भोपाल डेस्क. 24-Oct,-1945 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रभावी होने के साथ जिस वैश्विक संस्था का जन्म हुआ, उसके पीछे द्वितीय विश्वयुद्ध की भयावह स्मृतियाँ थीं। करोड़ों लोगों की मृत्यु, हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमों का प्रहार, शहरों का विनाश और मानव गरिमा का अभूतपूर्व पतन इस बात के प्रमाण थे कि यदि राष्ट्र अपनी शक्ति को किसी साझा नैतिक व्यवस्था के अधीन नहीं करेंगे तो आधुनिक सभ्यता अपनी ही उपलब्धियों से विनाश का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। राष्ट्र संघ की विफलता ने भी स्पष्ट कर दिया था कि केवल सद्भावनाओं से विश्व शांति सुरक्षित नहीं रह सकती। उसके लिए प्रभावी संस्थाओं, सामूहिक प्रतिबद्धताओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। इसके चार्टर ने अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने, मानवाधिकारों को प्रोत्साहित करने तथा आर्थिक-सामाजिक समस्याओं के समाधान में सहयोग करने का संकल्प व्यक्त किया। चौबीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला संयुक्त राष्ट्र दिवस इसी ऐतिहासिक संकल्प का स्मरण कराता है। वर्ष दो हजार पच्चीस में इस संस्था ने अपनी स्थापना के अस्सी वर्ष पूरे किए और वर्ष दो हजार छब्बीस उसके आठ दशकों के अनुभव, उपलब्धियों तथा अधूरे वादों की समीक्षा का अवसर बन गया है। मूल प्रश्न यह है कि क्या दुनिया ने संयुक्त राष्ट्र को इतना अधिकार, संसाधन और राजनीतिक समर्थन दिया है कि वह अपने उद्देश्यों को पूरा कर सके, या उसे उन शक्तियों की सीमाओं में काम करने के लिए छोड़ दिया गया है जिनके व्यवहार को नियंत्रित करना उसका घोषित उद्देश्य है।
आठ दशकों की उपलब्धियाँ और संवाद का जीवित मंच
संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन उसके योगदान का निष्पक्ष आकलन करने के लिए यह समझना आवश्यक है कि उसने किन परिस्थितियों में और किस सीमा तक काम किया है। शीतयुद्ध के दशकों में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक, सैन्य तथा परमाणु प्रतिस्पर्धा के बावजूद संयुक्त राष्ट्र ने संवाद के लिए एक ऐसा मंच उपलब्ध कराया जहाँ विरोधी राष्ट्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क बनाए रख सकते थे। इस संस्था की विभिन्न एजेंसियों ने स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, शरणार्थी सहायता और बाल कल्याण के क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहयोग को बढ़ावा दिया। यूनिसेफ ने बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों में योगदान दिया। खाद्य एवं कृषि संगठन ने खाद्य सुरक्षा और कृषि विकास को आगे बढ़ाया, जबकि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त के कार्यालय ने विस्थापित लोगों की सहायता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष उन्नीस सौ अड़तालीस में अपनाई गई मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा ने यह विचार वैश्विक विमर्श के केंद्र में स्थापित किया कि मानव की गरिमा और मूल अधिकार किसी सरकार की कृपा पर निर्भर नहीं होने चाहिए। उपनिवेशवाद के अंत और नए स्वतंत्र राष्ट्रों के उदय के दौर में भी संयुक्त राष्ट्र ने आत्मनिर्णय तथा संप्रभु समानता के विचारों को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान की। शांति अभियानों के माध्यम से उसके सैनिकों और नागरिक कर्मियों ने अनेक संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में युद्धविराम की निगरानी, नागरिक सुरक्षा और शांति-निर्माण में योगदान दिया, यद्यपि हर अभियान सफल नहीं रहा। सतत विकास लक्ष्यों ने गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण को साझा वैश्विक एजेंडे का हिस्सा बनाया। इन उपलब्धियों का महत्त्व इसलिए भी है कि संयुक्त राष्ट्र कोई विश्व सरकार नहीं है। उसके पास स्वतंत्र वैश्विक पुलिस बल, असीमित वित्तीय संसाधन या सदस्य देशों की संप्रभुता से ऊपर खड़े होकर हर निर्णय लागू करने की सार्वभौमिक शक्ति नहीं है। उसकी सफलता सदस्य राष्ट्रों के सहयोग पर निर्भर करती है। फिर भी उसकी उपलब्धियाँ यह प्रमाणित करती हैं कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहतीं। पर्याप्त सहयोग मिलने पर वे मानव जीवन को ठोस रूप से बेहतर बना सकती हैं।
