देहरादून. भारत में भालुओं की कितनी आबादी है और उनकी चारों प्रजातियां किन इलाकों में पाई जाती हैं इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान यानी WII देहरादून ने बड़ा अभियान शुरू किया है। संस्थान के अधिकारी के अनुसार शुरुआती चरण में संरक्षित क्षेत्रों में स्लॉथ भालू और इंसानों के बीच टकराव पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। सभी चारों प्रजातियों की संख्या का आकलन करने की योजनाएं भी तैयार की जाएंगी। भालुओं की संख्या के अंतिम आंकड़े सामने आने में करीब पांच साल लग सकते हैं। यह अध्ययन वन्यजीव संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भारत में पाई जाने वाली चार प्रजातियां
भारत में हिमालयी भूरा भालू एशियाई काला भालू स्लॉथ भालू और सन भालू पाए जाते हैं। इनका प्राकृतिक आवास और भौगोलिक फैलाव अलग-अलग है। हिमालयी भूरा भालू ऊंचाई वाले हिमालयी और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। लद्दाख और जम्मू-कश्मीर इसके प्रमुख आवास हैं। एशियाई काला भालू हिमालयी और पूर्वोत्तर भारत के वन क्षेत्रों में रहता है। स्लॉथ भालू भारत के कई हिस्सों में शुष्क और नम पर्णपाती जंगलों कांटेदार वनों तथा झाड़ीदार क्षेत्रों में पाया जाता है। सन भालू सबसे छोटी प्रजाति है जिसका मुख्य आवास दक्षिण-पूर्व एशिया है लेकिन भारत में पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों तक सीमित है।
पांच साल तक क्यों चलेगा अध्ययन
भालू घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। ऐसे में उनकी संख्या का विश्वसनीय अनुमान लगाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी प्राकृतिक आवास और गतिविधियों का गहन अध्ययन जरूरी है। घने जंगलों में सीधे गिनती संभव नहीं होती इसलिए लंबी अवधि का सर्वेक्षण आवश्यक है। विभिन्न मौसमों और क्षेत्रों में डेटा जुटाने में समय लगता है। वैज्ञानिक पद्धतियों से सटीक आंकड़े हासिल करने के लिए पांच साल का समय रखा गया है। यह अवधि अध्ययन की विश्वसनीयता सुनिश्चित करेगी।
आकलन से मिलने वाले जवाब
इस आकलन से तीन प्रमुख सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद है। पहला देश में अलग-अलग प्रजातियों की आबादी का अनुमान। दूसरा उनके मौजूदा आवास और भौगोलिक फैलाव की जानकारी। तीसरा उन क्षेत्रों की पहचान जहां भालुओं और लोगों के बीच आमना-सामना अधिक होता है। इन जानकारियों से संरक्षण योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उपाय भी तैयार किए जा सकेंगे। पूरे देश की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।
गिनती के तरीके और चुनौतियां
जंगलों में रहने वाले हर भालू को सीधे देखकर गिनना आसान नहीं है। वन्यजीवों के आकलन में कैमरा ट्रैप पंजों के निशान मल के नमूनों और अन्य प्राकृतिक संकेतों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इनसे किसी क्षेत्र में भालुओं की मौजूदगी और गतिविधियों के बारे में जानकारी मिलती है। भारतीय वन्यजीव संस्थान ने विस्तृत सर्वेक्षण पद्धति का पूरा ब्योरा अभी सार्वजनिक नहीं किया है। इसलिए इन तरीकों को अंतिम कार्ययोजना नहीं माना जाना चाहिए। चुनौतियों के बावजूद वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएंगे।
मानव-भालू टकराव और संरक्षण का महत्व
जंगलों के आसपास मानवीय गतिविधियों का विस्तार प्राकृतिक आवास में बदलाव और भोजन की तलाश में भालुओं का आबादी वाले क्षेत्रों के करीब पहुंचना टकराव की आशंका बढ़ाता है। स्लॉथ भालू के साथ टकराव भारत के कई हिस्सों में चिंता का विषय है। हिमालयी क्षेत्रों में भूरे और काले भालुओं के साथ भी घटनाएं होती हैं। विश्वसनीय आंकड़े संरक्षण योजनाएं बनाने और स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करेंगे। चारों प्रजातियों का आकलन पूरा होने के बाद वैज्ञानिक आधार पर फैसले लिए जा सकेंगे।