बॉम्बे ब्लड ग्रुप एक अत्यंत दुर्लभ रक्त समूह है जिसे चिकित्सा भाषा में बॉम्बे फीनोटाइप या hh ब्लड ग्रुप कहा जाता है। सामान्यतः लोगों का रक्त समूह ए बी एबी या ओ होता है लेकिन यह ग्रुप उन सबसे पूरी तरह अलग है। भारत में लगभग 10 हजार व्यक्तियों में से किसी एक में यह पाया जाता है जबकि यूरोप में इसकी आवृत्ति लगभग 10 लाख में एक तक सीमित है। इस ग्रुप वाले व्यक्ति को रक्त चढ़ाने के लिए आमतौर पर इसी दुर्लभ ग्रुप के डोनर की आवश्यकता होती है। ओ ब्लड ग्रुप को भी दुर्लभ माना जाता है लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप के लिए वह भी सुरक्षित नहीं होता। इसकी दुर्लभता के कारण आपातकालीन स्थितियों में विशेष व्यवस्था की जरूरत पड़ती है।
खून में एच एंटीजन की भूमिका
मनुष्य के रक्त में एक विशेष प्रोटीन होता है जिसे एच एंटीजन कहते हैं। यही एंटीजन यह निर्धारित करता है कि रक्त समूह ए बी या ओ क्या होगा। जिन व्यक्तियों के रक्त में एच एंटीजन बिल्कुल अनुपस्थित होता है उनका रक्त समूह बॉम्बे ब्लड ग्रुप कहलाता है। सामान्य जांच में यह ग्रुप बिल्कुल ओ ब्लड ग्रुप जैसा दिखाई देता है इसलिए इसकी सही पहचान के लिए विशेष प्रक्रियाओं की जरूरत होती है। साधारण रक्त परीक्षण से इसे आसानी से पहचाना नहीं जा सकता। चिकित्सकों को कई स्तर की जांच करनी पड़ती है तभी इसकी पुष्टि होती है। इस विशेषता के कारण ही यह ग्रुप इतना विशिष्ट और दुर्लभ माना जाता है।
खोज की कहानी और पहला केस
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की खोज वर्ष 1952 में मुंबई में डॉ. वाई. एम. भेंडे और उनकी टीम ने की थी। यह रक्त समूह सबसे पहले 1952 में बॉम्बे यानी वर्तमान मुंबई में एक परिवार में पाया गया था जिसकी वजह से इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप नाम दिया गया। उस समय यह खोज चिकित्सा जगत के लिए आश्चर्यजनक थी क्योंकि इससे पहले इस प्रकार के रक्त समूह की कोई जानकारी नहीं थी। गंगाराम अस्पताल के चिकित्सकों का कहना है कि इस ग्रुप वाले व्यक्तियों के लिए किसी अन्य से रक्त लेना और दान करना दोनों ही चुनौतीपूर्ण होता है। खोज के सात दशक बाद भी इसकी दुर्लभता बनी हुई है।
सामान्य जीवन और स्वास्थ्य पर प्रभाव
बॉम्बे ब्लड ग्रुप अत्यंत दुर्लभ होने के बावजूद कोई बीमारी नहीं है। इस रक्त समूह वाले व्यक्ति बिल्कुल स्वस्थ रहते हैं और सामान्य लोगों की तरह ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। उन्हें कोई विशेष शारीरिक समस्या नहीं होती। परेशानी तब उत्पन्न होती है जब किसी दुर्घटना इलाज या गंभीर बीमारी के दौरान रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी स्थिति में समान डोनर खोजना अत्यंत कठिन हो जाता है। यदि डोनर मिल भी जाए तो वह आमतौर पर केवल एक या दो यूनिट रक्त ही दान कर सकता है। इसलिए ऐसे व्यक्तियों को नियमित रूप से अपने रक्त समूह की जानकारी अस्पतालों में दर्ज करानी चाहिए।
रक्त चढ़ाने की चुनौतियां और सावधानियां
बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति को सामान्य ए बी एबी या ओ ग्रुप का रक्त कदापि नहीं चढ़ाया जा सकता क्योंकि इससे गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है। केवल इसी ग्रुप का रक्त ही सुरक्षित माना जाता है। आपातकालीन स्थितियों में डोनर उपलब्ध न होने पर चिकित्सकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। कई अस्पताल अब दुर्लभ रक्त समूहों के डोनर रजिस्ट्री बना रहे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत संपर्क किया जा सके। ऐसे व्यक्तियों को अपनी चिकित्सा फाइल में स्पष्ट रूप से इस तथ्य का उल्लेख कराना चाहिए। जागरूकता बढ़ाने से ही समय पर सही रक्त उपलब्ध कराया जा सकता है।
जागरूकता और भविष्य की जरूरत
बॉम्बे ब्लड ग्रुप की दुर्लभता को देखते हुए समाज में इसकी जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। रक्तदान शिविरों में दुर्लभ समूहों की विशेष जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। चिकित्सकीय शिक्षा में भी इस विषय को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि नए चिकित्सक इसकी पहचान में दक्ष हों। डोनर रजिस्ट्री को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने से कई जानें बचाई जा सकती हैं। समय रहते सही पहचान और तैयारी से इस दुर्लभ रक्त समूह वाले व्यक्तियों को आपातकाल में बेहतर सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। कुल मिलाकर जागरूकता और वैज्ञानिक तैयारी दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।