भोपाल डेस्क: भारत आज ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहां उसकी युवा आबादी देश को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्यमिता, सामाजिक सुधार और वैश्विक नेतृत्व की नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। लेकिन इसी युवा ऊर्जा का एक हिस्सा यदि राजनीतिक या वैचारिक कट्टरता, संस्थाओं के प्रति अंधविरोध, सामाजिक वैमनस्य और हिंसक भाषा की गिरफ्त में आ जाए तो यह राष्ट्रीय प्रगति के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है। इसी संदर्भ में सार्वजनिक विमर्श में दिमागी नक्सलवाद अथवा अर्बन नक्सल जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। हालांकि इन शब्दों का कोई सर्वमान्य मनोवैज्ञानिक या कानूनी अर्थ नहीं है और कई बार इनका इस्तेमाल वैध असहमति को बदनाम करने के लिए भी किया जाता है। इसलिए किसी व्यक्ति को केवल सरकार की आलोचना करने, असहमत विचार रखने, किसी आंदोलन का समर्थन करने या विशिष्ट प्रतीक वाला टैटू बनवाने के कारण इस श्रेणी में डाल देना न्यायसंगत नहीं होगा। वास्तविक चिंता वहां शुरू होती है जहां विचारधारा व्यक्ति को हिंसा का समर्थक बनाए, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नष्ट करने की प्रेरणा दे, समाज के किसी वर्ग के प्रति घृणा फैलाए या कानून अपने हाथ में लेने को उचित ठहराए। इस अंतर को समझना आवश्यक है क्योंकि राष्ट्र की रक्षा केवल हिंसक विचारों का प्रतिरोध करने से नहीं बल्कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने से भी होती है। युवा ऊर्जा को सही दिशा देने का उत्तरदायित्व समाज, परिवार और राज्य तीनों पर समान रूप से है।
आक्रामकता जब साहस का मुखौटा पहन लेती है
युवा अवस्था में अपनी पहचान स्थापित करने, स्वतंत्र निर्णय लेने और समाज में प्रभावशाली स्थान बनाने की स्वाभाविक आकांक्षा होती है। इस उम्र में आदर्शवाद, अन्याय के प्रति संवेदनशीलता और व्यवस्था को बदलने की इच्छा सकारात्मक परिवर्तन की ताकत बन सकती है। लेकिन यही ऊर्जा जब आवेग, प्रतिशोध, अपमान सहन न कर पाने और हर विरोधी को शत्रु मानने की प्रवृत्ति से जुड़ जाती है तब आक्रामकता को वैचारिक वीरता का नाम दिया जाने लगता है। कोई युवा यदि तर्क के स्थान पर अपशब्द, संवाद के स्थान पर धमकी और प्रमाण के स्थान पर आरोपों का सहारा लेने लगे तो उसके व्यवहार पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा के सामाजिक अधिगम सिद्धांत के अनुसार मनुष्य दूसरों के व्यवहार को देखकर और उसके परिणामों से सीखकर अपनी प्रतिक्रियाएं विकसित कर सकता है। यदि किसी युवा को लगातार यह दिखाई दे कि उग्र भाषा, सार्वजनिक अपमान, भीड़ का दबाव या हिंसक प्रदर्शन लोकप्रियता और प्रतिष्ठा दिलाते हैं तो वह इन व्यवहारों को अपनाने के लिए प्रेरित हो सकता है। सोशल मीडिया पर उत्तेजक वक्तव्यों को मिलने वाली त्वरित प्रशंसा इस समस्या को बढ़ा सकती है। लेकिन यह भी समझना होगा कि आक्रामकता केवल किसी एक विचारधारा की विशेषता नहीं है। सत्ता समर्थक हो या सत्ता विरोधी, धार्मिक समूह हो या राजनीतिक संगठन—जब कोई भी पक्ष विरोधी को अपमानित करना और भयभीत करना अपना अधिकार मानने लगे तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर होती है। असली साहस अपनी बात पर दृढ़ रहने के साथ-साथ दूसरे की बात सुनने और अपनी गलती स्वीकार करने में भी दिखाई देता है।
