मुंबई: मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सोमवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि अगर SIR के दौरान भारतीय नागरिकों के नाम ही वोटर लिस्ट से बाहर हो जाते हैं, तो आखिर इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य क्या रह जाता है?
‘नागरिकों को सूची में शामिल रखना ECI की जिम्मेदारी’
जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामसांडेकर की डिवीजन बेंच ने चुनाव आयोग को उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी की याद दिलाई। अदालत ने कहा कि आयोग का दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि पात्र भारतीय नागरिक अंतिम मतदाता सूची में शामिल रहें। कोर्ट ने सवाल किया कि यदि प्रक्रिया के दौरान नागरिक ही बाहर हो जाते हैं, तो SIR का औचित्य क्या रह जाता है।
मौजूदा वोटर लिस्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
अदालत ने Registration of Electors Rules, 1960 के नियम 21 का हवाला देते हुए कहा कि SIR के तहत नई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट तैयार होने तक मौजूदा मतदाता सूची को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट के मुताबिक, अगर पुराने रोल को ही आधार से बाहर कर दिया गया तो किसी मतदाता के पास अपना नाम बचाने या वापस शामिल कराने का प्रभावी रास्ता नहीं बचेगा।
‘मतदाता Catch-22 स्थिति में फंस गया’
हाईकोर्ट ने मौजूदा व्यवस्था को मतदाता के लिए ‘Catch-22’ जैसी स्थिति बताया। अदालत के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति का नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं है और वह अपना नाम वापस शामिल कराने के लिए एक प्रक्रिया अपनाता है, तो दूसरी प्रक्रिया में उससे ऐसी घोषणा करने को कहा जा सकता है जो उसकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती।
पता बदलने वालों के लिए Form 8 का मुद्दा
मामला गोवा के सालगांवकर परिवार की याचिका से जुड़ा है। परिवार का कहना है कि उन्होंने अपने पते में बदलाव के लिए Form 8 जमा किया था, इसके बावजूद उनके नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटा दिए गए। Form 8 का इस्तेमाल मौजूदा मतदाता के विवरण में बदलाव, जिसमें पता बदलना भी शामिल है, के लिए किया जाता है।
ECI ने Form 6 भरने की बात कही
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से दलील दी गई कि SIR के दौरान यदि किसी मतदाता का नाम सूची से हट जाता है तो उसे दोबारा शामिल होने के लिए Form 6 दाखिल करना होगा। Form 6 सामान्य तौर पर नए मतदाता के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आयोग का कहना है कि SIR के तहत प्रक्रिया के मुताबिक ऐसे मामलों में यही रास्ता अपनाया जाना है।
हाईकोर्ट ने Form 6 को लेकर भी जताई आपत्ति
अदालत ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति पहले से मतदाता है और केवल अपना पता बदलने के कारण उसकी स्थिति प्रभावित हुई है, तो उसे नए मतदाता के तौर पर Form 6 दाखिल करने के लिए क्यों कहा जाए। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में मतदाता को अपने वास्तविक निवास के संबंध में गलत घोषणा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
‘मौजूदा सूची को ही नजरअंदाज कर रहे हैं?’
बेंच ने चुनाव आयोग की दलील पर सवाल करते हुए कहा कि SIR चलने का मतलब यह नहीं हो सकता कि मौजूदा मतदाता सूची को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए। अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का नाम मौजूदा रोल में है और उसने पता बदलने के लिए Form 8 दिया है, तो उसकी स्थिति पर उसी आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी
यह मामला Paresh Salgaonkar vs State of Goa से जुड़ा है। बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने मामले की सुनवाई मंगलवार, 6 अक्टूबर को भी जारी रखने की बात कही है। अब अगली सुनवाई में चुनाव आयोग की प्रक्रिया और मतदाताओं के लिए उपलब्ध विकल्पों को लेकर अदालत के सामने आगे की दलीलें रखी जाएंगी।