भोपाल डेस्क. बिस्तर पर लेटते समय कई लोग किताब के बजाय मोबाइल उठा लेते हैं। 2025 में प्रकाशित एक सर्वेक्षण में 122,058 वयस्कों में से 41 प्रतिशत ने बताया कि वे सोने से एक घंटे पहले हर रात स्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं। केवल 17 प्रतिशत ने स्क्रीन से पूरी तरह दूरी बनाए रखने की बात कही। शाम को स्क्रीन के उपयोग को खराब नींद से जोड़ा गया है। कई अध्ययनों में यह संबंध सामने आया है। स्क्रीन की रोशनी शरीर की नींद की लय को प्रभावित कर सकती है। आधुनिक जीवनशैली में यह आदत आम होती जा रही है।
ब्लू लाइट को लेकर आम धारणा
स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी में नीले रंग की मात्रा अधिक होती है। इसी वजह से कई लोग ब्लू लाइट को खराब नींद का मुख्य कारण मानते हैं। बाजार में ब्लू लाइट फिल्टर वाले चश्मे सॉफ्टवेयर और स्क्रीन अटैचमेंट उपलब्ध हैं। लेकिन ब्लू लाइट के खिलाफ उपलब्ध सबूत उतने मजबूत नहीं हैं जितना प्रचार किया जाता है। वैज्ञानिक अध्ययन इस धारणा पर सवाल उठा रहे हैं। रंग की बजाय रोशनी की कुल तीव्रता अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। उपभोक्ताओं को सही जानकारी की जरूरत है।
शरीर की जैविक घड़ी और रोशनी
शरीर की दैनिक लय मस्तिष्क की सर्केडियन घड़ी द्वारा नियंत्रित होती है। यह सुबह सतर्कता और शाम को नींद का एहसास पैदा करती है। रोशनी इस घड़ी की गति तय करती है। आंखों में कुछ कोशिकाएं मेलेनोप्सिन नामक प्रकाश संवेदी वर्णक रखती हैं। ये कोशिकाएं दृष्टि में मदद नहीं करतीं बल्कि सर्केडियन घड़ी के न्यूरॉन्स को संकेत भेजती हैं। इससे मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है जो रात संबंधी शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रेरित करता है। इस प्रक्रिया से शरीर पृथ्वी के दिन-रात चक्र के साथ तालमेल बिठाता है।
मेलेनोप्सिन और मेलाटोनिन का संबंध
मेलेनोप्सिन युक्त कोशिकाएं रोशनी का पता लगाकर मस्तिष्क को संकेत देती हैं। यह संकेत मेलाटोनिन के स्तर को नियंत्रित करता है। शाम को तेज रोशनी मेलाटोनिन को दबाती है जिससे नींद आने में देरी होती है। ब्लू लाइट इन कोशिकाओं को अधिक सक्रिय कर सकती है लेकिन कुल चमक का प्रभाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अध्ययन बताते हैं कि रोशनी की तीव्रता रंग की तुलना में अधिक निर्णायक भूमिका निभाती है। सही समय पर अंधेरा मेलाटोनिन बढ़ाने में मदद करता है। नींद की गुणवत्ता के लिए यह संतुलन जरूरी है।
रंग से ज्यादा चमक का महत्व
नए शोध संकेत देते हैं कि ब्लू लाइट की तुलना में रोशनी की कुल चमक नींद को ज्यादा प्रभावित करती है। तेज रोशनी चाहे किसी भी रंग की हो सर्केडियन घड़ी को प्रभावित कर सकती है। कम चमक वाली रोशनी में ब्लू लाइट का असर सीमित हो सकता है। कई प्रयोगों में चमक को नियंत्रित करने पर रंग का प्रभाव कम नजर आया। इसलिए सिर्फ ब्लू लाइट फिल्टर पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं। स्क्रीन की ब्राइटनेस कम करना अधिक प्रभावी उपाय हो सकता है। वैज्ञानिक इस दिशा में और अध्ययन कर रहे हैं।
सही आदतों की सलाह और निष्कर्ष
सोने से पहले स्क्रीन का उपयोग कम करना सबसे अच्छा विकल्प है। यदि उपयोग जरूरी हो तो स्क्रीन की चमक बहुत कम कर दें। कमरे की रोशनी भी मंद रखें। ब्लू लाइट फिल्टर सहायक हो सकते हैं लेकिन केवल उन पर निर्भर न रहें। नियमित सोने का समय और अंधेरा कमरा नींद की गुणवत्ता सुधारता है। शरीर की प्राकृतिक लय का सम्मान करना सबसे प्रभावी तरीका है। सही आदतों से बेहतर नींद संभव है।