- मांडू में बीजेपी के कार्यकर्ताओं को मिली आदिवासी वर्ग में पेड बनाने की ट्रेनिंग
- कांग्रेस आदिवासियों के रोज़गार शिक्षा उनके पलायन और ज़मीनों के मामलों को बना रही मुद्दा
- जयस भी प्रदेश की 47 प्रभावित आदिवासी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटी।
मध्यप्रदेश में आदिवासी वोट बैंक को लेकर सियासत तेज हो गई है। जहां एक तरफ बीजेपी बैठकों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को आदिवासियों के बीच में पेड बनाने की ट्रेनिंग दे रही है। तो वहीं कांग्रेस सरकार बनने के दावे के बाद आदिवासियों को कई सौगातें देने की बात कर रही है।
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से पहले आदिवासी वोट बैंक पर सभी सियासी पार्टियों की नज़र बनी हुई है। आदिवासियों को साधने के लिए बीजेपी और कांग्रेस अपने-अपने दांव खेल रहे है। हाली में मांडू में हुए प्रशिक्षण वर्ग में बीजेपी ने आदिवासी वर्ग के लिए अलग से रणनीति बनाई गई है। प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और कांग्रेस दोनों का ही फोकस आदिवासी वोट बैंक को लेकर बढ़ा हुआ है। इसमें बीजेपी पिछले एक साल से आदिवासियों को लेकर ज्यादा एक्टिव नजर आ रही है। PM नरेंद्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह का भोपाल दौरा देखने को मिला जहां मंच से कई आदिवासी हितेषी घोषणाओं का ऐलान किया गया था। बीजेपी आदिवासी वर्ग को जोड़ने के लिए कई प्रोग्राम बना रही है।
गौरतलब है की 2018 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के वोटों के कारण ही कांग्रेस सत्ता प्राप्त कर पाई थी। कांग्रेस को 47 में से 30 सीटें मिली थीं प्रदेश में आदिवासियों की बड़ी आबादी होने से 230 विधानसभा में से 84 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है। 2013 में इनमें से बीजेपी को 59 सीटों पर जीत मिली थी। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 84 में से 34 सीट पर जीत मिली थी। उसकी 25 सीटें कम हो गईं। इस वजह से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था।
प्रदेश में 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा ने 31 सीटें जीती थी। वहीं, कांग्रेस के खाते में 15 सीट आईं। 2018 के चुनाव में आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा सिर्फ 16 पर ही जीत दर्ज कर सकी। कांग्रेस ने 30 सीटें जीत ली थीं। इसलिए बीजेपी ने आदिवासी वोट बैंक की तरफ फोकस किया है। हालांकि आदिवासियों को रिझाने में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। कई मौकों पर कमलनाथ आदिवासियों के बीच में जा रहे है।
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