नई दिल्ली. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने कृत्रिम मेधा और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग पर 20 घंटे का एक प्रारंभिक पाठ्यक्रम शुरू किया है। इसके तहत नौवीं से 12वीं कक्षा तक के विद्यार्थी दैनिक जीवन में कृत्रिम मेधा के उपयोग, उदाहरणों से मशीनों के सीखने की प्रक्रिया, डीपफेक की पहचान और व्यक्तिगत आंकड़ों की सुरक्षा से जुड़ी नैतिक सीमाओं के बारे में अध्ययन करेंगे। यह पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को AI की समझ विकसित करने और उसके जिम्मेदार उपयोग के लिए तैयार करेगा। NCERT ने इसे गतिविधि-आधारित पद्धति से विकसित किया है। विभिन्न प्रकार के विद्यालयों में इसे आसानी से लागू किया जा सकेगा।
IIT मद्रास और IIT जोधपुर के सहयोग से विकास
NCERT ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास और IIT जोधपुर के परामर्श से इस गतिविधि-आधारित पाठ्यक्रम को विकसित किया है। इस पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझने में मदद करना है कि कृत्रिम मेधा कैसे काम करती है और इसकी क्या सीमाएं हैं। साथ ही उन्हें बिना सत्यापन किए इसके परिणामों पर निर्भर रहने के बजाय AI प्रणालियों का सतर्क, आत्मविश्वासपूर्ण, रचनात्मक और जिम्मेदार उपयोगकर्ता तथा मूल्यांकनकर्ता बनने के लिए प्रेरित करना है। विशेषज्ञों की मदद से तैयार यह पाठ्यक्रम आधुनिक शिक्षा की जरूरतों को पूरा करता है। विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
पाठ्यक्रम के मुख्य उद्देश्य और लाभ
NCERT ने कहा कि जिन विद्यार्थियों को पहले से इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है उनके लिए तैयार यह पाठ्यक्रम आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और समस्या-समाधान की क्षमता को बढ़ावा देता है। यह समस्याओं को हल करने के एक व्यवस्थित दृष्टिकोण के रूप में कम्प्यूटेशनल थिंकिंग का परिचय कराता है। विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिलती है कि कृत्रिम मेधा कैसे काम करती है तथा इसके अनुप्रयोग, संभावनाएं और सीमाएं क्या हैं। पाठ्यक्रम उन्हें प्रौद्योगिकी का जिम्मेदार उपयोग सिखाने पर केंद्रित है। इससे भविष्य की चुनौतियों के लिए विद्यार्थी बेहतर तरीके से तैयार हो सकेंगे।
गतिविधि-आधारित शिक्षण पद्धति
यह पाठ्यक्रम कृत्रिम मेधा की अवधारणाओं, अनुप्रयोगों और सीमाओं के साथ-साथ आंकड़ों की गोपनीयता तथा प्रौद्योगिकी के जिम्मेदार उपयोग को समझाने के लिए गतिविधि-आधारित शिक्षण पद्धति अपनाता है। इसमें चर्चा, व्यावहारिक अभ्यास, प्रयोग और आत्मचिंतन के माध्यम से विद्यार्थियों को सीखने के अवसर दिए जाते हैं। ये गतिविधियां डिजिटल उपकरणों के साथ या उनके बिना भी आयोजित की जा सकती हैं। विभिन्न प्रकार के विद्यालयों में विद्यार्थी सार्थक रूप से भाग ले सकें इसके लिए इसे लचीला बनाया गया है। व्यावहारिक अनुभव से सीखने पर जोर दिया गया है।
डीपफेक पहचान और डेटा सुरक्षा पर विशेष ध्यान
पाठ्यक्रम में डीपफेक की पहचान करने और व्यक्तिगत आंकड़ों की सुरक्षा से जुड़ी नैतिक सीमाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। विद्यार्थी समझेंगे कि AI का दुरुपयोग कैसे हो सकता है और उससे कैसे बचा जा सकता है। आंकड़ों की गोपनीयता बनाए रखने के महत्व को भी विस्तार से समझाया जाएगा। नैतिक उपयोग पर जोर देकर विद्यार्थियों को जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनाने का प्रयास किया गया है। आधुनिक समय में ये कौशल अत्यंत आवश्यक हो गए हैं। पाठ्यक्रम इन मुद्दों को सरल और व्यावहारिक तरीके से प्रस्तुत करता है।
विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच का विकास
NCERT का यह प्रयास विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच और समस्या-समाधान क्षमता को मजबूत करेगा। कम्प्यूटेशनल थिंकिंग के माध्यम से वे जटिल समस्याओं को व्यवस्थित तरीके से हल करना सीखेंगे। AI की संभावनाओं के साथ-साथ उसकी सीमाओं को समझने से वे अंधविश्वास से बचेंगे। पाठ्यक्रम उन्हें रचनात्मक और आत्मविश्वासी उपयोगकर्ता बनाएगा। शिक्षा प्रणाली में प्रौद्योगिकी को जिम्मेदारी से अपनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले वर्षों में ऐसे कौशल विद्यार्थियों के करियर और जीवन दोनों में उपयोगी साबित होंगे।