असहिष्णुता और मानसिक कमजोरी का संबंध
वैचारिक उग्रता को समझने के लिए केवल राजनीतिक नारों को देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना होगा कि व्यक्ति अपने विचारों और आत्मसम्मान के बीच कैसा संबंध बना लेता है। जब किसी की पहचान पूरी तरह किसी संगठन, विचारधारा, नेता या आंदोलन से जुड़ जाती है तब उस विचार की आलोचना उसे व्यक्तिगत अपमान जैसी लग सकती है। ऐसी स्थिति में वह तर्क सुनने के बजाय रक्षात्मक हो जाता है, विरोधी की नीयत पर संदेह करता है और कभी-कभी उसे नैतिक रूप से हीन मानने लगता है। इसे सामान्य भाषा में वैचारिक असुरक्षा कह सकते हैं लेकिन इसे प्रत्येक उग्र व्यक्ति की चिकित्सकीय या मनोवैज्ञानिक कमजोरी घोषित करना सही नहीं होगा। सामाजिक मनोवैज्ञानिक हेनरी ताजफेल के सामाजिक पहचान संबंधी कार्य यह समझने में मदद करते हैं कि व्यक्ति अपने समूह से आत्मपहचान प्राप्त करता है और कुछ परिस्थितियों में अपने समूह को श्रेष्ठ तथा दूसरे समूह को विरोधी समझने लगता है। इस प्रक्रिया में हम बनाम वे का विभाजन मजबूत हो सकता है। भारत में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और राजनीतिक निष्ठा के आधार पर बनने वाली डिजिटल जमातें इस समस्या को और जटिल बना सकती हैं। समान विचारों वाले समूहों में लगातार एक जैसी सामग्री देखने से व्यक्ति के विचार अधिक कठोर हो सकते हैं और विपरीत दृष्टिकोण के प्रति उसकी सहनशीलता कम हो सकती है। युवाओं को केवल अपनी विचारधारा की पुष्टि करने वाली सामग्री नहीं बल्कि विश्वसनीय स्रोतों से विपरीत दृष्टिकोण भी पढ़ने चाहिए। मानसिक दृढ़ता का अर्थ अपनी मान्यता से कभी न हटना नहीं बल्कि प्रमाण मिलने पर उसे संशोधित कर सकना है।
बेरोजगारी निराशा और व्यवस्था से मोहभंग
किसी युवा की वैचारिक उग्रता को केवल उसके व्यक्तिगत चरित्र का परिणाम मान लेना सामाजिक वास्तविकताओं की उपेक्षा होगी। बेरोजगारी, रोजगार की अनिश्चितता, शिक्षा और अवसरों के बीच असंतुलन, सामाजिक भेदभाव, भ्रष्टाचार का अनुभव, राजनीतिक उपेक्षा और भविष्य को लेकर असुरक्षा व्यक्ति में हताशा पैदा कर सकती है। यदि उसकी शिकायतों को सुनने वाला कोई विश्वसनीय मंच न हो तो उसे ऐसे समूह आकर्षित कर सकते हैं जो उसकी पीड़ा को एक सरल शत्रु-कथा में बदल देते हैं। असली खतरा शिकायत में नहीं बल्कि शिकायत के योजनाबद्ध दुरुपयोग में है। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना नागरिक अधिकार है; उसी अन्याय के नाम पर निर्दोष लोगों को निशाना बनाना या हिंसा को अपरिहार्य बताना अलग बात है। सामाजिक विज्ञान का दृष्टिकोण सिखाता है कि आक्रोश के पीछे वास्तविक असमानताएं हो सकती हैं और उनका समाधान किए बिना केवल अनुशासन की मांग करने से समस्या गहरी हो सकती है। इसलिए सरकारों को रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पारदर्शी भर्ती, न्याय तक पहुंच और शिकायत निवारण पर ठोस काम करना होगा। विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, करियर मार्गदर्शन, बहस और छात्र-शिक्षक संवाद को मजबूत करना भी जरूरी है। राजनीतिक दलों और संगठनों की जवाबदेही तय होनी चाहिए कि वे युवाओं की आकांक्षाओं को रचनात्मक नागरिक भागीदारी में बदल रहे हैं या उनकी निराशा को विरोधियों के प्रति घृणा में ढाल रहे हैं।