वीटो की राजनीति और सुरक्षा परिषद की संस्थागत विडंबना
संयुक्त राष्ट्र की सबसे गंभीर संरचनात्मक कमजोरी सुरक्षा परिषद में निहित है। यह परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से संबंधित सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था है, लेकिन इसकी स्थायी सदस्यता और वीटो व्यवस्था द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की शक्ति-संरचना को प्रतिबिंबित करती है। अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को स्थायी सदस्यता तथा महत्त्वपूर्ण विषयों पर नकारात्मक मत के माध्यम से निर्णय रोकने का विशेषाधिकार प्राप्त है। यह व्यवस्था उस समय एक व्यावहारिक राजनीतिक समझौते के रूप में सामने आई थी, क्योंकि विश्व व्यवस्था के निर्माताओं का मानना था कि प्रमुख शक्तियों को साथ रखे बिना कोई अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था टिक नहीं सकती। किंतु आज यही समझौता गंभीर प्रश्नों का स्रोत बन चुका है। जब किसी युद्ध, मानवीय संकट या अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के प्रश्न पर किसी स्थायी सदस्य के रणनीतिक हित प्रभावित होते हैं, तब परिषद की कार्रवाई ठप पड़ सकती है। परिणामस्वरूप जिन परिस्थितियों में सामूहिक कार्रवाई की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उन्हीं परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता सबसे अधिक परीक्षा से गुजरती है। वीटो का मूल उद्देश्य महाशक्तियों को संस्था से बाहर जाने से रोकना था, लेकिन उसका बार-बार राजनीतिक उपयोग सामूहिक सुरक्षा की भावना को कमजोर करता है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या पाँच देशों को प्राप्त विशेषाधिकार आज भी दुनिया के लगभग सभी देशों के जीवन, सुरक्षा और भविष्य से जुड़े निर्णयों पर निर्णायक प्रभाव रखने चाहिए। क्या किसी एक स्थायी सदस्य का राष्ट्रीय हित करोड़ों लोगों की सुरक्षा से अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है। सुरक्षा परिषद में सुधार की चर्चा दशकों से चल रही है, लेकिन जिन देशों के पास विशेषाधिकार हैं, उनके सहयोग के बिना उस व्यवस्था को बदलना कठिन है। इस प्रकार सुधार की प्रक्रिया उसी शक्ति-संतुलन से बँधी हुई है, जिसे सुधारने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यही संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत विडंबना है। वह समानता और सामूहिक सुरक्षा का आदर्श प्रस्तुत करता है, लेकिन उसकी सर्वोच्च सुरक्षा संस्था में समानता का सिद्धांत अधूरा है।
प्रतिनिधित्व का संकट और बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय दुनिया में स्वतंत्र राष्ट्रों की संख्या आज की तुलना में बहुत कम थी। उपनिवेशवाद से मुक्ति, एशिया और अफ्रीका में नए राष्ट्रों का उदय तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में विकासशील देशों की बढ़ती भूमिका ने अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में उस परिवर्तन का पर्याप्त प्रतिबिंब नहीं दिखाई देता। अफ्रीका, जहाँ अनेक संघर्षों, शांति अभियानों और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों से जुड़े प्रश्न परिषद के सामने आते हैं, को कोई स्थायी सीट प्राप्त नहीं है। लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र का भी स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश, जो संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लंबे समय से योगदान देते रहे हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी तथा कूटनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं, स्थायी सदस्यता से बाहर हैं। जापान, जर्मनी, ब्राजील और अनेक