नई दिल्ली. एक सरकारी अस्पताल की कल्पना कीजिए जहां सोमवार की सुबह भीड़ भरी हो। तीन वरिष्ठ डॉक्टरों का पैनल वर्षों से इंतजार कर रहे मरीज की जांच करता है और पांच दवाओं की पर्ची लिखकर फार्मेसी भेज देता है। फार्मासिस्ट पर्ची को अपनी सुविधा से देखता है। पहली दवा दे देता है दूसरी को विचारधीन रखता है तीसरी को वापस भेज देता है और पांचवीं को चौथी से पहले दे देता है क्योंकि उसे लेबल पसंद आया। मरीज आधा इलाज लेकर टोकन नंबर के साथ घर लौटता है और अनंत काल तक इंतजार करता है। किसी अन्य अस्पताल में फार्मासिस्ट पर दोपहर तक नोटिस जारी हो जाता लेकिन यहां डॉक्टर अपनी कुर्सी से सब देखता है कुछ नहीं बोलता और अगली पर्ची लिखने लगता है। यही कहानी आज न्यायाधीशों की नियुक्ति की है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था
हम अभी भी सुनते हैं कि जज ही जज नियुक्त करते हैं लेकिन सही बात यह है कि जज सिफारिश करते हैं और कोई और तय करता है कि किसे कब और किस क्रम में नियुक्त करना है या नहीं करना है। कॉलेजियम नामों की सूची भेजता है लेकिन अंतिम निर्णय और क्रम कार्यपालिका के पास रहता है। कई बार सिफारिशें लंबित रह जाती हैं या फिर से विचार के लिए लौटा दी जाती हैं। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता के सवाल बार-बार उठते हैं। नियुक्तियों में देरी से उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में रिक्तियां बढ़ती हैं। पूरा तंत्र इस द्वंद्व से प्रभावित होता दिखता है।
कॉलेजियम का गठन और इतिहास
कॉलेजियम व्यवस्था अचानक नहीं बनी। 1993 में द्वितीय जजेस केस में नौ न्यायाधीशों ने फैसला दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय वरिष्ठ सहयोगियों के साथ मिलकर बनी हो तो सरकार की राय पर उसकी प्रधानता होगी। एक बार नाम लौटाए जाने और फिर दोहराए जाने पर नियुक्ति अनिवार्य हो गई। पांच साल बाद तृतीय जजेस केस ने कॉलेजियम को मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों तक सीमित कर दिया। इस व्यवस्था ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करने का दावा किया। लेकिन व्यवहार में सिफारिश और नियुक्ति के बीच का अंतर बना रहा।
सिफारिश और अंतिम निर्णय का अंतर
कॉलेजियम की भूमिका सिफारिश तक सीमित होती जा रही है। सरकार नामों को स्वीकार करने अस्वीकार करने या क्रम बदलने का अधिकार रखती है। कई बार सिफारिशें महीनों या वर्षों तक लंबित रहती हैं। कुछ नामों को प्राथमिकता दी जाती है तो कुछ को टाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी महसूस की जाती है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में योग्यता वरिष्ठता और विविधता जैसे मानदंडों पर भी सवाल उठते हैं। व्यवस्था की मूल भावना और वर्तमान आचरण में फर्क साफ दिखता है।
द्वितीय और तृतीय जजेस केस का महत्व
द्वितीय जजेस केस ने मुख्य न्यायाधीश की प्रधानता स्थापित की थी। तृतीय जजेस केस ने कॉलेजियम की संरचना स्पष्ट की। इन फैसलों का मकसद कार्यपालिका के हस्तक्षेप को सीमित करना था। लेकिन समय के साथ सिफारिशों के क्रियान्वयन में देरी और चयन का अधिकार केंद्र में रहने से मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए इन फैसलों को याद किया जाता है। वर्तमान में इन सिद्धांतों और वास्तविकता के बीच की दूरी चर्चा का विषय बनी हुई है।
व्यवस्था पर उठते सवाल और आगे की राह
न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी रिक्तियों और पारदर्शिता की कमी लगातार सवाल पैदा कर रही है। कॉलेजियम की सिफारिशों को समयबद्ध तरीके से लागू करने की मांग उठती रहती है। कुछ का मानना है कि व्यवस्था में सुधार की जरूरत है तो कुछ इसे न्यायिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानते हैं। डॉक्टर की पर्ची और फार्मासिस्ट के चयन का रूपक इस पूरी प्रक्रिया को सरल लेकिन तीखे अंदाज में पेश करता है। आगे की राह में संतुलन और स्पष्टता की जरूरत है ताकि न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनी रहे।