बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद हुए पहले आम चुनाव ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है। जहां तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, वहीं कट्टरपंथी विचारधारा वाले जमात-ए-इस्लामी को भले ही सीमित सफलता मिली हो, लेकिन उसकी 76 सीटें भारत के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। विशेष रूप से इसलिए, क्योंकि ये सीटें ज्यादातर भारत-बांग्लादेश सीमा के आसपास के जिलों में स्थित हैं, जहां पहले से ही कट्टरपंथ, तस्करी और घुसपैठ जैसे नेटवर्क सक्रिय रहे हैं। यही कारण है कि चुनावी हार के बावजूद संगठन का उभार भारत के लिए एक दीर्घकालिक सुरक्षा चुनौती के रूप में सामने आ रहा है।
सीमा से लगे जिलों में जमात की निर्णायक बढ़त और रणनीतिक संकेत
जमात जिन 76 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही है, उनका भूगोल अपने आप में खतरे की घंटी है। सतखीरा में सभी चार सीटों पर जीत, कुश्तिया और बागेरहाट में तीन-तीन सीटों पर कब्जा और रंगपुर, जॉयपुरहाट, नाओगांव, गाइबांधा जैसे इलाकों में प्रभाव जमात के सीमाई विस्तार को उजागर करता है। ये वही क्षेत्र हैं जो पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर भारत की सीमा के बेहद निकट हैं। इन क्षेत्रों में ऐतिहासिक रूप से जमात के नेटवर्क तस्करी, अवैध प्रवासन और चरमपंथी गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। सीमाई जिलों पर नियंत्रण जमात को भारत के खिलाफ अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के अवसर प्रदान करता है।
चुनावी हार के बावजूद जमात की रणनीतिक मजबूती का कारण
जमात-ए-इस्लामी की वर्तमान स्थिति सतही तौर पर कमजोर दिखाई दे सकती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सीमाई जिलों पर उसकी पकड़ राजनीतिक जीत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। चुनाव हारने का अर्थ शक्ति खो देना नहीं है, क्योंकि कट्टरपंथी नेटवर्क संरचनाओं के सहारे वे सामाजिक और आर्थिक नियंत्रण बनाए रखते हैं। सीमाई जिलों में इस उपस्थिति का अर्थ यह है कि जमात अब भी स्थानीय प्रशासनिक ढांचे, सामाजिक समूहों और धार्मिक संस्थानों पर प्रभाव डालने की स्थिति में है, जिससे भारत के खिलाफ अस्थिरता बढ़ाने की आशंका बनी रहती है।
कट्टरपंथी नेटवर्क का विस्तार और भारत की सुरक्षा पर प्रत्यक्ष खतरा
पिछले वर्षों में मुर्शिदाबाद दंगों, असम में असारुल बांग्ला टीम के कट्टरपंथियों की गिरफ्तारी और कई अन्य घटनाओं में बांग्लादेशी तत्वों की भूमिका उजागर हुई है। यह पहले से स्थापित नेटवर्क जब सीमाई जिलों में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त करता है तो उसके विस्तार की संभावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं। जमात की जीत असामाजिक और उग्रवादी समूहों के लिए एक सुरक्षित आश्रयस्थल तैयार कर सकती है, जिससे भारत की सीमा सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता दोनों प्रभावित होंगी।
सीमाई हिंदू अल्पसंख्यकों पर दबाव और संभावित पलायन का खतरा
जमात की सफलता का एक और गंभीर पहलू हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और विस्थापन का खतरा है। जिन जिलों में जमात का प्रभाव बढ़ा है, वहां अतीत में हिंदुओं पर हमले, धार्मिक दमन और जबरन पलायन की घटनाएँ सामने आती रही हैं। सीमाई जिलों में उनकी जीत भारत में बड़ी संख्या में शरणार्थियों की संभावित आमद का संकेत देती है, जो राज्यों की सामाजिक और प्रशासनिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
भारत के खिलाफ साजिशों और अस्थिरता बढ़ाने की आशंका में वृद्धि
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास भारत-विरोधी गतिविधियों से जुड़ा रहा है, जिसमें 1971 के युद्ध से लेकर तस्करी, चरमपंथी नेटवर्क और सीमा पर अस्थिरता पैदा करने की कोशिशें शामिल हैं। सीमाई जिलों पर नियंत्रण संगठन को भारत के खिलाफ न केवल वैचारिक बल्कि लॉजिस्टिक आधार भी प्रदान करता है। हथियार तस्करी, अवैध घुसपैठ, फर्जी मुद्रा संचालन और पूर्वोत्तर में उग्रवाद बढ़ाने जैसी संभावनाओं को इससे बढ़ावा मिल सकता है।
भारत के लिए सतर्कता, कूटनीति और सुरक्षा रणनीति की नई आवश्यकता
ऐसे परिदृश्य में भारत को सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाने, खुफिया सहयोग मजबूत करने और बांग्लादेश की नयी सरकार के साथ कूटनीतिक संवाद को प्राथमिकता देनी होगी। सीमाई जिलों में जमात की उपस्थिति केवल एक राजनीतिक स्थिति नहीं, बल्कि बहुआयामी सुरक्षा चुनौती है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में व्यापक रूप से सामने आ सकता है।
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