रायपुर : छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना को लेकर सियासत तेज हो गई है। निजी अस्पतालों ने सरकार पर 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान लंबित होने का दावा करते हुए चेतावनी दी है कि अगर 31 जनवरी तक बकाया राशि का भुगतान नहीं हुआ तो 1 फरवरी से आयुष्मान कार्ड धारकों का इलाज बंद कर दिया जाएगा। इस चेतावनी के बाद लाखों गरीब मरीजों के सामने इलाज का संकट खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
निजी अस्पतालों का कहना है कि आयुष्मान भारत योजना के तहत किए गए इलाज का उनका बड़ा भुगतान कई महीनों से अटका हुआ है। अस्पताल प्रबंधन का तर्क है कि बिना भुगतान के वे लगातार सेवाएं जारी नहीं रख सकते। ऐसे में उन्होंने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि तय समय सीमा तक भुगतान नहीं हुआ तो योजना के तहत भर्ती और इलाज रोक दिया जाएगा।
गरीब और ग्रामीण मरीजों पर सीधा असर
आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत देशभर में सबसे पहले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा से हुई थी और राज्य के ग्रामीण व गरीब परिवार इस योजना के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। यदि निजी अस्पताल इलाज बंद करते हैं तो बड़ी संख्या में मरीजों को सिर्फ सरकारी अस्पतालों पर निर्भर होना पड़ेगा, जिससे वहां भारी दबाव बढ़ सकता है।
कांग्रेस का सरकार पर हमला
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब निजी अस्पतालों को भुगतान में देरी हुई हो।
उन्होंने आरोप लगाया, “सरकार को गरीबों के इलाज की चिंता नहीं है। आयुष्मान का पैसा देना सरकार का फर्ज है, लेकिन इलाज से ज्यादा कमीशन की चिंता की जा रही है। इलाज रुकना सरकार की नाकामी और गरीब विरोधी रवैये को दिखाता है।” कांग्रेस ने इसे स्वास्थ्य व्यवस्था को “जानबूझकर कमजोर करने” की कोशिश बताया है।
सरकार का आश्वासन: एक हफ्ते में भुगतान
वहीं स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने भुगतान में देरी की बात स्वीकार करते हुए जल्द समाधान का भरोसा दिया है। उनका कहना है, “भुगतान में थोड़ी देरी हुई है, लेकिन हमने पिछली सरकार की लंबित राशि भी चुकाई है। एक सप्ताह के भीतर सभी निजी अस्पतालों का भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। किसी भी हालत में इलाज नहीं रुकने दिया जाएगा।” सरकार का दावा है कि तकनीकी और प्रक्रियागत कारणों से देरी हुई है, जिसे जल्द ठीक कर लिया जाएगा।
बड़ा सवाल: अगर निजी अस्पताल हटे तो क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से पीछे हटते हैं तो सरकारी अस्पतालों पर अचानक मरीजों का भारी बोझ पड़ सकता है। इससे इलाज में देरी, बेड की कमी और संसाधनों पर दबाव जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
भुगतान में देरी या सिस्टम की खामी?
पूरा विवाद अब इस सवाल पर आकर टिक गया है कि क्या यह सिर्फ भुगतान में अस्थायी देरी है या फिर योजना के संचालन तंत्र में कोई बड़ी खामी है। फिलहाल मरीजों और उनके परिजनों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि जरूरत के समय इलाज मिलेगा या नहीं। आखिरकार यह मुद्दा सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी से जुड़ा है। जिस योजना को गरीबों का सुरक्षा कवच कहा जाता है, अगर वही ठप पड़ती है तो उसकी जिम्मेदारी तय होना भी उतना ही जरूरी होगा।
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