कोलकाता डेस्क: शरद पूर्णिमा की रात को हिंदू धर्म में बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। यही वजह है कि इस दिन कई घरों में मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल समेत देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को **कोजागरी लक्ष्मी पूजा** के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर घरों की साफ-सफाई की जाती है, दीप जलाए जाते हैं और मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए मुख्य द्वार से पूजा स्थल तक उनके चरण बनाए जाते हैं। लेकिन आखिर शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा क्यों की जाती है और उनके चरण बनाने के पीछे क्या मान्यता है? आइए जानते हैं।
शरद पूर्णिमा पर क्यों होती है मां लक्ष्मी की पूजा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास की पूर्णिमा को मां लक्ष्मी की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ‘कोजागरी’ शब्द का संबंध ‘को जागर्ति’ से माना जाता है, जिसका अर्थ है—‘कौन जाग रहा है?’ मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और जागकर उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। इसीलिए कई लोग रात में जागकर मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी के चरण क्यों बनाए जाते हैं?
शरद पूर्णिमा के अवसर पर मां लक्ष्मी के चरण बनाने की परंपरा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ये चरण देवी के घर में आगमन का प्रतीक होते हैं। भक्त घर के मुख्य दरवाजे से पूजा स्थल तक मां लक्ष्मी के पैरों के निशान बनाते हैं, ताकि ऐसा प्रतीत हो कि देवी स्वयं उनके घर में प्रवेश कर रही हैं। माना जाता है कि मां लक्ष्मी के आगमन से घर में सुख, शांति, धन-धान्य और खुशहाली बनी रहती है। हालांकि, यह आस्था और परंपरा से जुड़ी मान्यता है।
बंगाल में अल्पना बनाकर होता है मां लक्ष्मी का स्वागत
पश्चिम बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। यहां घरों में मां लक्ष्मी की पूजा के साथ पारंपरिक अल्पना बनाने की परंपरा भी निभाई जाती है। अल्पना आमतौर पर चावल के घोल से जमीन पर बनाई जाती है। इसमें मां लक्ष्मी के चरण, कमल के फूल और अन्य शुभ आकृतियां बनाई जाती हैं। कई घरों में मुख्य द्वार से अंदर की ओर जाते हुए चरण चिह्न बनाए जाते हैं। इन्हें मां लक्ष्मी के घर में प्रवेश करने का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा बंगाल की लोक संस्कृति, कला और धार्मिक आस्था का सुंदर संगम है।
मां लक्ष्मी के चरणों की दिशा का क्या है महत्व?
कई परिवारों में मां लक्ष्मी के चरण इस तरह बनाए जाते हैं कि उनके पंजे घर के अंदर की ओर दिखाई दें। इसके पीछे मान्यता है कि मां लक्ष्मी घर में प्रवेश कर रही हैं और अपने साथ सुख-समृद्धि ला रही हैं। कुछ जगहों पर चरणों को पूजा स्थल तक बनाया जाता है, जबकि कुछ परिवार मुख्य द्वार पर ही इन्हें बनाते हैं। इनकी बनावट और दिशा से जुड़ी परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकती हैं।
शरद पूर्णिमा की रात में क्या-क्या किया जाता है?
इस दिन भक्त सुबह घर की साफ-सफाई करते हैं और शाम को मां लक्ष्मी की पूजा की तैयारी करते हैं। घर के मुख्य द्वार को फूलों, रंगोली या अल्पना से सजाया जाता है। पूजा के दौरान मां लक्ष्मी को फूल, फल, मिठाई और अन्य भोग अर्पित किए जाते हैं। कई परिवार रात में दीप जलाकर मां लक्ष्मी से सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं। कुछ परंपराओं में चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की प्रथा भी है। हालांकि, पूजा की विधि और रीति-रिवाज परिवार तथा क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा का संदेश
शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा केवल धन प्राप्ति की कामना तक सीमित नहीं है। यह परिवार की सुख-शांति, खुशहाली और अच्छे भविष्य की प्रार्थना का भी अवसर है। मां लक्ष्मी के चरण बनाकर उनका स्वागत करना भक्तों की श्रद्धा और देवी के प्रति सम्मान को दर्शाता है। बंगाल में अल्पना के जरिए निभाई जाने वाली यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े हुए है।