भारतीय आस्थाओं में भगवान शिव का स्थान अद्वितीय है। वे ऐसे देव हैं जिन्हें स्वरूप और निराकार दोनों ही रूपों में पूजा जाता है। उनकी मूर्तियाँ, जिनमें जटाओं से बहती गंगा, गले में नाग और हाथ में त्रिशूल दिखता है, साकार शिव का परिचय देती हैं। वहीं शिवलिंग उनका निराकार, सर्वव्यापक स्वरूप है। इन दोनों रूपों के बीच एक और अत्यंत महत्वपूर्ण स्तर है—सदाशिव, जिन्हें परम चेतना का प्रतीक कहा गया है। जहां शिव उपासना में सहज उपलब्ध हैं, वहीं सदाशिव केवल गहन ध्यान और आत्मानुभूति में अनुभव होते हैं।
शिव का संसार से संबंध और सदाशिव का पारब्रह्म स्वरूप
भगवान शिव को त्रिदेवों में संहारकर्ता माना गया है और वे सृष्टि–चक्र के सक्रिय भाग हैं। वे भक्तों के दुःख हरने वाले, योगियों के आदिदेव और कैलाशवासी महादेव हैं, जो मनुष्यों की भक्ति और भावनाओं के सबसे निकट हैं। इसके विपरीत सदाशिव को किसी क्रिया, कर्तव्य या सृष्टि–प्रवाह से नहीं जोड़ा जाता। वे न आरंभ में हैं, न अंत में, न रूप में हैं न गुण में—वे “अस्तित्व की सर्वोच्च अवस्था” हैं, जहाँ सब भेद मिट जाते हैं। शैव तंत्र और आगमों में सदाशिव को परब्रह्म, परम तत्त्व और अनंत चेतना की अंतिम परत बताया गया है।
पूजा के शिव और ध्यान के सदाशिव
शिव को भक्ति, स्तुति और पूजा के माध्यम से सहज रूप में अनुभव किया जा सकता है। वे भक्तों की पुकार तुरंत सुनने वाले देवता हैं और मानव भावना के हर उतार–चढ़ाव से जुड़े रहते हैं। ठीक इसके विपरीत, सदाशिव तक पहुँचना किसी क्रिया या पूजा से नहीं, बल्कि ध्यान, समाधि और आत्मज्ञान के माध्यम से संभव है। सदाशिव वह अवस्था है जहाँ साधक “मैं” और “यह” के भ्रम से परे उठ जाता है और स्वयं को समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त अनुभव करता है। इसीलिए कहा जाता है कि शिव भक्ति का मार्ग दिखाते हैं और सदाशिव मुक्ति का द्वार खोलते हैं।
शास्त्रों में दोनों के भिन्न आयामों का वर्णन
शैव आगमों और तंत्र परंपराओं में शिव और सदाशिव के सूक्ष्म भेद स्पष्ट किए गए हैं। शिव गुणयुक्त हैं, स्वरूपवान हैं और उनकी कृपा से जीवन में परिवर्तन आता है। वहीं सदाशिव निर्गुण हैं, निराकार हैं और किसी भी गुणात्मक क्रिया से परे हैं। शिव वह ऊर्जा हैं जो संसार को गति देती है, जबकि सदाशिव वह शून्य हैं जिसमें सब कुछ विलीन होकर एकरस हो जाता है। शैव मत में कहा गया है कि सदाशिव में “करुणा” और “ज्ञान” की दो धाराएं एक साथ प्रवाहित होती हैं—यही उन्हें परम तत्व बनाती हैं।
एक ही सत्य के दो स्तर: विरोध नहीं, पूरकता
आध्यात्मिक साधना में शिव और सदाशिव विरोधाभास नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो परस्पर पूरक आयाम हैं। भक्ति के पथ पर चलने वाला साधक शिव की कृपा से भीतर शुद्धि, स्थिरता और ऊर्जा पाता है। यही साधना आगे बढ़कर आत्मज्ञान में बदलती है और साधक सदाशिव तत्व की ओर बढ़ने लगता है। सरल शब्दों में, शिव साधना की शुरुआत हैं और सदाशिव साधना का चरम। शिव से आरंभ होने वाली उपासना साधक को अंततः सदाशिव की अवस्था तक ले जाती है, जहाँ वह अपने भीतर और बाहर एक ही परम चेतना का अनुभव करता है।
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