मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने पिछली विधानसभा के 95 विधायकों में 86 पर भरोसा जताते हुए इस बार भी उनको चुनाव लड़ाया। इनमें से 57 चुनाव हार गए। 29 विधायक ही पार्टी के निर्णय पर खरे उतरे। दरअसल, कांग्रेस भले ही भाजपा सरकार की एंटी इनकंबेंसी के आधार पर अपनी जीत का दावा कर रही थी, लेकिन वास्तव में एंटी इनकंबेंसी उसके ही विधायकों को लेकर अधिक रही।
यही कारण है कि कांग्रेस का 60 प्रतिशत विधायकों पर दांव लगाने का निर्णय गलत साबित हुआ, जो 29 विधायक दोबारा जीतकर आए हैं, उनमें सर्वाधिक सात छिंदवाड़ा जिले के हैं। यहां पार्टी ने फिर सभी सात सीटें जीती हैं।
ये विधायक जीते
उपचुनाव के बाद प्रदेश में कांग्रेस के 96 विधायक रह गए थे। इनमें से बड़वाह से विधायक सचिन बिरला ने इस बार भाजपा से चुनाव लड़ा। घोड़ाडोंगरी से ब्रह्मा भलावी, मुरैना से राकेश मावई, गोहद से मेवाराम जाटव, गुन्नौर से शिवदयाल बागरी, कटंगी से टामलाल सहारे, ब्यावरा से रामंचद्र दांगी और सेंधवा से ग्यारसीलाल रावत का टिकट काट दिया था। भोपाल उत्तर से विधायक आरिफ अकील के स्थान पर उनके पुत्र आतिफ अकील और झाबुआ में कांतिलाल भूरिया के स्थान पर उनके पुत्र डा. विक्रांत भूरिया को टिकट दिया गया था। ये दोनों चुनाव जीत गए।अति आत्मविश्वास बना हार का कारण
पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि सभी विधायक अति आत्मविश्वास में आ गए थे और यह मानकर चल रहे थे कि भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर है और उसका लाभ उन्हें मिलेगा पर परिणामों से साफ है कि एंटी इनकंबेंसी भाजपा सरकार के नहीं, उनके विरुद्ध थी, जिसे वे भांप ही नहीं पाए।भाजपा के 97 में से 72 विधायक जीते
पिछली विधानसभा में भाजपा के 127 विधायक थे। इनमें से पार्टी ने 97 पर इस बार भी विश्वास जताते हुए चुनाव मैदान में उतारा था। 72 विधायक दोबारा जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। 25 विधायक चुनाव हार गए। इनमें 12 मंत्री हैं। ऐसे में, भाजपा ने जिन विधायकों पर दांव लगाया, उनमें 75 प्रतिशत से अधिक जीतकर आए हैं। उधर, 82 पुराने चेहरों को भी मौका दिया गया था। इनमें भी 57 जीते। 47 नए चेहरों पर दांव लगाया गया था, जिनमें से 34 ने चुनाव जीतकर पार्टी के निर्णय को सही सिद्ध किया।Read More: रेवंत रेड्डी होंगे तेलंगाना के नए मुख्यमंत्री, 7 दिसंबर को लेंगे पद की शपथ
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