कोलकाता: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। निर्वाचन आयोग के फैसलों पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर शीर्ष अदालत में 27 अक्टूबर को सुनवाई प्रस्तावित है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका दायर की है, इस दावे की उपलब्ध रिपोर्टों से स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
SIR प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग के फैसलों पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या आयोग की निर्धारित सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के बिना लिए गए। याचिकाकर्ताओं ने इन फैसलों की वैधता पर सवाल उठाते हुए संबंधित रिकॉर्ड की जांच और कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच की मांग की है।याचिकाओं में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने, चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म और मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म में कथित बदलावों का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इन मामलों की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) या न्यायिक जांच की मांग की है। ये आरोप हैं, जिन पर अदालत का अंतिम फैसला आना बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब, अंतरिम राहत से इनकार
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से संबंधित याचिकाओं पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अदालत ने फिलहाल ज्ञानेश कुमार को पद से निलंबित करने या हटाने संबंधी अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। इस स्तर पर अदालत ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों को अंतिम रूप से सही नहीं ठहराया है। मामले में संबंधित पक्षों के जवाब और आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होंगे।
चुनावी पारदर्शिता पर बहस तेज
SIR की प्रक्रिया और मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि इस विवाद का कानूनी पहलू अब सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। पश्चिम बंगाल में भी मतदाता सूची के संशोधन और आगामी चुनावों की तैयारियों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। हालांकि, डोला सेन की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अलग याचिका दायर किए जाने या इस मामले में तृणमूल कांग्रेस की औपचारिक कानूनी कार्रवाई के संबंध में स्पष्ट पुष्टि मिलने के बाद ही उस दावे को तथ्य के रूप में प्रकाशित करना उचित होगा।