भोपाल डेस्क. शरद पूर्णिमा केवल एक तिथि नहीं बल्कि वह पावन क्षण है जब प्रकृति पुरुष और परमात्मा एक ही लय में स्पंदित होते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की यह पूर्णिमा सनातन परंपरा में सर्वोच्च स्थान रखती है। इसी रात्रि चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है। भक्त इस दिन जागरण कर मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की युगल पूजा करते हैं। मान्यता है कि मां लक्ष्मी धरती पर विचरण करती हैं और जाग्रत भक्तों को विशेष कृपा प्रदान करती हैं। यह रात्रि अंतःकरण की शुद्धि और दिव्य प्रेम की अनुभूति का द्वार खोलती है। साधक इस अवसर को आत्मनिरीक्षण और भगवद् भक्ति में डूबने के लिए उपयोग करते हैं।
महा रास: प्रेम की वह पराकाष्ठा जो अवर्णनीय है
भागवत पुराण के अनुसार इसी पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन की कुंज गलियों में महा रास का दिव्य आयोजन किया था। रस स्वयं भगवान हैं जैसा वेदों में घोषित है। जब वह रस जीवों पर बरसता है तो रास बनता है और जब असंख्य गोपियों के साथ एक साथ प्रवाहित होता है तो महा रास कहलाता है। महा रास क्या है इसे कोई नहीं बता सकता यहाँ तक कि स्वयं श्रीकृष्ण भी नहीं। गोपियाँ उस समय भगवान को भगवान के रूप में नहीं जानती थीं फिर भी उनका निश्छल प्रेम इतना शक्तिशाली सिद्ध हुआ कि अशुद्ध भी शुद्ध हो गया। जैसे मैली नदी गंगा में मिलकर स्वयं गंगा बन जाती है वैसे ही गोपियों का मन कृष्ण स्पर्श से दिव्य हो गया। यह लीला प्रेम की सर्वोच्च अवस्था का साक्षात्कार है।
दार्शनिक दृष्टि: शुद्धता और निष्काम प्रेम का सिद्धांत
शरद पूर्णिमा हमें सिखाती है कि भगवान की प्राप्ति ज्ञान की जटिलता से नहीं बल्कि प्रेम की सरलता से होती है। चाहे भक्त भगवान को भगवान जाने या न जाने जब तक प्रेम मन से है फल अवश्य मिलता है। पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है चाहे स्पर्श से हो या प्रहार से। कृष्ण विशुद्ध हैं। अपवित्र का पवित्र से संपर्क होने पर अपवित्र पवित्र हो जाता है जबकि पवित्र कभी अपवित्र नहीं होता। काम क्रोध लोभ मोह अहंकार जैसी आंतरिक व्याधियाँ मन को आच्छादित किए रहती हैं। इस रात्रि का चंद्रमा इन व्याधियों पर अमृत की वर्षा करता है बशर्ते साधक जाग्रत रहे। कोजागरी की परंपरा यही पूछती है कि कौन जाग रहा है। जागने का अर्थ आँखें खोलना नहीं बल्कि अंतरात्मा को जगाना है।
सांस्कृतिक वैभव और क्षेत्रीय परंपराएँ
भारतवर्ष में शरद पूर्णिमा अनेक नामों और रूपों में मनाई जाती है। बंगाल में लक्ष्मी पूर्णिमा महाराष्ट्र में कोजागिरी ओडिशा में कुमार पूर्णिमा और कई क्षेत्रों में नवन्ना पूर्णिमा के नाम से जानी जाती है। कुंवारी कन्याएँ उपयुक्त वर की कामना से व्रत रखती हैं। घर घर गाय के दूध से बनी खीर तैयार की जाती है और खुले आकाश के नीचे रखी जाती है ताकि चंद्रमा की किरणें उसे अमृत बना दें। यह पर्व कृषि संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा है क्योंकि शरद ऋतु फसलों की परिपक्वता का काल है। रासलीला के लोक नाट्य कृष्ण भक्ति के गीत और रात्रि जागरण मिलकर एक ऐसी सांस्कृतिक धारा बनाते हैं जो हजारों वर्षों से अविच्छिन्न बह रही है। विविधता में एकता का यह उत्सव भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: चंद्रमा मन और प्रकृति का संतुलन
आधुनिक विज्ञान भी पूर्णमासी के प्रभावों को पूर्णतः नकार नहीं सकता। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण न केवल समुद्र की लहरों को प्रभावित करता है बल्कि मानव शरीर के जल तत्त्व और मनोदशा पर भी असर डालता है। कई अध्ययन बताते हैं कि पूर्णिमा की रात निद्रा चक्र भावनात्मक संवेदनशीलता और कुछ शारीरिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन देखा जाता है। आयुर्वेद में चंद्रमा को मन का अधिष्ठाता कहा गया है। शरद ऋतु में आकाश स्वच्छ होता है आर्द्रता कम होती है और चंद्रमा की रोशनी पृथ्वी तक निर्बाध पहुँचती है। खीर को खुले में रखने की परंपरा संभवतः इस प्राकृतिक अमृत को ग्रहण करने का प्राचीन तरीका थी। विज्ञान इसे सांस्कृतिक विश्वास कह सकता है परंतु अनुभव की सत्यता को अस्वीकार नहीं कर सकता।
आत्मचिंतन और दिव्य प्रेम का आह्वान
प्रत्येक वर्ष शरद पूर्णिमा पर पिछले वर्ष के कार्यों पर चिंतन करना आवश्यक है। कितनी आसक्तियाँ कम हुईं कितने क्रोध को प्रेम में बदला और कितने अहंकार को विनम्रता में गलाया। महा रास की रात हमें याद दिलाती है कि भगवान का प्रेम बिना शर्त है परंतु उसकी प्राप्ति के लिए पात्रता चाहिए। पाँच हजार वर्ष पूर्व इसी पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों को दिव्य प्रेम का वरदान दिया था। यह रात्रि हमें आमंत्रित करती है कि हम भी उस निश्छल प्रेम को अपने जीवन में उतारें। आज जब हम इस पर्व को मनाएँ तो केवल खीर बनाकर नहीं बल्कि हृदय को पूर्णतः खोलकर मनाएँ। चंद्रमा आकाश में पूर्ण है प्रश्न यह है कि हमारा अंतःकरण कितना पूर्ण है।