वर्तमान समय में सौंदर्य की परिभाषा अत्यंत संकुचित होती जा रही है। फैशन, प्रदर्शन और बाहरी आडंबर को ही सौंदर्य मान लेने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है। बाज़ारवादी शक्तियों ने स्त्री के सौंदर्य को उत्पाद में बदल दिया है—जहाँ उसकी पहचान वस्त्रों, शरीर की बनावट और दृश्य आकर्षण तक सीमित कर दी गई है। इस प्रक्रिया में उसका आंतरिक सौंदर्य, जो विचार, संस्कार और आत्मिक गरिमा से उपजता है, हाशिये पर चला गया है।
संस्कारों के बिना सौंदर्य की असंभवता
सौंदर्य केवल आँखों से दिखने वाला तत्व नहीं है; वह चरित्र, आचरण और जीवन-मूल्यों का प्रतिफल होता है। संस्कारों के अभाव में सौंदर्य खोखला और क्षणिक बन जाता है। जब चरित्र पर प्रश्न उठते हैं, जब मर्यादाओं को पिछड़ापन कहकर खारिज किया जाता है, तब सौंदर्य अपनी आत्मा खो देता है। लज्जा, संयम और मर्यादा जैसे मूल्य नारी की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी गरिमा के स्तंभ रहे हैं।
आधुनिकता के नाम पर रचा गया जाल
आधुनिकता के आवरण में स्त्री को जिस स्वतंत्रता का आभास कराया गया, वह अनेक बार वास्तविक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि एक नियंत्रित भ्रम सिद्ध होती है। पुरुष प्रधान व्यवस्था ने नए रूप में वही पुराना वर्चस्व स्थापित किया है—जहाँ स्त्री को अब खुली बेड़ियों में बाँधा गया है। वह स्वयं को सशक्त मानती है, पर अनजाने में शोषण की नई प्रणालियों का हिस्सा बनती चली जाती है।
भौतिक सशक्तता और आत्मिक दुर्बलता
आज की स्त्री शिक्षा, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में आगे बढ़ी है—यह निर्विवाद सत्य है। किंतु इसके समानांतर उसका आत्मिक और नैतिक बल क्षीण हुआ है। बाहरी सशक्तता यदि आंतरिक स्थिरता से रहित हो, तो वह संतुलन नहीं दे सकती। यही कारण है कि आधुनिक समाज में सुविधाएँ बढ़ने के बावजूद असंतोष और अस्थिरता गहराती जा रही है।
नारी : समाज की मूल शक्ति
नारी केवल समाज का एक घटक नहीं, बल्कि उसकी आधारशिला रही है। परिवार, संस्कृति और सभ्यता का संरक्षण नारी के माध्यम से ही संभव हुआ है। इतिहास गवाह है कि जब-जब नारी का स्थान गरिमामय रहा, समाज सशक्त और संतुलित रहा। और जब-जब उसे कमतर आँका गया, समाज पतन की ओर अग्रसर हुआ।
दुविधा के चौराहे पर खड़ी नारी
आज की नारी ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता आमने-सामने खड़ी हैं। चकाचौंध उसे आकर्षित करती है, चुनौतियाँ उसे भयभीत करती हैं, और संस्कार उसे पुकारते हैं। इस द्वंद्व ने उसे मानसिक रूप से भ्रमित कर दिया है। वह यह तय नहीं कर पा रही कि किस दिशा में बढ़ना उसके अस्तित्व के लिए हितकर है।
नैसर्गिक सौंदर्य से बढ़ती दूरी
प्रकृति ने स्त्री को जिन गुणों से सज्जित किया था—ममता, करुणा, धैर्य, सहनशीलता—वे उसके नैसर्गिक आभूषण थे। किंतु आज वह कृत्रिम सौंदर्य की ओर अधिक आकृष्ट हो गई है। बाहरी सजावट के पीछे भागते हुए उसने अपने भीतर की दिव्यता को अनदेखा कर दिया है, जिससे उसका सौंदर्य स्वाभाविक न रहकर बनावटी होता जा रहा है।
नारीत्व का क्षरण
समाज ने धीरे-धीरे स्त्री के भीतर की ‘नारी’ को समाप्त किया है। आज वह केवल एक शरीर, एक भूमिका या एक अपेक्षा बनकर रह गई है। सबला से अबला, लक्ष्मी से मजबूरी और अनंत संभावनाओं से शून्यता की ओर यह यात्रा स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता को दर्शाती है।
समकक्षता का भ्रम और वास्तविकता
नारी को पुरुष के समकक्ष बताने की भाषा आकर्षक अवश्य है, पर इसका प्रयोग कई बार उसके मूल स्वरूप को मिटाने के लिए किया गया। वास्तविकता यह है कि नारी को समकक्ष नहीं, विशिष्ट समझने की आवश्यकता थी। वह सदैव पूर्ण रही है—अपूर्णता पुरुष में थी, तभी तो शिव को भी अर्धनारीश्वर स्वरूप धारण करना पड़ा।
आधुनिकता की अंधी दौड़
आज की नारी एक साथ अनेक भूमिकाएँ निभा रही है—गृहिणी, कर्मचारी, माँ, बेटी, पत्नी और समाज की अपेक्षाओं की वाहक। इस अंधी दौड़ में वह स्वयं के लिए रुकने का अवसर नहीं पा रही। परिणामस्वरूप, वह शारीरिक और मानसिक थकान की शिकार होती जा रही है।
यक्ष प्रश्न
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यह दोहन कब रुकेगा? कब नारी को उसके मूल तत्व को विकसित करने का अवसर मिलेगा? कब वह फिर से वंदनीय बन सकेगी—केवल पूजनीय नहीं, बल्कि सम्मानित और संरक्षित?
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