कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परंपराओं, लोकविश्वासों और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम है। महाषष्ठी के बाद महासप्तमी की सुबह होने वाले नवपत्रिका स्नान के दौरान एक ऐसी परंपरा देखने को मिलती है, जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इसमें केले के पेड़ को दुल्हन की तरह सजाकर पूजा पंडाल में लाया जाता है। इसे कोलाबौ (कला बऊ) कहा जाता है। खास बात यह है कि इस परंपरा में प्रकृति को देवी के स्वरूप में सम्मान देने का भाव जुड़ा हुआ है।
कोलाबौ आखिर कौन हैं? जानिए इस नाम का अर्थ
बंगाली भाषा में ‘कोला’ का अर्थ केला और ‘बौ’ का अर्थ दुल्हन या पत्नी होता है। इसी वजह से केले के पौधे को साड़ी पहनाकर सजाने की परंपरा को कोलाबौ नाम से जाना जाता है। हालांकि, धार्मिक दृष्टि से कोलाबौ केवल दुल्हन के रूप में सजा हुआ केले का पेड़ नहीं है। यह नवपत्रिका का प्रमुख हिस्सा है, जिसकी पूजा देवी दुर्गा की शक्ति के प्रतीक के रूप में की जाती है।
नवपत्रिका क्या है? नौ पौधों से जुड़ा है देवी की आराधना का रहस्य
नवपत्रिका का अर्थ नौ पौधों के समूह से है। इसमें केला, कचू, हल्दी, जयंती, बेल, अनार, अशोक, मानकचू और धान के पौधे या उनके हिस्से शामिल किए जाते हैं। इन सभी को एक साथ बांधकर पूजा की जाती है। परंपरागत मान्यताओं में प्रत्येक पौधे को देवी के एक अलग स्वरूप से जोड़ा गया है। इस तरह नवपत्रिका प्रकृति में मौजूद जीवनदायिनी शक्ति और देवी के विभिन्न रूपों का प्रतीक बन जाती है।
केले के पेड़ को ही क्यों पहनाई जाती है दुल्हन जैसी साड़ी?
इस अनुष्ठान में केले का पौधा सबसे प्रमुख दिखाई देता है। इसे आमतौर पर सफेद या क्रीम रंग की साड़ी, जिस पर लाल किनारा होता है, पहनाया जाता है। इसके बाद इसे पारंपरिक बंगाली दुल्हन की तरह सजाया जाता है। केले का पौधा नवपत्रिका के अन्य आठ पौधों को एक साथ बांधने का आधार भी बनता है। भारतीय परंपरा में केले के पौधे को समृद्धि, उर्वरता और शुभता से भी जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि नवपत्रिका में इसे विशेष स्थान प्राप्त है।
क्या कोलाबौ भगवान गणेश की पत्नी हैं?
दुर्गा पूजा के पंडालों में कोलाबौ को भगवान गणेश की प्रतिमा के पास रखा जाता है। दुल्हन की तरह सजे होने और गणेश के बगल में स्थापित किए जाने के कारण कई लोग उन्हें गणेश की पत्नी मानते हैं। हालांकि, यह लोकप्रिय लोकमान्यता है, नवपत्रिका पूजा का मुख्य धार्मिक अर्थ नहीं। इस अनुष्ठान में नौ पौधों के समूह को देवी की शक्ति के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। इसलिए कोलाबौ की पहचान को केवल गणेश की पत्नी तक सीमित करना इस परंपरा के व्यापक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को पूरी तरह व्यक्त नहीं करता।
महासप्तमी की सुबह क्यों होता है कोलाबौ स्नान?
दुर्गा पूजा के महासप्तमी अनुष्ठान में सुबह-सुबह नवपत्रिका को नदी या अन्य निर्धारित जलाशय में स्नान कराया जाता है। इसे नवपत्रिका स्नान या कोलाबौ स्नान कहा जाता है। कोलकाता में हुगली नदी के विभिन्न घाटों पर श्रद्धालु और पुजारी इस परंपरा का पालन करते हैं। स्नान के बाद नवपत्रिका को नई साड़ी पहनाकर पूजा पंडाल तक लाया जाता है। वहां पुरोहित विधि-विधान से पूजा करते हैं और इसे देवी दुर्गा की प्रतिमा के साथ स्थापित किया जाता है। यह अनुष्ठान महासप्तमी की पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नवपत्रिका पूजा का कृषि और प्रकृति से क्या संबंध है?
बंगाल की संस्कृति में खेती, फसल और प्रकृति का धार्मिक जीवन से गहरा संबंध रहा है। नवपत्रिका में धान, केला और हल्दी जैसे पौधों का शामिल होना इस जुड़ाव को दर्शाता है। कई सांस्कृतिक व्याख्याओं में इस परंपरा को फसल, उर्वरता और जीवन के पोषण से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं के साथ देखा जाता है। पौधों की पूजा के माध्यम से प्रकृति की उस शक्ति का सम्मान किया जाता है, जो मनुष्य को भोजन और जीवन के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराती है। इस लिहाज से कोलाबौ की परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम भी है।
दुर्गा पूजा 2026 में कब मनाई जा रही है कोलाबौ पूजा?
वर्ष 2026 में महासप्तमी 17 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जा रही है। इसी दिन नवपत्रिका पूजा और कोलाबौ स्नान की परंपरा निभाई जाती है। कोलकाता के विभिन्न घाटों पर सुबह से ही इस अनुष्ठान के दृश्य देखने को मिलते हैं। हालांकि, पूजा के सटीक समय में स्थानीय पंचांग और पूजा समितियों की परंपराओं के अनुसार अंतर हो सकता है।
कोलाबौ की परंपरा क्यों है खास?
कोलाबौ की परंपरा बंगाल की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी पहचान है। केले के पौधे को दुल्हन की तरह सजाने के पीछे केवल एक सुंदर दृश्य प्रस्तुत करना उद्देश्य नहीं है। यह अनुष्ठान देवी की शक्ति, प्रकृति की महत्ता, कृषि और जीवन के पोषण के बीच संबंध को दर्शाता है। दुर्गा पूजा के दौरान देवी की प्रतिमा के साथ नवपत्रिका की आराधना इस विचार को सामने लाती है कि प्रकृति भी शक्ति और जीवन का महत्वपूर्ण स्रोत है। यही वजह है कि सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बंगाल की दुर्गा पूजा का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।