नई दिल्ली - विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को कहा कि दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाला युद्ध वैश्विक शांति के लिए खतरा है। उन्होंने आतंकवाद को राजकीय नीति या कूटनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इसके खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाने की अपील की। जयशंकर नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में चिन्मय मिशन के वैश्विक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
चिन्मय मिशन की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन साल भर चले समारोहों का समापन कार्यक्रम है। अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने वैश्विक संघर्षों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, आतंकवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और संयुक्त राष्ट्र में सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भारत का दृष्टिकोण रखा।
‘दुनिया को दूसरों के नजरिए से नहीं, एकता की भावना से देखें’
जयशंकर ने सम्मेलन की थीम ‘अद्वैत’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका मूल भाव अस्तित्व की एकता को स्वीकार करना है। उन्होंने लोगों से दुनिया को केवल ‘दूसरों’ के नजरिए से देखने के बजाय एक साझा वास्तविकता के रूप में समझने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि मानवता के सामने हमेशा दो तरह की सोच रही है। एक ओर वे लोग हैं, जो प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देते हैं, जबकि दूसरी ओर सहयोग को महत्वपूर्ण मानने वाले लोग हैं। आज की वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग और साझा जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना आवश्यक है। विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-1 का हवाला देते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना साझा उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सदस्य देशों की गतिविधियों में तालमेल स्थापित करने की जिम्मेदारी के साथ की गई थी।
यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों पर जताई चिंता
विदेश मंत्री ने कहा कि मौजूदा दौर में दुनिया के देश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी एक क्षेत्र में होने वाला संघर्ष केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक शांति, आर्थिक समृद्धि और विकास को भी प्रभावित करता है। उन्होंने यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि युद्ध और हिंसा दुनिया की प्रगति को बाधित करते हैं तथा देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं को कमजोर करते हैं।
जयशंकर ने जोर देकर कहा कि संवाद और कूटनीति ही संघर्षों के समाधान का रास्ता हैं। उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है और शांति स्थापित करने के लिए अन्य साझेदारों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।
आतंकवाद को राजकीय नीति बनाने वालों पर निशाना
आतंकवाद को शांति के लिए गंभीर खतरा बताते हुए जयशंकर ने कहा कि किसी भी परिस्थिति में इसे राज्य की नीति या कूटनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के साधन के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने चिंता जताई कि कुछ देश आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के बजाय उसे पनपने का अवसर देते हैं। विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद के प्रति अधिक सतर्क रहने और उसके खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति पर काम करने का आह्वान किया। उनका संदेश ऐसे समय में आया है, जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष, हिंसा और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।
एआई पर कुछ लोगों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के बढ़ते प्रभाव पर बात करते हुए जयशंकर ने कहा कि इसमें व्यापक बदलाव लाने की क्षमता है, लेकिन इतनी प्रभावशाली तकनीक को केवल कुछ लोगों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित एआई व्यवस्था का समर्थन करते हुए कहा कि तकनीकी विकास का लाभ व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचना चाहिए। उनके मुताबिक, एआई का इस्तेमाल ऐसा होना चाहिए, जो मानवता के हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो।
कोविड के दौरान वैक्सीन साझा करने का किया जिक्र
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए जयशंकर ने कोरोना महामारी के दौरान भारत की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अपनी क्षमताओं का उपयोग केवल अपने हितों तक सीमित रखने के बजाय जरूरतमंद देशों के साथ उन्हें साझा करने की सोच भी जरूरी है।
विदेश मंत्री ने बताया कि महामारी के दौरान भारत ने उन देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराने का निर्णय लिया, जो इसकी कमी के कारण पीछे छूट सकते थे। उस समय भारत में भी टीकाकरण अभियान चल रहा था। उन्होंने कहा कि वैश्विक सहयोग केवल संसाधनों और लाभ-हानि के आकलन पर आधारित नहीं हो सकता। इसके लिए दूसरों की मदद करने और साझा प्रगति में योगदान देने की भावना आवश्यक है।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ को व्यवहार में उतारने की जरूरत
जयशंकर ने भारत की प्राचीन अवधारणा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे केवल उपदेश तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि व्यवहार में भी अपनाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विक संस्था की कमियों और सीमाओं को पहचानकर उनमें सुधार करना जरूरी है। उनके मुताबिक, सुधारवादी बहुपक्षवाद की मांग लगातार मजबूत हो रही है और दुनिया के बड़े हिस्से को निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि वैश्विक संकटों के समय संयुक्त राष्ट्र को केवल दर्शक बने रहने के बजाय नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए।
75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित हुआ वैश्विक सम्मेलन
चिन्मय मिशन के इस तीन दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन 23 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। इसका आयोजन मिशन की 75 वर्षों की यात्रा और उसके आध्यात्मिक एवं सामाजिक योगदान को रेखांकित करने के लिए किया गया।
प्रधानमंत्री ने उद्घाटन के अवसर पर मिशन की यात्रा को भारत के ‘विकसित भारत-2047’ के लक्ष्य से भी जोड़ा था। सम्मेलन में जयशंकर का संबोधन वैश्विक शांति, आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक प्रयास, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर केंद्रित रहा।