नई दिल्ली - भारत के रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के लिए रातों-रात रूसी ऊर्जा से पूरी तरह अलग होना आसान नहीं है। रुबियो ने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार बताते हुए कहा कि इस मामले में भारत की ऊर्जा जरूरतों और मौजूदा परिस्थितियों को समझने के लिए समय देना जरूरी है। उनका यह बयान भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर टैरिफ लगाए जाने के सवाल के जवाब में आया।
रूस से तेल खरीद पर क्या बोले मार्को रुबियो?
रुबियो ने जॉइंट बेस एंड्रयूज में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि भारत अपनी ऊर्जा खरीद के स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हालांकि, भारत को अब भी रूस से काफी मात्रा में ऊर्जा मिल रही है। ऐसे में इतनी बड़ी आपूर्ति व्यवस्था से अचानक दूरी बनाना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत की ऊर्जा जरूरतों और मौजूदा निर्भरता को समझना जरूरी है। रुबियो के मुताबिक, किसी भी फैसले से पहले इन परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।
भारत को बताया अमेरिका का अहम साझेदार
अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत के साथ संबंधों को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि दोनों देश सहयोगी और साझेदार हैं। उनके बयान से संकेत मिलता है कि रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत के साथ बातचीत करते समय व्यापक द्विपक्षीय संबंधों और ऊर्जा से जुड़ी जरूरतों को भी ध्यान में रखा जा रहा है। भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अलग-अलग देशों से तेल खरीदता रहा है। रूस से आयात में बदलाव का असर कीमतों, आपूर्ति और घरेलू ऊर्जा जरूरतों पर पड़ सकता है। इसी वजह से ऊर्जा खरीद के स्रोतों में बदलाव एक चरणबद्ध प्रक्रिया हो सकती है।
टैरिफ लगाने के सवाल पर दिया जवाब
मीडिया ने रुबियो से पूछा कि रूस से तेल खरीदने के बावजूद अमेरिका ने भारत पर टैरिफ क्यों नहीं लगाया। जवाब में उन्होंने भारत की परिस्थितियों और रूसी ऊर्जा पर निर्भरता का उल्लेख किया। रुबियो ने कहा कि भारत के लिए इस व्यवस्था से तुरंत बाहर निकलना कठिन है और इस स्थिति को समझने के लिए समय चाहिए। उन्होंने टैरिफ या प्रतिबंधों से पहले भारत की ऊर्जा जरूरतों पर विचार करने की बात कही। हालांकि, उनके बयान को किसी नई व्यापार नीति या टैरिफ में आधिकारिक बदलाव की घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा क्यों है अहम?
भारत दुनिया के बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है और घरेलू मांग को पूरा करने के लिए उसे विदेशों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना पड़ता है। ऐसे में किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम करना और अलग-अलग स्रोतों से तेल हासिल करना ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का हिस्सा है। रूस से तेल खरीद में किसी बड़े बदलाव के लिए वैकल्पिक आपूर्ति, कीमतों और परिवहन व्यवस्था पर विचार करना होगा। अचानक बदलाव से लागत और आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका भी रहती है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर बनी रहेंगी निगाहें
मार्को रुबियो के बयान ने रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच बातचीत को फिर चर्चा में ला दिया है। एक ओर अमेरिका रूस की ऊर्जा से होने वाली आय को लेकर चिंतित रहा है, वहीं भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फैसले करता है।
आगे इस मुद्दे पर दोनों देशों की बातचीत, व्यापार नीति और ऊर्जा आयात से जुड़े आधिकारिक फैसले महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल, रुबियो के बयान में भारत की परिस्थितियों को समझने और किसी भी कदम से पहले ऊर्जा जरूरतों पर विचार करने पर जोर दिया गया है।