अन्य देशों की दावेदारी भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। दूसरी ओर केवल बड़ी जनसंख्या या आर्थिक शक्ति के आधार पर स्थायी सीट देना भी पर्याप्त समाधान नहीं होगा। छोटे द्वीपीय राष्ट्रों, अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं और उन क्षेत्रों की आवाज को भी महत्त्व मिलना चाहिए, जो जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, खाद्य संकट और विस्थापन से असमान रूप से प्रभावित होते हैं। इसलिए सुरक्षा परिषद में सुधार का उद्देश्य केवल कुछ नए शक्तिशाली देशों को पुरानी व्यवस्था में शामिल करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निर्णय-प्रक्रिया को अधिक प्रतिनिधिक और उत्तरदायी बनाना होना चाहिए। सितंबर दो हजार चौबीस में स्वीकार किए गए भविष्य के लिए समझौते ने भी सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक, समावेशी, पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। इसमें अफ्रीका के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को प्राथमिकता देने और एशिया-प्रशांत तथा लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व में सुधार की बात कही गई। सुधार पर अंतरसरकारी वार्ताएँ वर्ष दो हजार छब्बीस में भी जारी हैं, लेकिन वार्ताओं का जारी रहना और वास्तविक संरचनात्मक परिवर्तन होना दो अलग बातें हैं। संयुक्त राष्ट्र को अब यह स्वीकार करना होगा कि प्रतिनिधित्व केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह निर्णयों की वैधता और उन निर्णयों को स्वीकार करने की वैश्विक इच्छा से भी जुड़ा हुआ है।
क्षेत्रीय गुटों का विस्तार और सामूहिक सुरक्षा की चुनौती
शीतयुद्ध के बाद की दुनिया में क्षेत्रीय और सैन्य गुटों का महत्त्व लगातार बढ़ा है। उत्तर अटलांटिक संधि संगठन अर्थात नाटो इसका प्रमुख उदाहरण है। इसकी स्थापना उन्नीस सौ उनचास में सामूहिक रक्षा की अवधारणा के आधार पर हुई थी। यूरोपीय सुरक्षा, रूस के साथ तनाव, यूक्रेन युद्ध और सदस्य देशों की सामरिक चिंताओं ने इसकी भूमिका को और महत्त्वपूर्ण बना दिया है। इसके अतिरिक्त यूरोपीय संघ, अफ्रीकी संघ, आसियान, शंघाई सहयोग संगठन और क्वाड जैसे विभिन्न क्षेत्रीय या रणनीतिक मंच अलग-अलग उद्देश्यों के साथ काम करते हैं। इन सभी की प्रकृति एक जैसी नहीं है। कुछ आर्थिक एकीकरण और क्षेत्रीय सहयोग पर केंद्रित हैं, कुछ सुरक्षा सहयोग करते हैं, जबकि कुछ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपने सदस्यों के हितों का समन्वय करते हैं। फिर भी इनका विस्तार एक बुनियादी प्रश्न उठाता है। जब राष्ट्र अपनी सुरक्षा, व्यापार और रणनीतिक हितों के लिए क्षेत्रीय गठबंधनों पर अधिक भरोसा करने लगते हैं, तब वैश्विक संस्था की केंद्रीय भूमिका किस सीमा तक बनी रह सकती है। इसका उत्तर यह नहीं है कि नाटो जैसे सभी संगठन संयुक्त राष्ट्र के प्रतिद्वंद्वी हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अध्याय आठ क्षेत्रीय व्यवस्थाओं को मान्यता देता है और क्षेत्रीय सहयोग को प्रोत्साहित करने की गुंजाइश प्रदान करता है। क्षेत्रीय संगठन संघर्षों की रोकथाम, मध्यस्थता, शांति स्थापना और मानवीय सहायता में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शक्तिशाली राष्ट्र वैश्विक सहमति बनाने की कठिन प्रक्रिया से बचते हुए सैन्य कार्रवाई करते हैं, या अपने गठबंधन के हितों को व्यापक अंतरराष्ट्रीय वैधता से ऊपर रखते हैं। नाटो की कार्रवाई हो, रूस की सैन्य नीति हो, अथवा किसी अन्य शक्ति का एकतरफा हस्तक्षेप—प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके विशिष्ट तथ्यों, अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी गठबंधन का सदस्य होना अपने आप में किसी कार्रवाई को वैध या अवैध नहीं बनाता। लेकिन यदि दुनिया की प्रमुख शक्तियाँ अपने-अपने सुरक्षा समूहों के माध्यम से निर्णय लेने लगें और संयुक्त राष्ट्र केवल बाद में मानवीय संकटों का प्रबंधन करे, तो सामूहिक सुरक्षा की मूल अवधारणा कमजोर पड़ती है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र को क्षेत्रीय संगठनों से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उनके साथ स्पष्ट कार्य-विभाजन, सूचना-साझाकरण और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि क्षेत्रीय सहयोग वैश्विक शांति को मजबूत करे, न कि दुनिया को परस्पर विरोधी शक्ति-क्षेत्रों में बाँट दे।
