बारिश की शुरुआत धरती की सतह से होती है। जब सूरज की गर्मी से नदियों, झीलों, समुद्रों और मिट्टी में मौजूद पानी गर्म होकर भाप बनता है, तो यह हल्की जलवाष्प हवा के साथ ऊपर उठने लगती है। ऊंचाई पर जाते-जाते तापमान गिरता है और यह भाप ठंडी होकर सूक्ष्म जलकणों में बदल जाती है। इसी प्रक्रिया को संघनन यानी कंडेन्सेशन कहा जाता है, जिससे बादलों का निर्माण होता है।
बादल कैसे बनते हैं और भारी क्यों हो जाते हैं?
बादलों के भीतर मौजूद सूक्ष्म जलकण लगातार आपस में टकराते रहते हैं। टकराव के कारण ये बूंदें बड़ी और भारी होती जाती हैं। जब उनका वजन इतना बढ़ जाता है कि हवा उन्हें संभाल नहीं पाती, तब गुरुत्वाकर्षण बल उन्हें धरती की ओर खींच लेता है। यही क्षण बारिश का रूप ले लेता है।
कितनी ऊंचाई से गिरती है बारिश?
बारिश मुख्य रूप से वायुमंडल की सबसे निचली परत ट्रोपोस्फेयर में होती है। सामान्य बारिश वाले बादल 2,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई पर बनते हैं, जबकि मानसूनी और गरज-चमक वाले क्यूम्यूलोनिंबस बादल 10 से 12 किलोमीटर तक ऊंचे हो सकते हैं। इन्हीं ऊंचाइयों से पानी की बूंदें धरती तक पहुंचती हैं।
जेट स्ट्रीम का बारिश में क्या रोल है?
जेट स्ट्रीम बहुत तेज गति से बहने वाली हवाएं होती हैं, जो धरती से लगभग 11 से 13 किलोमीटर की ऊंचाई पर बहती हैं। ये हवाएं मौसम प्रणालियों की दिशा तय करती हैं। भारत में सर्दियों के दौरान जेट स्ट्रीम दक्षिण की ओर खिसककर पश्चिमी विक्षोभ को अपने साथ लाती है, जिससे उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी होती है।
पश्चिमी विक्षोभ और मानसून का कनेक्शन
पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर क्षेत्र से उठने वाला नमी युक्त चक्रवाती सिस्टम है। यह जेट स्ट्रीम के सहारे भारत तक पहुंचता है और सर्दियों में वर्षा कराता है। वहीं मानसून के दौरान अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी भरी हवाएं देश के अलग-अलग हिस्सों में भारी बारिश लाती हैं। कई बार मानसून और पश्चिमी विक्षोभ की टक्कर से अत्यधिक वर्षा और बाढ़ की स्थिति भी बन जाती है।
बारिश सिर्फ पानी नहीं, संतुलन है
बारिश न केवल धरती को ठंडक देती है, बल्कि जल चक्र को संतुलित रखती है। कृषि, भूजल, नदियां और पर्यावरण—सब बारिश पर निर्भर हैं। इसलिए आसमान से गिरती हर बूंद अपने साथ विज्ञान, जीवन और प्रकृति का संतुलन लेकर आती है।
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