ग्रीनलैंड मुद्दे पर यूरोप को टैरिफ की धमकी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत के प्रति अचानक नरम पड़ना वैश्विक राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है। जिन ट्रंप ने कभी भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया और भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डेड इकोनॉमी’ तक कह दिया था, वही अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को “शानदार व्यक्ति और दोस्त” बता रहे हैं। यह बदलाव केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि रणनीतिक मजबूरी का संकेत देता है।
दावोस से आया बड़ा संदेश
स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से ट्रंप का यह बयान कि “हम भारत के साथ एक अच्छी ट्रेड डील करने जा रहे हैं”, पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाला था। खासतौर पर इसलिए, क्योंकि भारत ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी नीति नहीं बदली। भारत ने साफ कर दिया कि राष्ट्रीय हित किसी भी बाहरी दबाव से ऊपर है।
मोदी की रणनीति और ऑपरेशन सिंदूर के बाद का संकेत
ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप के बयानों और रुख में जो हल्कापन दिखा, उसे पीएम मोदी ने समय रहते भांप लिया। भारत ने उसी के अनुरूप अपनी रणनीतिक और कूटनीतिक तैयारी तेज कर दी। नतीजा यह हुआ कि अमेरिका को यह एहसास हुआ कि भारत अब केवल एक उभरता बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम स्तंभ बन चुका है।
भारत की अर्थव्यवस्था से अमेरिका को क्यों चिंता
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिका की दिग्गज प्राइवेट इक्विटी कंपनी कार्लाइल ग्रुप के को-फाउंडर डेविड रूबेनस्टीन का बयान भी अहम रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि आने वाले दशकों में भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। यह आकलन केवल आर्थिक आंकड़ों पर नहीं, बल्कि भारत की स्थिर राजनीति, तेज विकास दर और विशाल उपभोक्ता बाजार पर आधारित है।
भारत–यूरोपियन यूनियन FTA से बदला खेल
अमेरिका को सबसे बड़ा झटका भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) से लगा है। ‘मदर ऑफ ऑल डील’ कहे जा रहे इस समझौते के दायरे में करीब 2 अरब आबादी और दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जीडीपी आएगी। अमेरिका जानता है कि यूरोप का भारत की ओर झुकाव उसकी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक भरोसे का प्रमाण है।
भारत का बजा डंका, ट्रंप की मजबूरी
भारत आज चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और वैश्विक सप्लाई चेन में उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। ऐसे में ट्रंप का सुर बदलना किसी व्यक्तिगत पसंद का नहीं, बल्कि कूटनीतिक मजबूरी का परिणाम है। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के नारे के बीच ट्रंप को यह स्वीकार करना पड़ा कि भारत को नजरअंदाज कर वैश्विक राजनीति नहीं चलाई जा सकती।
बदली वैश्विक धुरी
ट्रंप का बदला हुआ रुख इस बात का संकेत है कि वैश्विक शक्ति संतुलन धीरे-धीरे एशिया, खासकर भारत की ओर झुक रहा है। पीएम मोदी की नेतृत्व क्षमता, स्पष्ट विदेश नीति और आर्थिक मजबूती ने भारत को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें भी अपने सुर बदलने को मजबूर हैं।
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