इक्कीसवीं सदी का एशिया केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र नहीं रह गया है। यह सैन्य तकनीक, सामरिक प्रभाव, समुद्री नियंत्रण, अंतरिक्ष क्षमता, साइबर युद्ध और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन की निर्णायक भूमि बन चुका है। भारत के सामने चुनौती इसलिए अधिक जटिल है, क्योंकि उसे एक ओर चीन के साथ लंबी और संवेदनशील हिमालयी सीमा पर सतर्क रहना है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान की सैन्य चुनौतियों, आतंकवाद, सीमापार अस्थिरता और परमाणु जोखिमों का सामना करना है। हिंद महासागर में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा तथा भारत के आसपास बदलते सुरक्षा समीकरण इस चुनौती को और व्यापक बनाते हैं। ऐसे वातावरण में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना को अलग-अलग सक्षम होने के साथ-साथ एक साझा रणनीतिक उद्देश्य के अंतर्गत तेजी से, सटीकता के साथ और निर्बाध समन्वय में काम करने वाली शक्ति बनना होगा। भारत की भौगोलिक स्थिति उसे महाद्वीपीय और समुद्री दोनों प्रकार की सुरक्षा जिम्मेदारियां सौंपती है। इसलिए राष्ट्रीय रक्षा की सफलता का पैमाना केवल सैनिकों की संख्या, टैंकों, युद्धपोतों या लड़ाकू विमानों की सूची नहीं हो सकता। असली पैमाना संकट की घड़ी में सही सूचना, निर्णय, संसाधन और संयुक्त अभियान की प्रभावशीलता है।
चीन और पाकिस्तान: चुनौती का उत्तर संख्या नहीं, तकनीकी बढ़त
चीन ने पिछले दशकों में अपने सैन्य आधुनिकीकरण को दीर्घकालीन राष्ट्रीय परियोजना के रूप में विकसित किया है। उसकी क्षमता का आकलन केवल रक्षा व्यय से नहीं, बल्कि औद्योगिक उत्पादन, मिसाइल प्रणालियों, अंतरिक्ष परिसंपत्तियों, मानवरहित प्लेटफॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, समुद्री पहुंच और सैन्य-नागरिक तकनीकी समन्वय से भी करना होगा। पाकिस्तान की चुनौती का स्वरूप अलग है। उसके साथ भारत को पारंपरिक सैन्य प्रतिस्पर्धा के अलावा आतंकवाद, सीमापार घुसपैठ, ड्रोन के माध्यम से संभावित खतरे तथा परमाणु प्रतिरोध के वातावरण में निर्णय लेने की जटिलता का सामना करना पड़ता है। दोनों देशों की क्षमताओं और उद्देश्यों को एक जैसा मानना रणनीतिक भूल होगी। लेकिन यह संभावना कि भारत को एक ही समय में अलग-अलग मोर्चों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है, रक्षा नियोजन में गंभीरता से शामिल होनी चाहिए। इसके लिए सेना को बेहतर निगरानी, सुरक्षित संचार, विश्वसनीय रसद, वायु रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से सुरक्षा, साइबर प्रतिरोध और तेज सैन्य गतिशीलता की आवश्यकता है। भारत को प्रतिद्वंद्वियों की नकल नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, आर्थिक क्षमता और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप अधिक प्रभावी रक्षा मॉडल विकसित करना चाहिए।
वित्त वर्ष 2026-27 का रक्षा बजट: रिकॉर्ड आवंटन, वास्तविक क्षमता का प्रश्न
भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो पिछले वित्त वर्ष के बजटीय अनुमान से 15.19 प्रतिशत अधिक है। यह एक महत्वपूर्ण वृद्धि है, लेकिन इस आंकड़े को समझने के लिए उसके विभिन्न घटकों को अलग-अलग देखना आवश्यक है। लगभग 2.19 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए, 2.07 लाख करोड़ रुपये कार्मिकों के वेतन एवं भत्तों के लिए, 1.58 लाख करोड़ रुपये परिचालन और रखरखाव संबंधी राजस्व व्यय के लिए तथा 1.71 लाख करोड़ रुपये रक्षा पेंशन के लिए निर्धारित है। पूंजीगत व्यय में से लगभग 1.85 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत अधिग्रहण के लिए निर्धारित किए गए हैं। इसका अर्थ है कि कुल रक्षा आवंटन को आधुनिक हथियारों की खरीद के लिए उपलब्ध धनराशि मान लेना गलत होगा। असली सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि रक्षा बजट कितना बढ़ा, बल्कि यह भी होना चाहिए कि स्वीकृत परियोजनाओं में से कितनी समय पर पूरी हुईं, कितने उपकरण वास्तव में सेना को उपलब्ध हुए और प्रत्येक रुपये से कितनी अतिरिक्त सामरिक शक्ति पैदा हुई।
सैनिक का विशेष वेतन आयोग: जोखिम, जिम्मेदारी और त्याग का सम्मान
राष्ट्र की रक्षा करने वाले सैनिक का कार्य सामान्य रोजगार की परिभाषाओं से कहीं आगे जाता है। कठिन जलवायु, दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्र, लंबे कार्यकाल, अनिश्चित अवकाश, परिवार से दूरी, शारीरिक जोखिम और मानसिक दबाव उसके पेशे का हिस्सा हैं। किसी सैनिक की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन केवल उसके मासिक वेतन से नहीं, बल्कि उसके कार्य की प्रकृति, जिम्मेदारी, जोखिम और सेवा से जुड़े अवसरगत त्याग से भी होना चाहिए। इसीलिए सरकार को एक विशेष रक्षा कार्मिक वेतन एवं सेवा आयोग गठित करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, जिसमें सैन्य नेतृत्व, वित्त विशेषज्ञ, मानव संसाधन विशेषज्ञ और पूर्व सैनिकों का प्रतिनिधित्व हो। आयोग का उद्देश्य मौजूदा वेतन व्यवस्था को बिना समग्र अध्ययन के बदलना नहीं, बल्कि रक्षा सेवा की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप अधिक न्यायसंगत और व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए। इसमें कठिन क्षेत्र, उच्च जोखिम, अत्यधिक कार्यभार, समुद्री तैनाती, परिचालन जिम्मेदारी, विशेष तकनीकी कौशल, दूरस्थ पोस्टिंग और परिवार से लंबे समय तक अलग रहने जैसे कारकों के आधार पर विशेष भत्तों की समीक्षा की जा सकती है।
अग्निवीर, वायुवीर और अल्पकालीन सेवा अधिकारियों का सम्मानजनक भविष्य
सशस्त्र सेनाओं की कार्यक्षमता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि सेवा में आने वाले युवाओं को केवल प्रशिक्षण और तैनाती ही नहीं, बल्कि भविष्य की स्पष्ट दिशा भी मिले। अग्निपथ व्यवस्था के अंतर्गत अग्निवीरों और वायुसेना में वायुवीरों के लिए सेवा अवधि के बाद नागरिक जीवन में संक्रमण की प्रभावी योजना बनाना आवश्यक है। चयनित कार्मिकों के नियमित सेवा में बने रहने की व्यवस्था अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन शेष युवाओं के लिए रोजगार, कौशल प्रमाणन और पुनर्वास के अवसर भी विश्वसनीय होने चाहिए। सरकार, राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों, पुलिस और अर्धसैनिक बलों तथा निजी उद्योगों के साथ समन्वित रोजगार मार्ग विकसित किए जा सकते हैं। सैन्य प्रशिक्षण से अर्जित अनुशासन, नेतृत्व, तकनीकी दक्षता, आपदा प्रबंधन, वाहन संचालन, संचार, सुरक्षा और टीमवर्क जैसे कौशलों को मान्यता देने वाली प्रमाणन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि पूर्व अग्निवीर नागरिक रोजगार में अपनी वास्तविक क्षमता प्रदर्शित कर सकें। जो युवा राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपना समय, ऊर्जा और युवावस्था समर्पित करते हैं, उन्हें सेवा के बाद अनिश्चितता के हवाले छोड़ना राष्ट्रीय मानव संसाधन का नुकसान होगा।