युद्ध रोकने की सीमाएँ और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता
संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा तब होती है जब युद्ध में नागरिक मारे जाते हैं, अस्पताल और विद्यालय नष्ट होते हैं, लाखों लोग अपने घर छोड़ने को विवश होते हैं और युद्धविराम की अपीलें राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में उलझ जाती हैं। यूक्रेन युद्ध, गाजा का मानवीय संकट, सूडान में संघर्ष तथा अन्य हिंसाग्रस्त क्षेत्रों ने बार-बार यह प्रश्न उठाया है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास केवल चिंता व्यक्त करने और प्रस्ताव पारित करने की क्षमता है, या वह समय रहते विनाश को रोकने में भी सक्षम है। प्रत्येक संघर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, जिम्मेदारियाँ और कानूनी परिस्थितियाँ अलग हैं। इसलिए सभी घटनाओं को एक ही कसौटी पर रखकर सरल निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता की निर्बाध पहुँच, युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन ऐसे दायित्व हैं जिन्हें राजनीतिक पसंद के अनुसार नहीं बदला जा सकता। सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता का एक कारण वीटो है, लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं है। सदस्य देशों की अनिच्छा, सीमित संसाधन, युद्धरत पक्षों का असहयोग, शांति अभियानों के लिए अपर्याप्त राजनीतिक समर्थन और जटिल क्षेत्रीय परिस्थितियाँ भी प्रभावशीलता को प्रभावित करती हैं। किसी प्रस्ताव को पारित कर देना और उसे जमीन पर लागू करा पाना अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है, हालांकि वह संयुक्त राष्ट्र का अंग नहीं है और उसकी अधिकार-सीमा अपनी संधि तथा लागू कानूनी प्रावधानों से निर्धारित होती है। संयुक्त राष्ट्र को अपनी नैतिक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय कानून की व्याख्या और उसके पालन की माँग में दोहरे मानदंड न हों। यदि किसी मित्र राष्ट्र की कार्रवाई पर मौन और विरोधी राष्ट्र की कार्रवाई पर कठोरता दिखाई देती है, तो संस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठेंगे। विश्वसनीयता केवल निष्पक्ष होने के दावे से नहीं, बल्कि समान परिस्थितियों में समान सिद्धांत लागू करने से अर्जित होती है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र की सफलता का वास्तविक पैमाना उसके भाषणों और घोषणाओं की संख्या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उसने कितने संघर्षों को बढ़ने से रोका, कितने नागरिकों की रक्षा की और कितने राजनीतिक विवादों को हिंसा के स्थान पर वार्ता के माध्यम से सुलझाने में सहायता की।
वीटो सुधार की व्यावहारिक जरूरत और शक्ति पर अंकुश
सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए केवल सदस्य संख्या में वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी। निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी सुधार करना होगा। यदि नए स्थायी सदस्य जोड़ दिए जाएँ, लेकिन वीटो का विशेषाधिकार उसी तरह सीमित हाथों में बना रहे, तो परिषद की लोकतांत्रिक प्रकृति में अपेक्षित परिवर्तन नहीं आएगा। दूसरी ओर वीटो को तत्काल पूरी तरह समाप्त करने की माँग के सामने संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की जटिल प्रक्रिया और स्थायी सदस्यों की सहमति की वास्तविक बाधा भी मौजूद है। इसलिए सुधार की रणनीति को आदर्शवाद और व्यावहारिक राजनीति के बीच संतुलन बनाना होगा। पहला कदम यह हो सकता है कि जब कोई स्थायी सदस्य वीटो का प्रयोग करे, तो उसे महासभा के समक्ष