वाराणसी के पवित्र मणिकर्णिका घाट पर रंगभरी एकादशी के अगले दिन खेले जाने वाली मसान होली वर्षों से श्रद्धा और परंपरा के अनूठे मिश्रण का रूप मानी जाती रही है। लेकिन इस बार काशी विद्वत परिषद ने इसे शास्त्रों के विपरीत बताते हुए सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया है। परिषद का कहना है कि चिता भस्म की होली मनुष्यों के लिए नहीं है और इस पवित्र अनुष्ठान का अधिकार केवल भगवान शिव को है, जिन्हें काशी में मसाननाथ के रूप में पूजा जाता है।
विद्वत परिषद का मत और शास्त्रीय आधार
परिषद के महामंत्री प्रोफेसर रामनारायण द्विवेदी का कहना है कि श्मशान की चिता भस्म से होली खेलने का कोई उल्लेख न तो स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है, न शिव पुराण में। उनका तर्क है कि युवा पीढ़ी द्वारा शोरगुल और नृत्य के साथ आयोजित होने वाला यह उत्सव प्राचीन काशी की परंपरा से बिल्कुल भिन्न है। विद्वत परिषद का मानना है कि यह श्मशान स्थल की गरिमा, धार्मिक भावनाओं और शास्त्रीय मर्यादाओं के विपरीत है, इसलिए इसे रोका जाना चाहिए।
मसान नाथ सेवा समिति और समर्थकों का दृष्टिकोण
दूसरी ओर मसान नाथ सेवा समिति के संयोजक गुलशन कपूर का कहना है कि मसान होली काशी की पुरातन संस्कृति का हिस्सा रही है। वे तर्क देते हैं कि जिस काशी में मृत्यु और मोक्ष एक ही धारा में बहते हैं, वहां मसान होली का आयोजन शिव की भक्ति की अनूठी अभिव्यक्ति है। उनका कहना है कि वर्षों से यह आयोजन होता आया है और अब इसमें शामिल होने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में परंपरा पर रोक लगाना न तो उचित है, न आवश्यक।
काशी की मसान होली की विशेषता
मसान होली को काशी की अनोखी पहचान माना जाता है। यह दुनिया की एकमात्र ऐसी होली है जो महाश्मशान में खेली जाती है, जहां भक्त भगवान शिव को चिता की भस्म अर्पित करते हुए उनके मसाननाथ स्वरूप का स्मरण करते हैं। परंपरा के अनुसार, इस दिन विग्रह पर गुलाल और राख चढ़ाकर उत्सव की शुरुआत की जाती है। काशी में होली वैसे भी छह दिन तक चलने वाला एक लंबा उत्सव है, जिसमें रंगभरी एकादशी का विशेष महत्व है। इसके अगले दिन मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर मसान होली का आयोजन होता है, जिसमें अघोरी साधु और संत विशेष रूप से भाग लेते हैं।
परंपरा और मर्यादा के बीच संतुलन की आवश्यकता
मसान होली को लेकर दो मतों के टकराव की स्थिति बन चुकी है—एक पक्ष इसे काशी की सनातन परंपरा का हिस्सा मानकर आगे बढ़ाना चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष शास्त्रीय आधार और धार्मिक मर्यादा का हवाला देते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग कर रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि प्रशासन, विद्वान और श्रद्धालु मिलकर इस प्रश्न पर विचार करें कि क्या इस आयोजन को परंपरा की पवित्रता बनाए रखते हुए संयम, मर्यादा और शांति के साथ किया जा सकता है। काशी की परंपराएं सदियों से बदलते समय के साथ स्वयं को ढालती रही हैं, इसलिए समाधान भी संवाद और संतुलन से ही निकलेगा।
काशी की आत्मा में बसने वाले अनुष्ठान का भविष्य
मणिकर्णिका घाट काशी की आध्यात्मिक धुरी है, जहां मृत्यु भी मोक्ष का उत्सव बन जाती है। मसान होली इसी दार्शनिक विरासत का प्रतीक है। लेकिन इस परंपरा का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है जब इसे शास्त्रीय मर्यादाओं, श्रद्धा और गरिमा के साथ निभाया जाए। विवाद चाहे जितना गहरा क्यों न हो, काशी की संस्कृति अंततः वही राह चुनती है जो आस्था और विवेक दोनों को साथ लेकर चलती है।
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