सोशल मीडिया के वैचारिक अखाड़े
आज किसी युवा के लिए राजनीतिक विचारधारा से जुड़ना पहले की तुलना में बहुत आसान हो गया है। कुछ वीडियो, उत्तेजक भाषण, चुनिंदा ऐतिहासिक प्रसंग और बार-बार दोहराए जाने वाले आरोप कुछ ही समय में उसकी सोच को प्रभावित कर सकते हैं। समस्या इंटरनेट या राजनीतिक सक्रियता नहीं बल्कि वह सूचना-परिवेश है जिसमें सनसनी को प्रमाण से अधिक, अपमान को हास्य से अधिक और आक्रामकता को लोकप्रियता से अधिक महत्व मिलने लगता है। अल्बर्ट बंडूरा का सामाजिक अधिगम सिद्धांत उपयोगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है कि लोग केवल उपदेशों से नहीं बल्कि दूसरों के व्यवहार और उसके परिणामों को देखकर भी सीखते हैं। यदि किसी व्यक्ति को लगातार यह संदेश मिले कि विरोधी को नीचा दिखाना ही जीत है, कानून का उल्लंघन करना ही बहादुरी है और अपने समूह के प्रत्येक कृत्य का बचाव करना ही निष्ठा है तो विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। जब ऑनलाइन समुदाय में हर सदस्य एक-दूसरे के गुस्से की पुष्टि करता रहता है तब अतिवादी विचार सामान्य और असहमति अस्वीकार्य लगने लगती है। इसका परिणाम सार्वजनिक जीवन में धमकी, अफवाह, चरित्रहनन, भीड़ का दबाव और संस्थाओं के प्रति अंधविरोध के रूप में दिखाई दे सकता है। आवश्यकता डिजिटल साक्षरता, तथ्य-जांच, एल्गोरिदम के प्रभाव की बेहतर समझ और ऐसी नागरिक संस्कृति की है जिसमें असहमति को अपमानित किए बिना व्यक्त किया जा सके।
गांधी के देश में वैचारिक प्रतीकों का सवाल
भारत महात्मा गांधी की उस परंपरा का देश है जिसने अहिंसा, सत्याग्रह और नैतिक साहस को राजनीतिक परिवर्तन के प्रभावशाली साधन के रूप में स्थापित किया। इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या ऐसे देश में हिंसक क्रांति, सशस्त्र विद्रोह अथवा व्यवस्था को बलपूर्वक उखाड़ फेंकने की विचारधारा के प्रतीकों को सार्वजनिक स्थान मिलना चाहिए। इसका उत्तर भावनात्मक प्रतिक्रिया से नहीं लोकतांत्रिक सिद्धांतों से देना होगा। विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता और हिंसा को अंजाम देने या उसके लिए उकसाने की स्वतंत्रता एक ही चीज नहीं हैं। कोई व्यक्ति किसी क्रांतिकारी का चित्र, राजनीतिक नारा या विवादास्पद प्रतीक टैटू के रूप में धारण करता है तो मात्र इस आधार पर उसे अपराधी या राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। प्रतीक का अर्थ उसके ऐतिहासिक संदर्भ, व्यक्ति की वास्तविक मान्यताओं और उसके आचरण से समझा जाना चाहिए। किसी विचार से असहमति होने पर भी व्यक्ति के अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान लोकतंत्र की बुनियादी कसौटी है। दूसरी ओर यदि कोई प्रतीक किसी विशेष परिस्थिति में हिंसा की स्पष्ट धमकी, आपराधिक संगठन की सक्रियता या किसी समुदाय के विरुद्ध उकसावे का हिस्सा बनता है तो उसके वास्तविक संदर्भ और लागू कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। गांधी का अहिंसा-दर्शन निष्क्रियता या अन्याय के सामने आत्मसमर्पण का संदेश नहीं देता; वह अन्याय का प्रतिरोध करते हुए भी मानवीय गरिमा और नैतिक सीमाओं को बनाए रखने की चुनौती देता है।