सार्वजनिक रूप से अपने निर्णय का औचित्य स्पष्ट करना पड़े। दूसरा, सामूहिक अत्याचारों और बड़े मानवीय संकटों से जुड़े मामलों में वीटो के स्वैच्छिक संयम के लिए मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता विकसित की जाए। तीसरा, वीटो के प्रयोग पर अधिक पारदर्शिता, नियमित समीक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। यह भी आवश्यक है कि सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली अधिक खुली हो तथा गैर-स्थायी सदस्यों और संबंधित क्षेत्रीय समूहों को निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी मिले। महासभा की भूमिका को मजबूत करने से उन परिस्थितियों में व्यापक राजनीतिक विमर्श संभव हो सकता है, जब सुरक्षा परिषद किसी मुद्दे पर निर्णय लेने में विफल रहती है। हालांकि महासभा के अधिकार और सुरक्षा परिषद की बाध्यकारी शक्तियाँ समान नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र की दो हजार चौबीस की भविष्य-संबंधी घोषणा में वीटो के दायरे और उपयोग को सीमित करने पर चर्चा तेज करने तथा सुरक्षा परिषद के कामकाज को अधिक लोकतांत्रिक और जवाबदेह बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई थी। वास्तविक सुधार के लिए इन प्रतिबद्धताओं को समयबद्ध वार्ताओं, स्पष्ट प्रस्तावों और राजनीतिक इच्छाशक्ति में बदलना आवश्यक है। कोई भी व्यवस्था तभी न्यायपूर्ण बन सकती है जब शक्ति के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा हो। यदि वीटो को पूरी तरह समाप्त करना निकट भविष्य में संभव नहीं है, तो कम-से-कम उसके प्रयोग को असाधारण परिस्थिति तक सीमित करने और गंभीर मानवीय संकटों में उसे रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव की ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिसे अनदेखा करना राजनीतिक रूप से महँगा पड़े।
भारत की भूमिका: प्रतिनिधित्व से आगे वैश्विक नेतृत्व की ओर
संयुक्त राष्ट्र सुधार की बहस में भारत का पक्ष केवल स्थायी सदस्यता प्राप्त करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल है, एक प्रमुख अर्थव्यवस्था है, विकासशील देशों के हितों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में ऐतिहासिक योगदान देता रहा है। भारत की दावेदारी का आधार जनसंख्या, लोकतांत्रिक अनुभव, आर्थिक क्षमता, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण के साथ उसके संबंधों का संयुक्त प्रभाव होना चाहिए। लेकिन किसी देश की पात्रता केवल उसके आकार से निर्धारित नहीं की जा सकती। उसे यह भी प्रदर्शित करना होता है कि वह व्यापक अंतरराष्ट्रीय हितों, क्षेत्रीय स्थिरता और संस्थागत सुधार के लिए कितना रचनात्मक योगदान दे सकता है। भारत को ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ-साथ अफ्रीकी संघ तथा लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देशों की आकांक्षाओं को भी गंभीरता से समझना चाहिए। अफ्रीका के ऐतिहासिक रूप से अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को सुधारना किसी एक देश की दावेदारी का विकल्प नहीं, बल्कि व्यापक न्याय का प्रश्न है। भारत को जलवायु न्याय, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल तकनीक की समान उपलब्धता, आतंकवाद से निपटने, विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहयोग और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर व्यावहारिक पहल करनी चाहिए। उसे यह भी दिखाना होगा कि वह मतभेद रखने वाले देशों के बीच संवाद स्थापित कर सकता है और अपने राष्ट्रीय हितों को व्यापक वैश्विक उत्तरदायित्व के साथ संतुलित कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता की माँग तभी अधिक प्रभावशाली होगी जब वह एक व्यापक सुधारवादी दृष्टि के साथ प्रस्तुत हो। ऐसी दृष्टि जिसमें केवल नई शक्तियों को स्थान न मिले, बल्कि छोटे देशों की आवाज भी अधिक प्रभावशाली बने। भारत के लिए यह अवसर है कि वह सुधार की बहस को पुराने विशेषाधिकारों के पुनर्वितरण से आगे बढ़ाकर अधिक न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की दिशा में ले जाए।
