ग्वालियर प्रवास के दौरान शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि शंकराचार्य किसी सरकारी प्रक्रिया से नहीं बनता। यह पद न तो शासन देता है और न ही किसी प्रशासनिक आदेश से तय होता है। शंकराचार्य वही होता है जो गुरु-शिष्य परंपरा से आया हो और जिसे परंपरागत शंकराचार्यों द्वारा अभिषेक प्राप्त हुआ हो। उन्होंने दो टूक कहा कि शंकराचार्य संस्था की वैधता का आधार केवल सनातन परंपरा है, न कि सत्ता।
अविमुक्तेश्वरानंद का अभिषेक: परंपरा का पूर्ण निर्वाह
स्वामी सदानंद सरस्वती ने स्पष्ट किया कि स्वयं उन्होंने और श्रींगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य ने मिलकर अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का अभिषेक किया है। ऐसे में किसी भी प्रकार के संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बचती। उन्होंने कहा कि जब दो परंपरागत शंकराचार्य किसी शिष्य का अभिषेक कर चुके हों, तो फिर प्रमाण की मांग करना स्वयं परंपरा पर प्रश्नचिह्न लगाने जैसा है।
गुरु का शिष्य ही शंकराचार्य होता है
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे पिता की संपत्ति पुत्र को स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है, वैसे ही गुरु की परंपरा में शिष्य को उत्तरदायित्व मिलता है। अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शंकराचार्य के शिष्य हैं और उसी गुरु परंपरा का स्वाभाविक विस्तार हैं। शंकराचार्य पद उत्तराधिकार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्तरदायित्व है।
अखाड़ों और महामंडलेश्वर पर सरकार का अधिकार नहीं
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाने का अधिकार सरकार को नहीं है। सनातन धर्म की संस्थाएं अपनी आंतरिक परंपराओं और नियमों से संचालित होती हैं। यदि शासन इन धार्मिक संरचनाओं में हस्तक्षेप करता है, तो यह धर्म की स्वायत्तता पर आघात होगा।
गंगा स्नान पर रोक अस्वीकार्य
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती ने गंगा स्नान से जुड़े प्रशासनिक प्रतिबंधों पर भी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि गंगा स्नान से किसी को रोका नहीं जा सकता। प्रशासन का कार्य रोकना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं और साधु-संतों को सुविधा देना है। जब करोड़ों लोगों को स्नान के लिए आमंत्रित किया गया था, तब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ केवल सौ लोग थे, फिर भी उन्हें रोका गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
संगम स्नान का धार्मिक महत्व
उन्होंने कहा कि गंगा में कहीं भी स्नान किया जा सकता है, लेकिन त्रिवेणी संगम में स्नान का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यदि शंकराचार्य और अखाड़े संगम में स्नान नहीं कर पाएंगे, तो माघ मेले का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही समाप्त हो जाएगा। प्रशासन को अनुभवी अधिकारियों की नियुक्ति कर संतों और श्रद्धालुओं की गरिमा बनाए रखनी चाहिए।
सनातन परंपरा का दृढ़ संदेश
शंकराचार्य सदानंद सरस्वती का यह बयान केवल एक व्यक्ति का समर्थन नहीं, बल्कि सनातन धर्म की उस परंपरा का उद्घोष है, जो सदियों से गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित रही है। यह संदेश स्पष्ट है कि शंकराचार्य पद का निर्धारण न तो राजनीति करेगी और न ही प्रशासन, बल्कि केवल धर्म की शाश्वत परंपरा ही उसका आधार होगी।
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