सबरीमाला मंदिर से जुड़े सोने के कथित गुम होने का मामला सामने आने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। यह मामला मंदिर प्रशासन, देवस्वोम बोर्ड और सरकार की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। चूंकि सबरीमाला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए इससे जुड़ा हर विवाद स्वाभाविक रूप से संवेदनशील बन जाता है।
विधानसभा के भीतर और बाहर सियासी हंगामा
गुरुवार को केरल विधानसभा में इस मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ। सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) और विपक्षी संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) आमने-सामने आ गए। तीखी नोकझोंक और आरोप-प्रत्यारोप के चलते सदन की कार्यवाही कई बार बाधित हुई, जिससे यह साफ हो गया कि मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि पूर्णतः राजनीतिक रंग ले चुका है।
UDF का आरोप: इस्तीफे के बिना नहीं होगी चर्चा
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने देवस्वोम मंत्री वी.एन. वासवन के इस्तीफे की मांग को लेकर सदन में जोरदार विरोध किया। विपक्ष का आरोप है कि सोना गुम होने के पीछे गंभीर अनियमितताएं हुई हैं और इस पूरे मामले में सीपीआई(एम) की भूमिका संदिग्ध है। यूडीएफ नेताओं का कहना है कि जब तक मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद नहीं छोड़ते, तब तक इस विषय पर चर्चा का कोई औचित्य नहीं है।
LDF का पलटवार: राजनीतिक साजिश का आरोप
वहीं सत्तारूढ़ एलडीएफ ने विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। एलडीएफ नेताओं का कहना है कि यूडीएफ इस संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहा है। उनका दावा है कि मामले की जांच प्रक्रिया जारी है और बिना तथ्यों के आरोप लगाना श्रद्धालुओं की भावनाओं से खिलवाड़ है।
देवस्वोम बोर्ड और सरकार की भूमिका पर सवाल
इस पूरे विवाद ने देवस्वोम बोर्ड की कार्यप्रणाली और सरकारी निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का कहना है कि मंदिर संपत्ति की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है, जबकि सरकार का तर्क है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
आस्था बनाम राजनीति की जटिल बहस
सबरीमाला विवाद एक बार फिर यह दिखाता है कि केरल की राजनीति में आस्था और सत्ता किस तरह आपस में टकरा जाती हैं। जहां एक ओर श्रद्धालु पारदर्शिता और जवाबदेही चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
आगे क्या होगा राजनीतिक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है। अगर जांच में कोई बड़ी गड़बड़ी सामने आती है, तो इसका असर सरकार की साख पर पड़ सकता है। वहीं विपक्ष इसे लगातार दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करता रहेगा।
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