नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल की आने वाली किताब ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ के कुछ हिस्सों का हवाला देते हुए कांग्रेस ने रविवार को मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला। पार्टी ने कहा कि न्यायिक नियुक्तियों में सरकार का कथित दखल और मामलों के आवंटन में हस्तक्षेप के दावों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कांग्रेस का कहना है कि संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से पूरी तरह मुक्त रहना चाहिए। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक मीडिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए यह बयान दिया।
किताब में उठाए गए मुख्य दावे
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखे अपने पोस्ट में कहा कि जस्टिस संजय किशन कौल की किताब ने मोदी सरकार के समय में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि जस्टिस कौल ने कई चिंताजनक घटनाओं को किताब में सामने लाया है। इनमें न्यायिक नियुक्तियों में सरकार का कथित दखल, कॉलेजियम की बैठकों से पहले सरकार की मंजूरी लेने की कोशिशें और अल्पसंख्यक समुदाय के एक जज की जाति के बारे में सरकार द्वारा पूछा गया सवाल शामिल हैं। कॉलेजियम वह व्यवस्था है जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण होते हैं।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश पर भी सवाल
रमेश ने अपने पोस्ट में आगे लिखा कि हैरानी की बात है कि भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने इस बात से इनकार नहीं किया है कि न्यायिक नियुक्ति से पहले सरकार के साथ बातचीत होती है। जब पूर्व सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ खुद मानते हैं कि सरकार सीजेआई के साथ बातचीत करती है और नियुक्ति प्रक्रिया में भूमिका निभाती है तो न्यायपालिका की आजादी को लेकर चिंताएं और भी गहरी हो जाती हैं। कांग्रेस का कहना है कि अगर नियुक्ति से पहले सरकार की मंजूरी लेने की कोशिश हो रही है तो यह कॉलेजियम सिस्टम की आजादी पर सवाल खड़ा करता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पांडुलिपि में पूर्व सीजेआई को सरकार के प्रति बहुत ज्यादा सम्मानजनक बताया गया है।
मामलों के री-असाइनमेंट पर आरोप
रमेश ने जस्टिस कौल के एक और महत्वपूर्ण दावे का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एक मामला जस्टिस कौल से सलाह किए बिना दूसरी बेंच को सौंप दिया गया था। इसकी वजह यह बताई गई कि जस्टिस कौल की अगुवाई वाली बेंच ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी पीएमएलए के तहत एक मामले में अदालत के फैसले के कुछ हिस्सों पर फिर से विचार करने की संभावना जताई थी। रमेश ने कहा कि यह घटना सुप्रीम कोर्ट के रोजमर्रा के कामकाज में सरकार के दखल की हद को दिखाती है। संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली बेंचें बदल दिए जाने को गंभीर मुद्दा बताया गया।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर
जयराम रमेश ने जोर देते हुए कहा कि संविधान को बनाए रखने और उसकी रक्षा करने का काम जिस संस्था को सौंपा गया है उसे सत्ता में बैठे लोगों के दबाव और असर से पूरी तरह आजाद रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की आजादी सिर्फ एक विकल्प नहीं है बल्कि यह बहुत जरूरी है। इसके बिना लोकतंत्र कमजोर हो जाता है। कांग्रेस का आरोप है कि जिन मुद्दों पर पहले कई लोग खुलकर बात करने में हिचकिचाते थे उन्हें अब जस्टिस कौल ने सोच-समझकर और साफ-साफ लिखा है। पार्टी ने इन दावों को गंभीरता से लेने की मांग की है।
कॉलेजियम व्यवस्था और सरकार की भूमिका पर बहस
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि न्यायिक नियुक्तियों के लिए सरकारी मंजूरी लेने का दबाव और संवेदनशील मामलों की बेंच बदलने जैसी घटनाएं न्यायपालिका पर दबाव डालने और उसकी आजादी को कम करने का प्रयास हैं। पार्टी का कहना है कि लोकतंत्र की सुरक्षा के हित में इन सवालों का जवाब जरूरी है। जस्टिस कौल की किताब के दावों ने एक बार फिर कॉलेजियम व्यवस्था में सरकार की भूमिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बहस छेड़ दी है। कांग्रेस ने संविधान की मूल भावना के अनुरूप न्यायपालिका को पूरी तरह स्वतंत्र रखने पर बल दिया है।