक्तिमान नायक नहीं, बल्कि संघर्ष से थका हुआ, चुनौती के सामने चिंतित और अपने लक्ष्य की कठिनाई से परिचित मनुष्य भी हैं। रावण की विशाल शक्ति के सामने राम को अनुभव होता है कि केवल सदाशयता, नैतिक श्रेष्ठता और युद्ध-कौशल पर्याप्त नहीं। विजय के लिए अंतःशक्ति, साधना, धैर्य और आत्मसमर्पण भी आवश्यक हैं। यही कविता का केंद्रीय संदेश है कि महान उद्देश्य के लिए केवल बाहरी शस्त्र नहीं, भीतर की शक्ति का जागरण भी अनिवार्य है।
देवत्व के भीतर मनुष्य की पीड़ा
निराला की कविता का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि उसमें राम संकट के क्षण में अपनी मानवीय दुर्बलता से अपरिचित नहीं रहते। युद्ध का परिणाम अनिश्चित है, प्रतिद्वंद्वी शक्तिशाली है और विजय की राह अपेक्षा से अधिक कठिन दिखाई देती है। ऐसे समय राम का मन विचलित होता है। निराला लिखते हैं, “धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध।” यह पंक्ति केवल राम की तत्कालीन मनःस्थिति नहीं, बल्कि उस प्रत्येक व्यक्ति की पीड़ा है, जो ईमानदारी से प्रयास करने के बावजूद बार-बार बाधाओं से टकराता है। कभी जीवन में आर्थिक कठिनाइयाँ, कभी बीमारी, कभी असफलता, कभी सामाजिक उपेक्षा और कभी अपने ही लोगों की अपेक्षाएँ मनुष्य को भीतर तक थका देती हैं। ऐसे क्षणों में सबसे बड़ी चुनौती बाहरी विरोध नहीं, बल्कि भीतर जन्म लेने वाला संशय होता है। निराला के राम इन प्रश्नों से गुजरते हैं, लेकिन पराजय को अपना अंतिम सत्य स्वीकार नहीं करते। वे शक्ति की आराधना करते हैं। महानता अपनी कमजोरी को पहचानकर उससे ऊपर उठने के प्रयास में निहित है।
नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य
नवरात्रि में दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस परंपरा में श्रद्धालु माँ शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक देवी के विविध रूपों का स्मरण करते हैं। इन स्वरूपों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित कर देने से उनके प्रतीकात्मक अर्थ का बड़ा हिस्सा छूट जाता है। माँ शैलपुत्री स्थिरता और आधार का, ब्रह्मचारिणी तप और अनुशासन का, चंद्रघंटा साहस और सजगता का, कूष्मांडा सृजनात्मक ऊर्जा का, स्कंदमाता संरक्षण का, कात्यायनी अन्याय के प्रतिरोध का, कालरात्रि भय का सामना करने का, महागौरी शुद्धता का और सिद्धिदात्री सिद्धि तथा पूर्णता की आकांक्षा का स्मरण कराती हैं। देवी-माहात्म्य में देवी को समस्त प्राणियों में चेतना, बुद्धि, शक्ति, श्रद्धा और करुणा के रूप में विद्यमान बताया गया है। “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता” का स्मरण कराता है कि शक्ति केवल मंदिर में प्रतिष्ठित प्रतिमा तक सीमित नहीं। वह मनुष्य की विवेकशीलता, नारी की सृजनशीलता, श्रमिक की कर्मठता, वैज्ञानिक की जिज्ञासा, सैनिक के साहस और संकटग्रस्त व्यक्ति की पुनः उठ खड़े होने की क्षमता में भी अभिव्यक्त होती है।
प्रकृति ही आदिशक्ति का विराट स्वरूप
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में प्रकृति को जड़ पदार्थों का निष्प्राण संग्रह नहीं, बल्कि जीवन को धारण करने वाली विराट व्यवस्था के रूप में देखा गया है। पृथ्वी अन्न देती है, जल जीवन को प्रवाहित करता है, वायु श्वास का आधार है, सूर्य ऊर्जा प्रदान करता है और वनस्पतियाँ असंख्य जीवों के अस्तित्व को सहारा देती हैं। शारदीय नवरात्रि का समय वर्षा ऋतु से शरद ऋतु की ओर बढ़ते परिवर्तन से जुड़ा है। विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्रि के अनुष्ठानों में मिट्टी, जौ के अंकुरण, कलश और दीप का विशेष स्थान इसी प्रकृति-संबद्ध सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्त करता है। जौ के अंकुर जीवन की निरंतरता, विकास और आशा का प्रतीक बनते हैं। दीप अंधकार में प्रकाश की संभावना जगाता है और कलश जीवनदायिनी पूर्णता का संकेत देता है। जिस प्रकृति को हम देवी का स्वरूप मानकर पूजते हैं, उसे प्रदूषित करना, नदियों को दूषित करना, जंगलों को नष्ट करना और संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करना हमारी ही आध्यात्मिक मान्यताओं के विपरीत है।
शक्ति का मनोविज्ञान और साहस
