लोकसभा चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव की पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने उत्तर प्रदेश की सियासत में बीजेपी के विनिंग समीकरण को बिगाड़कर रख दिया है. चुनाव में दलित और ओबीसी वोटों के खिसकने के चलते बीजेपी यूपी में 62 सीट से घटकर 33 पर पहुंच गई है. पार्टी 2027 में 2024 वाली गलती को नहीं दोहराना चाहती है, जिसके लिए बीजेपी फिर से अपनी सोशल इंजीनियरिंग को दुरुस्त करने में सक्रिय हो गई है. दलित और ओबीसी समुदाय के विश्वास को जीतने की कोशिश तेज कर दी है, जिसकी झलक इन दिनों होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों में दिख रही है.
सियासी समीकरण को दुरुस्त करने में जुटी BJP
लोकसभा चुनाव के बाद से ही बीजेपी एक के बाद एक ओबीसी नेताओं की नियुक्ति करके अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त करने में जुट गई है. 2024 में बीजेपी का परंपरागत माने जाने वाला कुर्मी-कोइरी समुदाय का वोट रुहेलखंड से लेकर पूर्वांचल तक खिसक गया है. लोकसभा के चुनाव में बीजेपी ने बरेली सीट से संतोष गंगवार का टिकट काट दिया था, जिसके चलते रुहलेखंड बेल्ट में कुर्मी वोटों की नाराजगी चुनाव में पार्टी को उठानी पड़ी है. बीजेपी ने बरेली सीट भले ही जीत ली हो, लेकिन बदायूं, आंवला, लखीमपुर खीरी और सीतापुर सीट हारनी पड़ गई.
लोकसभा चुनाव में सपा के PDA फॉर्मूले ने लगाई सेंध
बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपना सियासी वनवास ओबीसी और दलित वोटों के दम पर ही खत्म किया था. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पीएम का चेहरा नरेंद्र मोदी बने तो यूपी में दोबारा से पार्टी का उभार हुआ. बीजेपी ने यूपी में अपनी सियासी जड़े मजबूत करने के लिए गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों पर फोकस किया और एक मजबूत सोशल इंजीनियरिंग बनाने में कामयाब रही. इसी के दम पर बीजेपी यूपी मे 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव और 2017 और 2022 का विधानसभा चुनाव जीतने में सफल रही, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा पीडीए फॉर्मूले के चलते सेंध लग गई है.
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