नई दिल्ली. हिमालयन मोनाल उत्तराखंड और नेपाल में ही नहीं भूटान पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक के हिमालय क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक पहचान रहे हैं। नर मोनाल की आवाज से ही पता चल जाता है कि वह दुश्मन के प्रति नाराजगी या गुस्से का इजहार कर रहा है या फिर मादा मोनाल को अपने प्रेम के प्रति आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन उत्तराखंड में पांच साल में हुई दो स्टडी में यह बात सामने आई है कि जिन स्थानों पर इंसानी कोलाहाल बढ़ी है इन्हें अपना ठिकाना बदलने के साथ अपनी आवाज में भी बदलाव करना पड़ रहा है। यह पक्षी अपनी रंग-बिरंगी आभा और विशिष्ट ध्वनि के लिए प्रसिद्ध है।
पहली स्टडी के निष्कर्ष
पहली स्टडी में यह पता चला है कि पहाड़ी जंगलों के ऊपर अल्पाइन घास के मैदानों में उनके प्राकृतिक आवास तक मानवीय गतिविधियां बढ़ी हैं तो उन्हें और भी ऊंचे हिमालय की ओर बढ़ना पड़ रहा है। यह वो क्षेत्र हैं जहां बर्फ में तेजी से हो रहे पिघलाव की वजह से उन्हें अपना घर बसाना आसान हो रहा है। इंसानी दखल बढ़ने से मोनाल अपने पारंपरिक आवास छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जाना उनके लिए नया अनुकूलन है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तन और मानवीय दबाव दोनों का परिणाम है। पक्षियों के प्रवास पैटर्न में यह बदलाव चिंता का विषय है।
दूसरी स्टडी आवाज पर केंद्रित
दूसरी स्टडी विशेष तौर पर इस बात को लेकर है कि ज्यादा शोर शराबे में उन्हें किस तरह से अपनी आवाज में परिवर्तन करके अपना संदेश देना पड़ रहा है। बीबीसी ने इसके शोधकर्ताओं से बातचीत की है जिन्होंने काफी चौंकाने वाली जानकारियां साझा की हैं। यह शोध हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी से जुड़े दिनेश कुमार शर्मा और आनंद कुमार ने राजीव लोचन की अगुवाई में की है। इसमें मानवीय गतिविधियों के चलते हिमालयन मोनाल के बर्ताव में आ रहे बदलावों पर फोकस है। शोध उत्तराखंड के दो अलग-अलग क्षेत्रों में किया गया है।
शोध के क्षेत्र और विधि
शोध चोपता में केदारनाथ कस्तूरी मृग अभयारण्य और मदमहेश्वर की शांत घाटी में किया गया। नाम से ही पता चलता है कि केदारनाथ घाटी के इलाके में आजकल इंसानी गतिविधियां बहुत ज्यादा बढ़ चुकी हैं और मदमहेश्वर आज भी बहुत दुर्गम है तथा केदारनाथ घाटी की तुलना में कहीं ज्यादा शांत है। दुर्गम क्षेत्र होने की वजह से वहां लोगों का पहुंचना आज भी बहुत कठिन है। शोधकर्ताओं ने दोनों स्थानों पर मोनाल पक्षी के 700 से अधिक आवाजें रिकॉर्ड कीं और फिर अप्रैल 2023 के बाद एक साल तक इनकी पिच आवाज की लंबाई और बैकग्राउंड शोर के लेवल को मापा।
आवाज में पाया गया अंतर
शोधकर्ताओं ने पाया कि मदमहेश्वर घाटी के शांत इलाके के मुकाबले चोपता के अधिक कोलाहल वाले माहौल में हिमालयी मोनाल ऐसी आवाजें निकाल रहे थे जिनकी पीक फ्रीक्वेंसी बहुत ही अधिक थी। हालांकि यह अंतर इंसानी कानों से महसूस होना मुश्किल है। शोर भरे वातावरण में पक्षी अपनी आवाज की आवृत्ति बढ़ाकर संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। यह अनुकूलन उनके संचार प्रणाली में बदलाव दर्शाता है। लंबे समय तक ऐसा परिवर्तन उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। शोध से स्पष्ट है कि मानवीय शोर पक्षियों की प्राकृतिक ध्वनि को बदल रहा है।
खतरे की घंटी और भविष्य
रिसर्च टीम यह मानकर चल रही है कि यह शोध अभी शुरुआती है और इससे यह तय नहीं हो जाता कि केदार घाटी के मोनाल की आवाज अब हमेशा के लिए बदल चुकी है। लेकिन यह हिमालय पर बढ़ रहे आधुनिक दबाव को लेकर खतरे की एक घंटी जरूर है। प्रकृति ने पक्षियों को जिन आवाजों से नवाजा है वह ध्वनि के माध्यम से संचार का एक बहुत ही जटिल और दुर्लभ रूप है। इनमें अगर कोई बड़ा बदलाव होता है तो पहले से ही विलुप्त होने का संकट झेल रहे इन मोनाल परिंदों की प्रजनन क्षमता भी प्रभावित होगी जो साथी को आकर्षित करने के लिए आवाज को ही प्रमुख संकेत के रूप में इस्तेमाल करते हैं। संरक्षण प्रयासों की सख्त जरूरत है।