इक्कीसवीं सदी की चुनौतियाँ और घोषणाओं से परिणामों तक का मार्ग
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ऐसे समय हुई थी जब विश्व शांति का केंद्रीय प्रश्न मुख्यतः युद्ध, सैन्य आक्रमण और राष्ट्रों के बीच संघर्ष था। आज ये खतरे समाप्त नहीं हुए हैं, बल्कि इनके साथ नई और अधिक जटिल चुनौतियाँ जुड़ गई हैं। जलवायु परिवर्तन से समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, चरम मौसम की घटनाएँ खाद्य सुरक्षा और आजीविका को प्रभावित कर रही हैं तथा छोटे द्वीपीय राष्ट्रों के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ, साइबर हमले, दुष्प्रचार और डिजिटल निगरानी ने सुरक्षा की परिभाषा को बदल दिया है। महामारी ने दिखाया कि किसी एक देश की स्वास्थ्य संबंधी विफलता वैश्विक संकट में बदल सकती है। आर्थिक असमानता, ऋण संकट, जबरन विस्थापन और संसाधनों पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा सकती हैं। ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र को केवल संकट के बाद राहत पहुँचाने वाली संस्था बनकर नहीं रहना चाहिए। उसे संकट की पूर्व पहचान, वैज्ञानिक जानकारी के साझाकरण, साझा मानकों के निर्माण और देशों के बीच समन्वय की प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में ऐसी वैश्विक नीतियों की आवश्यकता है जो नवाचार को प्रोत्साहित करें, लेकिन मानवाधिकारों, निजता और सुरक्षा की रक्षा भी करें। जलवायु परिवर्तन पर विकासशील देशों की वित्तीय और तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करना भी उतना ही आवश्यक है जितना उत्सर्जन कम करने की प्रतिबद्धताओं पर जोर देना। वैश्विक स्वास्थ्य के मामले में दवाओं, टीकों और वैज्ञानिक संसाधनों की समान उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। सतत विकास लक्ष्यों को केवल सम्मेलनों के दस्तावेजों में सीमित रखने के बजाय उनके लिए पर्याप्त वित्त, मापने योग्य प्रगति और उत्तरदायी संस्थागत तंत्र विकसित करने होंगे। शांति का अर्थ केवल सीमाओं पर गोलाबारी का न होना नहीं है। वह ऐसी परिस्थितियों के निर्माण से भी जुड़ा है जिनमें लोगों को भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अवसर प्राप्त हों। संयुक्त राष्ट्र जितनी गंभीरता से इन परस्पर जुड़ी चुनौतियों को समझेगा, उतना ही वह भविष्य की दुनिया के लिए प्रासंगिक बना रह सकेगा। सदस्य देशों को यह स्वीकार करना होगा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग केवल संकट के समय उपयोगी विकल्प नहीं, बल्कि साझा अस्तित्व की आवश्यकता है। सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, वीटो के उपयोग पर जवाबदेही सुनिश्चित करने और महासभा की भूमिका मजबूत करने के साथ-साथ संगठन के वित्तीय आधार को स्थिर बनाना होगा। सदस्य देशों को अपने निर्धारित वित्तीय योगदान समय पर देने चाहिए ताकि शांति अभियानों, मानवीय सहायता और विकास कार्यक्रमों को संसाधनों की अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। शांति अभियानों को स्पष्ट जनादेश, पर्याप्त संसाधन और राजनीतिक समर्थन दिया जाना चाहिए। साथ ही उनकी विफलताओं, नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े जोखिमों और जवाबदेही की कमियों की स्वतंत्र समीक्षा भी होनी चाहिए। संघर्षों की रोकथाम के लिए मध्यस्थता, कूटनीति और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में निवेश बढ़ाना होगा, क्योंकि युद्ध शुरू होने के बाद उसे रोकना अक्सर कहीं अधिक कठिन और महँगा होता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन को प्रभावशाली बनाने के लिए देशों को केवल विरोधी राष्ट्रों के मामलों में नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों के आचरण के प्रश्न पर भी समान सिद्धांत अपनाने होंगे। