मध्यप्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) से जुड़े हजारों परिवार नहीं, बल्कि लाखों लोग इस समय गंभीर संकट की स्थिति में पहुँच गए हैं। गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए सरकारी राशन ही रोजमर्रा की जिंदगी का आधार है, लेकिन ई-केवाइसी की बेहद धीमी रफ्तार ने इस व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। पात्रता होने के बावजूद खाद्यान्न पात्रता पर्ची जारी न हो पाने से आम जन सीधे प्रभावित हो रहे हैं। यह स्थिति प्रशासनिक कार्यप्रणाली की कमजोरी की ओर भी स्पष्ट संकेत देती है।
पात्रता सूची में तेजी, सत्यापन में सुस्ती
राज्य सरकार की ओर से पात्र परिवारों की पहचान और सूची में नाम जोड़ने की प्रक्रिया तेजी से पूरी की गई, लेकिन ई-केवाइसी सत्यापन उसी गति से नहीं हो सका। वास्तव में, पात्रता सूची बढ़ी जरूर, लेकिन सत्यापन अटक गया। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में परिवारों के नाम तो सूची में हैं, पर वे खाद्यान्न का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। यह एक ऐसी खाई है, जिसने पात्र नागरिकों के हितों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
आंकड़े खोलते हैं सच्चाई—11 लाख से अधिक लोगों की प्रक्रिया अधर में
मध्यप्रदेश के 55 जिलों में कुल 11.23 लाख नए सदस्य पात्रता सूची में जुड़े—5.79 लाख नए नाम और 5.44 लाख पुराने कार्ड धारकों के अतिरिक्त सदस्य। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी संख्या में से केवल लगभग 50 हजार सदस्यों का ही ई-केवाइसी पूरा हो सका। यह स्पष्ट बताता है कि ई-केवाइसी प्रक्रिया किस अनुपात में पिछड़ रही है और इससे गरीब परिवारों पर सीधा असर पड़ रहा है।
18 जिलों में सबसे ज्यादा संकट—रेड जोन घोषित
राज्य के 18 जिलों—नरसिंहपुर, झाबुआ, नर्मदापुरम, सिंगरौली, रतलाम, अनूपपुर, आलीराजपुर, डिंडोरी, पांढुर्णा, उमरिया, निवाड़ी, मऊगंज, मंडला, बड़वानी, आगर मालवा, हरदा, नीमच और सीधी—को रेड जोन में रखा गया है। इनमें लंबित ई-केवाइसी की संख्या अत्यधिक है। इससे इन जिलों के लाखों लोग सरकारी राशन पाने के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। ग्रामीण और आदिवासी बहुल जिलों में यह संकट और अधिक गहरा है, जहाँ सरकारी खाद्यान्न ही जीवन का मुख्य आधार है।
प्रशासनिक लापरवाही या तकनीकी चुनौती—कहाँ अटका पूरा सिस्टम?
ई-केवाइसी की धीमी गति प्रशासनिक कार्यप्रणाली की कमजोरी को उजागर करती है। कई क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, तकनीकी बाधाएँ, और संबंधित विभागों की धीमी प्रक्रिया इसके लिए जिम्मेदार बताई जाती हैं। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे व्यवधानों को दूर करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, क्योंकि इनकी वजह से सबसे अधिक प्रभावित वही लोग होते हैं जिनकी निर्भरता पूरी तरह सरकारी सहायता पर है।
समाधान की तात्कालिक जरूरत—अन्यथा खाद्य संकट गहरा सकता है
यदि सरकार ने समय रहते ई-केवाइसी को तेजी से पूरा करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दिनों में खाद्य सुरक्षा का संकट और गहरा सकता है। इसकी प्राथमिकता में तकनीकी सहायता, विशेष अभियान, शिविरों का आयोजन, मोबाइल ई-केवाइसी यूनिट और गांव-स्तर पर त्वरित सत्यापन को शामिल किया जाना चाहिए। यह केवल प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है।
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