कानून लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्रीय सुरक्षा
किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं बल्कि संतुलन की मांग करने वाले दायित्व हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक बिना हथियार सभा करने का अधिकार देता है। साथ ही संविधान इन अधिकारों पर निर्धारित परिस्थितियों में युक्तियुक्त प्रतिबंधों की अनुमति भी देता है। इसलिए सरकार की आलोचना, नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन, विश्वविद्यालयों में बहस या किसी सामाजिक आंदोलन से जुड़ना अपने आप में अराजकता नहीं है। किंतु हिंसा के लिए उकसाना, आपराधिक गतिविधियों में भाग लेना, सार्वजनिक संपत्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाना या कानून के तहत प्रतिबंधित हिंसक गतिविधियों में संलिप्त होना अलग प्रश्न हैं जिनकी जांच साक्ष्यों और विधि के अनुसार होनी चाहिए। राज्य को ऐसे मामलों में प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए लेकिन वह कार्रवाई प्रमाण-आधारित, अनुपातिक और न्यायिक समीक्षा के योग्य भी होनी चाहिए। किसी भी विचारधारा के नाम पर हिंसा करने वालों को राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलना चाहिए; वहीं किसी सरकार को असुविधाजनक आलोचना को अपराध का पर्याय बनाने की छूट भी नहीं मिलनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता का अर्थ यह नहीं कि देश के सभी नागरिक एक ही विचार रखें। उसका अर्थ यह है कि वे अपने मतभेदों के बावजूद संवैधानिक व्यवस्था, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और दूसरे नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करें।
समाधान का रास्ता और युवा ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग
इस चुनौती का उत्तर केवल कठोर दंड, भाषणों या किसी विचारधारा को बदनाम करने में नहीं छिपा है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में तार्किक चिंतन, संवाद-कौशल, भावनात्मक नियंत्रण, मीडिया साक्षरता और संवैधानिक मूल्यों की व्यावहारिक शिक्षा दी जानी चाहिए। युवाओं को यह सिखाना आवश्यक है कि किसी वायरल वीडियो को साझा करने से पहले उसकी सत्यता कैसे जांचें, विरोधी तर्क को कैसे समझें और गुस्से की स्थिति में प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरना कैसे सीखें। परिवारों और शिक्षण संस्थानों को ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहां युवाओं के प्रश्नों को केवल अनुशासनहीनता मानकर न टाला जाए। रोजगार, कौशल विकास, निष्पक्ष अवसर और शिकायत निवारण की व्यवस्था में सुधार जरूरी है क्योंकि सामाजिक अन्याय और उपेक्षा की वास्तविक शिकायतों का समाधान किए बिना केवल वैचारिक उपदेश सीमित प्रभाव डालेंगे। राजनीतिक दलों, प्रभावशाली व्यक्तियों और डिजिटल मंचों को भड़काऊ भाषा, लक्षित उत्पीड़न और जानबूझकर फैलाई जाने वाली भ्रामक सामग्री के प्रति जवाबदेह बनाना होगा। युवाओं को राष्ट्रीय सेवा, सामुदायिक कार्य, स्थानीय समस्याओं के समाधान, वैज्ञानिक अनुसंधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ रचनात्मक सहभागिता के अवसर मिलने चाहिए। सुधार का लक्ष्य केवल असहमति को नियंत्रित करना नहीं बल्कि असहमति को जिम्मेदार नागरिकता में बदलना होना चाहिए।