तीनों सेनाओं का संयुक्त सामर्थ्य और जवाबदेह रक्षा प्रशासन
भारत को सैन्य शक्ति के अगले स्तर तक ले जाने के लिए थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच संयुक्तता को केवल नीतिगत अवधारणा नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, योजना, संसाधन और परिचालन प्रक्रिया का वास्तविक आधार बनाना होगा। संयुक्तता का अर्थ तीनों सेनाओं की विशिष्ट भूमिका को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उनकी अलग-अलग क्षमताओं को साझा राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए प्रभावी ढंग से जोड़ना है। इसके लिए संयुक्त प्रशिक्षण, सुरक्षित और अंतरसंचालनीय संचार, साझा परिचालन चित्र, रसद समन्वय, साइबर सुरक्षा तथा अंतरिक्ष आधारित सहायता जैसी क्षमताओं को आवश्यकता और प्राथमिकता के अनुसार विकसित करना चाहिए। रक्षा परियोजनाओं की समीक्षा के लिए एक परिणाम-केंद्रित व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें लागत वृद्धि, अनुबंध में देरी, परीक्षण की बाधाएं और उत्पादन की समस्याएं समय रहते सामने आएं। स्वदेशी उद्योग को दीर्घकालीन मांग का स्पष्ट संकेत मिले, लेकिन गुणवत्ता, विश्वसनीयता और समय पर आपूर्ति के मानकों में समझौता न हो। सैन्य शक्ति की श्रेष्ठता केवल हथियारों की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि पूरे रक्षा तंत्र की निर्णय क्षमता, समन्वय और क्रियान्वयन की गति से बनती है।
विश्व की अग्रणी सैन्य शक्ति बनने का रास्ता: बजट, भरोसा और परिणाम
भारत की सैन्य क्षमता में वृद्धि केवल किसी एक वित्तीय वर्ष की उपलब्धि से नहीं मापी जा सकती। इसके लिए निरंतर निवेश, तकनीकी आत्मनिर्भरता, रणनीतिक दूरदर्शिता, प्रशिक्षित मानव संसाधन और प्रशासनिक दक्षता का एक साथ विकास जरूरी है। वित्त वर्ष 2026-27 का 7.85 लाख करोड़ रुपये का रक्षा आवंटन एक बड़ा वित्तीय आधार प्रदान करता है। अब इस आधार को वास्तविक क्षमता में बदलना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। सरकार को अल्पकालीन सुधारों के लिए समयबद्ध लक्ष्य, पांच वर्षीय आधुनिकीकरण योजना और 2047 तक की दीर्घकालीन रणनीति के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करना चाहिए। रक्षा कर्मियों के लिए विशेष वेतन एवं सेवा आयोग, अग्निवीरों और अल्पकालीन सेवा अधिकारियों के लिए विश्वसनीय पुनर्वास तथा सैनिक शिकायतों के समयबद्ध निवारण जैसे उपाय इस रणनीति के मानवीय आधार को मजबूत कर सकते हैं। भारत का लक्ष्य विश्व की अग्रणी सैन्य शक्ति बनना होना चाहिए, लेकिन ऐसी शक्ति जो केवल अपनी सैन्य क्षमता के कारण नहीं, बल्कि अपने अनुशासन, विश्वसनीयता, आत्मनिर्भरता और जिम्मेदार व्यवहार के कारण भी सम्मान प्राप्त करे। सशक्त सेना, सम्मानित सैनिक, आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग और समयबद्ध राष्ट्रीय निर्णय—यही भारत को अधिक सुरक्षित, सक्षम और सामरिक रूप से अग्रणी राष्ट्र बनाने की आधारशिला है।