नई दिल्ली. भारत में एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट भेजने को लेकर तुर्की में भारी विवाद शुरू हो गया है। अंकारा में सवाल उठाए जा रहे हैं कि जिस अमेरिका ने रूसी एस-400 खरीदने की वजह से एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम से तुर्की को बाहर कर दिया था वही अमेरिका एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम ऑपरेट करने वाले देश भारत में अपने इस लड़ाकू विमान को कैसे भेज सकता है। राजस्थान के जोधपुर एयर फोर्स स्टेशन पर होने वाले संयुक्त युद्धाभ्यास एक्सरसाइज तरंग शक्ति 2026 में हिस्सा लेने के लिए अमेरिका ने अपने एफ-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान भेजे हैं। इसके बाद ही अंकारा में विवाद गहरा गया है। अंकारा में कहा जा रहा है कि यह वॉशिंगटन का विरोधाभासी रवैया है। तुर्की को लेकर अलग और भारत को लेकर अलग नियम अपनाए गए हैं।
तुर्की के आरोप और नाटो सदस्यता
तुर्की के कई मीडिया रिपोर्ट्स में भारत में एफ-35 लड़ाकू विमानों को भेजने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि तुर्की नाटो का सदस्य है फिर भी अमेरिका उसके साथ गलत सलूक कर रहा है। तुर्की के अखबारों में लिखा जा रहा है कि अमेरिका ने तुर्की को एफ-35 बेचने से इनकार कर दिया था। इसका कारण यह बताया गया कि तुर्की ने रूस में बने एस-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम को खरीदा और उसकी डिलीवरी भी ले ली। वाशिंगटन का तर्क था कि अगर एफ-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान को रूसी एस-400 सिस्टम के साथ इस्तेमाल किया जाता है तो एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम एफ-35 के रडार सिग्नेचर टैक्टिकल डेटा लिंक और स्टील्थ क्षमताओं की खुफिया जानकारी जुटा सकते हैं। इससे एफ-35 की क्षमता गंभीर तौर पर प्रभावित हो सकती है।
भारत के पास भी एस-400
दिलचस्प बात यह है कि भारत के पास भी रूसी एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद है और इसका इस्तेमाल पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने किया भी था। भारत ने 2018 में रूस के साथ एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को लेकर डील किया था। यह सौदा 5.33 अरब डॉलर का था जिसके तहत पांच स्क्वाड्रन भारत को मिलने थे। इनमें से चार की डिलीवरी हो चुकी है और संभावना है कि पांचवें स्क्वाड्रन की डिलीवरी भी अगले महीने तक हो जाएगी। तुर्की के डिफेंस एक्सपर्ट्स सवाल उठा रहे हैं कि एस-400 रखने के बावजूद अमेरिका भारत में एफ-35 भेज रहा है और उसे कोई हिचकिचाहट नहीं है। तुर्की के मीडिया आउटलेट येनी अकित ने लिखा है कि भारत में एफ-35 विमानों के साथ हुए युद्धाभ्यास में अमेरिका की भागीदारी से यह संकेत मिलता है कि इन दोनों देशों के प्रति अमेरिका का रवैया अलग-अलग है।
अमेरिका की सख्त शर्तें तुर्की के लिए
पिछले दिनों अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फिर से साफ किया है कि तुर्की को एफ-35 जेट देने के लिए वाशिंगटन की कानूनी शर्तें अभी भी पूरी नहीं हुई हैं। ग्रीक के अखबार काथिमेरिनी को दिए एक इंटरव्यू में मार्को रुबियो ने साफ तौर पर कहा कि जब तक वे शर्तें पूरी नहीं हो जातीं तब तक यह बिक्री आगे नहीं बढ़ सकती। यह बात इस हफ्ते तब फिर चर्चा में आई जब तुर्की के अधिकारियों ने वाशिंगटन के साथ फिर से इस मुद्दे पर बात करने की कोशिश की है। अमेरिका का रुख तुर्की के प्रति सख्त बना हुआ है जबकि भारत के साथ सैन्य सहयोग बढ़ रहा है। यह अंतर तुर्की में गुस्से का बड़ा कारण बन रहा है।
भारतीय अधिकारियों को करीब नहीं आने दिया
हालांकि विमानों के भारत में होने के बावजूद भारतीय अधिकारियों को इनके करीब जाने की अनुमति नहीं दी गई। भारतीय वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने अमेरिका के इस कदम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आप हमें विमानों के करीब भी नहीं आने देते और फिर भी हमें एफ-35 बेचने की बात कर रहे हैं। यह बयान अमेरिका की सावधानी और भारत के साथ तकनीकी सहयोग की सीमाओं को दर्शाता है। युद्धाभ्यास में भागीदारी के बावजूद संवेदनशील प्लेटफॉर्म तक पहुंच सीमित रखी गई है। भारतीय पक्ष ने भी इस पर अपना असंतोष जताया है।
दोहरे मापदंड का सवाल और क्षेत्रीय प्रभाव
तुर्की का आरोप है कि अमेरिका नाटो सहयोगी होने के बावजूद उसके साथ भेदभाव कर रहा है जबकि भारत जैसे गैर-नाटो देश के साथ लचीला रुख अपना रहा है। एस-400 खरीदने के बावजूद भारत में एफ-35 भेजना वाशिंगटन की नीति में असंगति का संकेत देता है। यह विवाद अमेरिका की वैश्विक रक्षा बिक्री नीति और सहयोगियों के साथ व्यवहार पर सवाल खड़े करता है। भारत-अमेरिका सैन्य सहयोग बढ़ने के साथ तुर्की-अमेरिका संबंधों में कड़वाहट जारी है। क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में यह मुद्दा आगे भी चर्चा का विषय बना रहेगा। दोनों देशों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं को रेखांकित करता है।