कोलकाता: चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और चुनाव आयोग के कामकाज की कोर्ट-निगरानी में जांच की मांग की। बनर्जी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन समिति से बाहर किया गया और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को समिति में शामिल किया गया। हालांकि, चुनाव आयोग ने बुधवार को आंतरिक मतभेद की खबरों पर सफाई देते हुए कहा कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग टिप्पणियां और सुझाव देना सामान्य प्रक्रिया है तथा आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
CJI को चयन समिति से हटाने वाले कानून पर अभिषेक का सवाल
अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। 2023 के कानून के तहत CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने Anoop Baranwal मामले में संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति की व्यवस्था निर्धारित की थी। बनर्जी का आरोप है कि CJI को चयन प्रक्रिया से हटाने के बाद नियुक्ति व्यवस्था में सरकार की भूमिका बढ़ गई है। उन्होंने इसी आधार पर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए।
SIR पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट से विवाद
विवाद की शुरुआत उस रिपोर्ट से हुई जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटा से जुड़े सिस्टम के संचालन जैसे मुद्दे शामिल थे। इन रिपोर्टों के आधार पर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। अभिषेक बनर्जी ने भी CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने और पूरे मामले की कोर्ट-निगरानी में जांच की मांग की है।
चुनाव आयोग ने कहा- अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए
वहीं, चुनाव आयोग ने कथित आंतरिक टकराव की खबरों को लेकर कहा कि आयोग के सदस्यों के बीच विचार, टिप्पणियां और सुझाव आना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के मुताबिक, पिछले एक साल में SIR समेत उसके सभी अंतिम निर्णय और निर्देश तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इस तरह फिलहाल विवाद का एक पक्ष दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्ट है, जबकि आयोग का आधिकारिक रुख है कि इन टिप्पणियों को औपचारिक असहमति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
SIR को लेकर बंगाल में भी जारी है राजनीतिक और कानूनी विवाद
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के बीच पहले से ही विवाद चल रहा है। मतदाता नामों को जोड़ने, हटाने और अपील की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। इस मामले से जुड़े मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है। बुधवार को दिल्ली में SIR से संबंधित एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मतदाताओं को भेजे गए नोटिसों को लेकर प्रक्रिया पर सवाल उठाए और जवाब दाखिल करने के लिए WhatsApp तथा ई-मेल जैसे माध्यमों की संभावना पर भी चर्चा की।
भाजपा नेताओं के जेल जाने को लेकर अभिषेक का बयान
अभिषेक बनर्जी ने अपने बयान में केंद्र और भाजपा नेताओं पर संवैधानिक संस्थाओं के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में संस्थाओं के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेही का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने अपने बयान में भाजपा नेताओं और मंत्रियों के जेल जाने की बात भी कही। यह बयान अभिषेक बनर्जी का राजनीतिक आरोप और चेतावनी है; इसे किसी न्यायिक निष्कर्ष या किसी व्यक्ति के खिलाफ स्थापित आपराधिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।