भारत ने पिछले वर्षों में अपने एयर डिफेंस की दीवार को मजबूत करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। रूसी एस-400 मिसाइल सिस्टम और स्वदेशी आकाश मिसाइल पहले से ही तैनाती के बाद वायु सुरक्षा का अभेद कवच बना चुके हैं। इसके साथ ही भारत एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर रहा है जिसे ‘सुदर्शन चक्र’ कहा जा रहा है। यह व्यवस्था पूरे देश को एक महाकिले में बदल देगी जहां किसी भी हवाई हमले का प्रयास नाकाम हो जाएगा। इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है—काली, एक ऐसा हथियार जो दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को भी हैरान कर रहा है।
काली क्या है और यह इतना खास क्यों है
काली (KALI–Kilo Ampere Linear Injector) कोई पारंपरिक मिसाइल या एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम नहीं है, बल्कि यह डायरेक्टेड एनर्जी वेपन यानी DEW का उन्नत स्वरूप है। इसकी किरणें दुश्मन के फाइटर जेट, मिसाइल या ड्रोन को बिना विस्फोट किए ही निष्क्रिय कर देती हैं। काली हाई-पावर माइक्रोवेव (HPM) और इलेक्ट्रॉनिक बीम टेक्नोलॉजी का ऐसा संयोजन है जो किसी भी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को जलाकर या पिघलाकर पूरी तरह काम न करने लायक बना देता है। यही वजह है कि चीन के जे-20 जैसे 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट भी इसके सामने टिकने की संभावना खो बैठते हैं।
DEW तकनीक: आधुनिक युद्ध का नया चेहरा
डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स भविष्य के युद्ध की रीढ़ बनते जा रहे हैं। इनमें पारंपरिक गोला-बारूद की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि लेजर, HPM या इलेक्ट्रॉन बीम से ही दुश्मन को निशाना बनाया जाता है। काली की खासियत इसका ‘सॉफ्ट किल’ प्रभाव है, जिसमें लक्ष्य को फिजिकल ध्वंस किए बिना उसकी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली नष्ट कर दी जाती है। इसका फायदा यह है कि कोई भी स्टेल्थ एयरक्राफ्ट, मिसाइल या उपग्रह, जो इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर निर्भर है, एक पल में बेकार हो जाता है।
चीन और भारत की तुलना: काली की रॉ पावर है निर्णायक
चीन के पास भी हाई-पावर माइक्रोवेव तकनीक पर आधारित एक सिस्टम मौजूद है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार काली और चीनी तकनीक में अंतर इसकी क्षमता में है। चीन का DEW सिस्टम मोबिलिटी और रैपिड फायर के मामले में थोड़ा उन्नत माना जाता है, लेकिन काली की रॉ पावर और इसकी बीम की ऊर्जा इसे कहीं अधिक घातक बनाती है। यही कारण है कि यदि यह पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाता है तो जे-20 समेत चीन के किसी भी हाई-टेक प्लेटफॉर्म के लिए यह सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
भारत का रहस्यमयी प्रोजेक्ट: काली-5000 से काली-10000 तक
काली को भारत का सबसे रहस्यमयी रक्षा प्रोजेक्ट माना जाता है, जिसकी जानकारी हमेशा सीमित स्तर पर सार्वजनिक की गई है। इसे 1989 में डीआरडीओ और बार्क द्वारा विकसित किया गया था। यह मूलतः एक लीनियर इलेक्ट्रॉन एक्सीलरेटर है जो किलोएम्पियर रेंज में हाई-करंट इलेक्ट्रॉन बीम उत्पन्न करता है। इसकी संरचना में विशेष मार्क जनरेटर शामिल होते हैं जो अत्यंत उच्च वोल्टेज के पल्स पैदा करते हैं। वर्षों में इसके कई मॉडल विकसित किए गए हैं, जैसे काली-5000, काली-10000, जिनकी क्षमताएं लगातार बढ़ाई जा रही हैं। यह तकनीक न केवल वायु रक्षा बल्कि स्पेस, मिसाइल डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर में भी क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है।
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