आध्यात्मिक परंपराएँ मनुष्य को केवल चमत्कारों की अपेक्षा करना नहीं सिखातीं। वे आत्मसंयम, धैर्य, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों में विवेक बनाए रखने की प्रेरणा भी देती हैं। लंबे समय तक तनाव झेलने वाला व्यक्ति कभी-कभी अपनी वास्तविक क्षमताओं पर भी संदेह करने लगता है। ऐसे समय नियमित दिनचर्या, पर्याप्त विश्राम, विश्वसनीय लोगों का सहयोग, लक्ष्य को छोटे चरणों में बाँटना और अपनी प्रगति का यथार्थ आकलन करना उपयोगी हो सकता है। निराला के राम का शक्ति-आराधना की ओर मुड़ना भी एक गहरा प्रतीक है। जब पुरानी रणनीति पर्याप्त न हो, तब मनुष्य को अपनी दृष्टि, मानसिक तैयारी और कार्यपद्धति पर पुनर्विचार करना चाहिए। आस्था यहाँ कर्म का विकल्प नहीं, बल्कि कर्म के लिए मानसिक आधार बन सकती है। सच्ची शक्ति-चेतना स्वयं को दोष देने में नहीं, अपनी सीमाओं को पहचानते हुए उपलब्ध साधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने में प्रकट होती है।
शक्ति और मर्यादा का अटूट संबंध
शक्ति का प्रश्न केवल इस बात तक सीमित नहीं कि हमारे पास कितना सामर्थ्य है। उससे भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि हम उस सामर्थ्य का उपयोग किस उद्देश्य और किस तरीके से करते हैं। रावण का चरित्र भारतीय परंपरा में विद्वत्ता, तप और असाधारण सामर्थ्य के बावजूद अहंकार, अनियंत्रित इच्छा तथा मर्यादा-भंग के कारण पतन का उदाहरण बनता है। दूसरी ओर राम का आदर्श धर्म, कर्तव्य और मर्यादा के साथ शक्ति के उपयोग की अपेक्षा करता है। इसीलिए विजयादशमी का संदेश केवल शक्तिशाली बनने का आह्वान नहीं, बल्कि शक्ति को नैतिक उत्तरदायित्व के अधीन रखने की प्रेरणा भी है। भगवद्गीता का वचन “योगः कर्मसु कौशलम्” याद दिलाता है कि कर्म में कुशलता विवेकपूर्ण, संतुलित और उत्तरदायी ढंग से कर्म करना भी है। परिवार में अधिकार का उपयोग संवेदनशीलता के साथ, राजनीति में सत्ता का उपयोग जनहित में, व्यवसाय में लाभ का प्रयास ईमानदारी से किया जाए, तभी शक्ति कल्याणकारी बनती है।
भक्ति, पुरुषार्थ और स्त्री-शक्ति का सम्मान
भारतीय दर्शन में भक्ति और पुरुषार्थ को परस्पर विरोधी मानना आवश्यक नहीं है। भक्ति मनुष्य को विनम्रता, आशा और व्यापक नैतिक उद्देश्य से जोड़ सकती है, जबकि पुरुषार्थ उसे अपने कर्तव्य की दिशा में सक्रिय रखता है। निराला की कविता में राम का देवी के प्रति समर्पण निष्क्रिय पलायन नहीं बनता। वह संघर्ष के बीच अपनी शक्ति को पुनर्संगठित करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। नवरात्रि में कन्या-पूजन, दुर्गा-आराधना और स्त्री-शक्ति की महिमा का विशेष स्थान है। लेकिन किसी समाज की आध्यात्मिक परिपक्वता का आकलन केवल उसके धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रति उसके वास्तविक व्यवहार से भी होना चाहिए। वास्तविक सम्मान तब प्रकट होता है, जब स्त्री को शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन, संपत्ति, नेतृत्व और अपनी पसंद के जीवन का अवसर मिलता है। देवी-आराधना की सार्थकता घर, विद्यालय, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रति न्यायपूर्ण व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए।
विजयादशमी का वास्तविक अर्थ
विजयादशमी आते ही मैदानों में रावण के पुतले तैयार होते हैं, रामलीलाओं का समापन होता है और बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाया जाता है। यह परंपरा भारतीय सांस्कृतिक जीवन की महत्त्वपूर्ण धरोहर है। फिर भी हर वर्ष एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। यदि रावण का पुतला जलाने के बाद भी समाज में भ्रष्टाचार, हिंसा, स्त्री-असमानता, जातिगत भेदभाव, पर्यावरण-विनाश और असहिष्णुता बनी रहती है, तो इस उत्सव से हमें कौन-सा आत्मबोध प्राप्त हुआ। रावण के दस सिरों को अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, मोह, अन्याय, असत्य और अन्य विनाशकारी प्रवृत्तियों से जोड़कर देखने की लोकप्रिय परंपरा हमें आत्मनिरीक्षण का अवसर देती है। राम की विजय को केवल किसी शत्रु के विनाश से नहीं, बल्कि मर्यादा, विवेक और धर्मसम्मत आचरण की स्थापना से जोड़कर समझना अधिक सार्थक है। उत्सव की अग्नि तभी अर्थवान बनेगी, जब वह हमारे भीतर के अंधकार को पहचानने का प्रकाश भी देगी।