न्यूयार्क. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने बुधवार को उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट 2026 जारी की जिसमें जलवायु संकट की गंभीर तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट का शीर्षक द पॉइंट ऑफ रिटर्न रखा गया है और यह अगले महीने तुर्की में होने वाले COP31 से पहले आई है। इसमें कहा गया है कि वैश्विक तापमान वृद्धि पहले से ही प्री-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस पार करने की राह पर है। रिपोर्ट में सबसे कम संभव ओवरशूट परिदृश्य की जांच की गई है जिसमें सदी के मध्य तक तापमान 1.7 से 1.8 डिग्री तक सीमित रहे और 2100 तक वापस 1.5 डिग्री या उससे नीचे आ जाए। वर्तमान नीतियों के जारी रहने पर तापमान 2.8 डिग्री तक पहुंच सकता है और उसके बाद भी बढ़ता रहेगा। यह अनुमान पिछले वर्ष के आकलनों से बदतर हैं।
मौजूदा नीतियों से 2.8 डिग्री तक वृद्धि की आशंका
रिपोर्ट के अनुसार यदि दुनिया वर्तमान नीतियों पर ही चलती रही तो इस सदी में वैश्विक तापमान वृद्धि 2.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है। इसके बाद भी तापमान बढ़ने की संभावना बनी रहेगी। UNEP ने बताया कि ये आंकड़े पिछले वर्ष की तुलना में अधिक खराब इसलिए हैं क्योंकि अमेरिका पेरिस समझौते से अलग हो चुका है और ऐतिहासिक उत्सर्जन के संशोधित अनुमान जोड़े गए हैं। नए राष्ट्रीय निर्धारित योगदान यानी NDC जमा होने के बावजूद इन अनुमानों में नगण्य अंतर आया है। हर अतिरिक्त अंश और हर अतिरिक्त वर्ष 1.5 डिग्री से ऊपर तापमान बढ़ने से जलवायु प्रभाव और जोखिम बढ़ जाते हैं। बाढ़, गर्मी की लहरें और जंगली आग जैसी घटनाएं पहले ही कई देशों को प्रभावित कर रही हैं।
NDC लागू होने पर भी 2.6 डिग्री का खतरा
यदि सभी राष्ट्रीय निर्धारित योगदान पूरे किए जाएं और समान प्रयास जारी रहें तो भी इस सदी में तापमान वृद्धि 2.6 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रहेगी। यह लक्ष्य पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री लक्ष्य से काफी ऊपर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि NDC के पूर्ण क्रियान्वयन से 2030 तक उत्सर्जन में केवल 5 से 8 प्रतिशत और 2035 तक 11 से 15 प्रतिशत की कमी ही हो पाएगी जबकि 2025 के स्तर की तुलना में बात की जाए। दुनिया अभी भी लक्ष्यों से काफी पीछे चल रही है। सबसे आशावादी परिदृश्य में भी जहां सभी NDC और अतिरिक्त नेट-जीरो लक्ष्य हासिल हो जाएं तो तापमान वृद्धि केवल 2.1 डिग्री तक सीमित हो पाएगी। बिना तात्कालिक कार्रवाई के 1.7 से 1.8 डिग्री से नीचे शिखर तापमान रखना असंभव होता जाएगा।
1.5 डिग्री लक्ष्य के लिए जरूरी उत्सर्जन कटौती
सबसे अनुकूल मार्ग पर बने रहने के लिए वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कटौती जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 के स्तर की तुलना में 2030 तक 18 प्रतिशत, 2035 तक 45 प्रतिशत और 2040 तक 69 प्रतिशत कमी लानी होगी। वर्तमान उत्सर्जन स्तर पर हर पांच वर्ष कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन जारी रहने से शिखर तापमान लगभग 0.1 डिग्री बढ़ जाता है। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि शिखर तापमान को न्यूनतम रखने और सदी के अंत तक 1.5 डिग्री पर वापस लौटने के लिए सभी संभव प्रयास करने होंगे। यह लक्ष्य हासिल करना अभी भी संभव है लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। जलवायु प्रभावों को कम करने के लिए तुरंत और कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता रेखांकित की गई है।
कार्बन हटाने की विशाल आवश्यकता और अनिश्चितता
सबसे कम संभव 1.5 डिग्री ओवरशूट परिदृश्य में इस सदी के दौरान वायुमंडल से लगभग 320 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड हटाना और स्थायी रूप से भंडारण करना होगा। यह मात्रा 2024 के वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लगभग आठ वर्षों के बराबर है। सामाजिक-आर्थिक और तकनीकी चुनौतियों के कारण इस लक्ष्य को हासिल करने की संभावना अनिश्चित बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्बन हटाने की तकनीकें अभी पूर्ण विकसित नहीं हैं और बड़े पैमाने पर उनका क्रियान्वयन कठिन साबित हो सकता है। फिर भी अवसर मौजूद हैं क्योंकि नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है और कोयला तथा तेल की आपूर्ति अनुमान से धीमी गति से बढ़ रही है। इन सकारात्मक संकेतों का लाभ उठाना जरूरी है।
UNEP प्रमुख का आह्वान और आगे की राह
UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि 1.5 डिग्री से ऊपर तापमान का हर अतिरिक्त अंश और हर अतिरिक्त वर्ष जलवायु प्रभावों तथा जोखिमों को बढ़ा देता है। उन्होंने इस वर्ष कई देशों में आई जानलेवा बाढ़, गर्मी की लहरों और जंगली आग का जिक्र करते हुए कहा कि शिखर तापमान को न्यूनतम रखने और सदी के अंत तक 1.5 डिग्री पर लौटने के लिए सभी संभव प्रयास करने होंगे। यह लक्ष्य अभी भी हासिल किया जा सकता है। रिपोर्ट COP31 से पहले आई है जहां देशों से अधिक महत्वाकांक्षी प्रतिबद्धताओं की उम्मीद की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो जलवायु संकट और गहराता जाएगा। वैश्विक सहयोग और तात्कालिक कार्रवाई ही एकमात्र रास्ता बचा है।