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, प्रशासनिक पारदर्शिता, परिणामों का सार्वजनिक मूल्यांकन और अनावश्यक दोहराव में कमी भी आवश्यक है। वैश्विक दक्षिण, नागरिक समाज, वैज्ञानिक समुदाय, युवाओं और प्रभावित समुदायों की आवाज को उचित संस्थागत अवसर मिलने चाहिए, जबकि अंतिम निर्णयों में सदस्य देशों की वैधानिक भूमिका का सम्मान बना रहे। इन सुधारों के लिए किसी एक सम्मेलन या एक वर्ष की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। आवश्यक है कि सदस्य देश स्पष्ट प्राथमिकताएँ तय करें, नियमित रूप से प्रगति की समीक्षा करें और विफलताओं के लिए जिम्मेदारी स्वीकार करें। संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी इमारत, ध्वज या विशाल महासभा कक्ष नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति वह विश्वास है जिसके आधार पर राष्ट्र अपनी तात्कालिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर साझा नियमों का पालन करने के लिए तैयार होते हैं। उस विश्वास को पुनर्स्थापित करना ही संस्थागत सुधार का केंद्रीय उद्देश्य होना चाहिए।
मानवता के नाम अधूरा वादा और आगे का रास्ता
संयुक्त राष्ट्र के भविष्य पर विचार करते समय स्वीडिश राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव डैग हैमरशोल्ड की उस भावना को याद करना उपयोगी है जो संस्था के उद्देश्य को रेखांकित करती है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना मानवता को स्वर्ग तक पहुँचाने के लिए नहीं, बल्कि उसे नरक से बचाने के लिए हुई थी। इस कथन का आशय यह नहीं कि संयुक्त राष्ट्र की सीमाओं को स्वीकार करके सुधार की माँग छोड़ दी जाए। बल्कि यह है कि उसकी उपयोगिता को असंभव पूर्णता के बजाय वास्तविक मानवीय परिणामों की कसौटी पर परखा जाए। महात्मा गांधी से संबद्ध प्रसिद्ध विचार—आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देती है—भी प्रतिशोध और अंतहीन संघर्ष की सीमाओं की ओर संकेत करता है। यह विचार संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का विकल्प नहीं, लेकिन उसके पीछे निहित उस नैतिक आवश्यकता को समझने में मदद करता है जिसके अनुसार शक्ति को विवेक और उत्तरदायित्व के अधीन होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र चार्टर की प्रस्तावना आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाने और मानव गरिमा में विश्वास की पुष्टि करने का संकल्प व्यक्त करती है। यही संकल्प इस संस्था का नैतिक आधार है। आज दुनिया को ऐसे संयुक्त राष्ट्र की आवश्यकता है जो शक्तिशाली देशों के लिए केवल कूटनीतिक सुविधा और कमजोर देशों के लिए केवल अंतिम आशा बनकर न रह जाए, बल्कि सभी के लिए समान नियमों और साझा उत्तरदायित्व का मंच बने। इसके लिए महाशक्तियों को अपने विशेषाधिकारों पर पुनर्विचार करना होगा, उभरती शक्तियों को व्यापक वैश्विक जिम्मेदारियाँ स्वीकार करनी होंगी और छोटे देशों को निर्णय-प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी मिलनी चाहिए। क्षेत्रीय गठबंधनों को वैश्विक व्यवस्था के पूरक के रूप में काम करना होगा, जबकि संयुक्त राष्ट्र को अपनी कमियों से बचने के बजाय उन्हें सुधारने का साहस दिखाना होगा। वर्ष दो हजार पच्चीस में पूरे हुए आठ दशक केवल अतीत की उपलब्धियों का उत्सव नहीं हैं। वे भविष्य के प्रति उत्तरदायित्व की याद दिलाते हैं। इक्कीसवीं सदी में संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता इस बात से तय नहीं होगी कि उसके कितने सदस्य हैं या उसके मंच पर कितने भाषण दिए जाते हैं, बल्कि इस बात से होगी कि वह युद्ध की संभावना कितनी कम करता है, अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा कितनी निष्पक्षता से करता है और मानवता के साझा संकटों के समाधान में कितना ठोस योगदान देता है। संयुक्त राष्ट्र को अप्रासंगिक होने से बचाने का रास्ता उसकी आलोचना को दबाने में नहीं, बल्कि आलोचना को सुधार की शक्ति में बदलने में है। दुनिया को एक ऐसे वैश्विक मंच की आवश्यकता आज भी है—लेकिन उस मंच को अब अपनी स्थापना के आदर्शों और वर्तमान वास्तविकताओं के बीच की दूरी कम करनी ही होगी।