केरल साहित्य महोत्सव में बातचीत के दौरान शशि थरूर ने साफ कहा कि संसद के भीतर उन्होंने हमेशा कांग्रेस के आधिकारिक रुख का पालन किया है। उनके अनुसार सार्वजनिक रूप से सैद्धांतिक असहमति केवल एक बार सामने आई, और वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर थी। थरूर ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक अनुशासन और वैचारिक ईमानदारी—दोनों उनके सार्वजनिक जीवन की बुनियाद रहे हैं।
ऑपरेशन सिंदूर पर क्यों लिया अलग रुख
थरूर ने बताया कि पहलगाम घटना के बाद उन्होंने एक अखबार में स्तंभ लिखकर यह तर्क रखा था कि दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन प्रतिक्रिया सीमित, लक्षित और विवेकपूर्ण होनी चाहिए। उनका मानना था कि भारत को लंबे सैन्य टकराव में उलझने के बजाय आतंकवादी ठिकानों तक कार्रवाई सीमित रखनी चाहिए, ताकि विकास की प्राथमिकता बाधित न हो।
सरकार की कार्रवाई और थरूर का तर्क
कांग्रेस सांसद ने यह भी कहा कि उन्हें आश्चर्य हुआ जब भारत सरकार ने व्यवहार में वही किया, जिसकी उन्होंने सार्वजनिक रूप से वकालत की थी। उनके अनुसार यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर व्यावहारिक सोच अपनाई जाती है। थरूर ने इसे रणनीतिक परिपक्वता का उदाहरण बताया।
नेतृत्व से मतभेद की अटकलें
हाल के दिनों में शशि थरूर और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद की चर्चाएं तेज हुई हैं। राहुल गांधी द्वारा कोच्चि के एक कार्यक्रम में थरूर का नाम न लिए जाने और राज्य स्तर पर उन्हें नजरअंदाज किए जाने की बातों पर भी चर्चा हुई। हालांकि थरूर ने इन अटकलों को बढ़ावा देने के बजाय अपने विचारों पर स्पष्टता देना अधिक जरूरी समझा।
नेहरू का संदर्भ और राष्ट्रीय दृष्टि
थरूर ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है। उन्होंने नेहरू का यह प्रश्न उद्धृत किया—“अगर भारत खत्म हो जाएगा तो कौन जीवित रहेगा?”—और इसे आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक बताया। उनके अनुसार किसी भी कार्रवाई का उद्देश्य राष्ट्र की सुरक्षा के साथ उसकी दीर्घकालिक स्थिरता भी होना चाहिए।
विचार, असहमति और लोकतंत्र
शशि थरूर का यह बयान भारतीय लोकतंत्र में वैचारिक असहमति की भूमिका को रेखांकित करता है। उनका मानना है कि लोकतंत्र में विचारों का सम्मान होना चाहिए, बशर्ते वे राष्ट्रहित और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हों। ऑपरेशन सिंदूर पर उनका रुख इसी संतुलन का उदाहरण है।
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