भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ यह मुक्त व्यापार समझौता (FTA) वैश्विक व्यापार संतुलन में बड़ा बदलाव लाने वाला माना जा रहा है। इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील’ की संज्ञा दी जा रही है, क्योंकि यह केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेश, तकनीक, ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूत करता है। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की मौजूदगी में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसने भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति को और सुदृढ़ किया है।
अमेरिका की नाराज़गी: बयान नहीं, रणनीतिक चेतावनी
इस डील को लेकर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की प्रतिक्रिया बेहद तीखी रही। उन्होंने इसे “बेहद निराशाजनक” बताते हुए कहा कि यूरोप खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है। अमेरिकी टीवी कार्यक्रम ‘स्क्वॉक ऑन द यूएस स्ट्रीट’ में दिए गए बयान में उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि यह समझौता अमेरिका की रूस-विरोधी रणनीति को कमजोर कर सकता है। यह नाराज़गी केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी भू-राजनीतिक चिंता छिपी हुई है।
रूस–यूक्रेन युद्ध और दोहरा रवैया
स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय देशों पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि यूरोप रूस–यूक्रेन युद्ध में नैतिक नेतृत्व की बात करता है, लेकिन व्यवहार में व्यापार को प्राथमिकता देता है। भारत द्वारा प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल खरीदने और उसी तेल से बने परिष्कृत उत्पादों को यूरोप द्वारा आयात करने पर उन्होंने सवाल उठाया। उनके अनुसार, “इस तरह यूरोपीय देश अनजाने में अपने ही खिलाफ चल रहे युद्ध को वित्त पोषित कर रहे हैं।”
ऊर्जा जरूरतें बनाम नैतिक राजनीति
ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा इस पूरे विवाद के केंद्र में है। अमेरिका का कहना है कि उसने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया, लेकिन यूरोप इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ खड़ा नहीं हुआ। बेसेंट के अनुसार, यूरोप सस्ती ऊर्जा चाहता है, लेकिन यदि अमेरिका भी प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदता, तो उसे भी सस्ती ऊर्जा मिल सकती थी। यह बयान पश्चिमी देशों की नीति में छिपे विरोधाभास को उजागर करता है।
भारत की बढ़ती वैश्विक पकड़
इस पूरे घटनाक्रम में भारत की स्थिति उल्लेखनीय है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि पहले ही कह चुके हैं कि इस डील का सबसे बड़ा फायदा भारत को होगा। भारत ने न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को संतुलित किया, बल्कि वैश्विक व्यापार में अपनी स्वायत्त और व्यावहारिक नीति का परिचय दिया। भारत–EU समझौता यह संकेत देता है कि भारत अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था को दिशा देने वाला प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है।
बदलती वैश्विक राजनीति की तस्वीर
लगातार दूसरे दिन अमेरिका के वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी यह दर्शाती है कि यह डील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी प्रभावशाली है। यूरोप का भारत की ओर झुकाव और अमेरिका की असहजता, आने वाले समय में वैश्विक गठबंधनों की नई तस्वीर पेश कर सकती है। यह समझौता बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ते कदम का स्पष्ट संकेत है।
Comments (0)