नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील करने वाले मतदाताओं के लिए अहम खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट 16 अक्टूबर को इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। इन याचिकाओं में अपीलीय न्यायाधिकरणों से लंबित मामलों का जल्द निपटारा करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उन्हें नवंबर में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान का अवसर मिलना चाहिए। इसके लिए उनकी अपीलों पर समय रहते फैसला होना जरूरी है। सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की मांग वाले मामलों को प्राथमिकता देने पर विचार किया जा सकता है।
नाम जोड़ने की अपीलों को पहले निपटाने का सुझाव
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान SIR अपीलीय न्यायाधिकरणों के सामने आ रही कठिनाइयों पर ध्यान दिया। अदालत ने माना कि लंबित अपीलों का निपटारा करना एक बड़ी चुनौती है। पीठ ने संकेत दिया कि न्यायाधिकरणों को पहले उन मामलों पर फैसला करने के लिए कहा जा सकता है, जिनमें मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल कराने की मांग कर रहे हैं। इसके बाद नाम हटाने से संबंधित अपीलों पर विचार किया जा सकता है। इस सुझाव का उद्देश्य उन लोगों को राहत देना है, जिनके नाम पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निर्णय सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा। अब सभी की नजरें 16 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।
नवंबर के निकाय चुनाव से पहले फैसले की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने चिंता जताई कि यदि अपीलों का निपटारा समय पर नहीं हुआ, तो कई मतदाता आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान करने से वंचित रह सकते हैं। नवंबर में होने वाले चुनावों को देखते हुए लंबित मामलों पर जल्द फैसला लेने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत से इस प्रक्रिया में तेजी लाने का अनुरोध किया। उनका कहना है कि मतदाताओं के नाम सूची में शामिल होने या नहीं होने का फैसला चुनाव से पहले होना जरूरी है। इससे प्रभावित लोगों को अपने मतदान के अधिकार को लेकर स्पष्टता मिल सकेगी। समय पर निर्णय नहीं होने की स्थिति में पात्र मतदाताओं के लिए चुनाव में हिस्सा लेना मुश्किल हो सकता है।
उपचुनाव में मतदान नहीं कर पाने का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने उन मतदाताओं की परेशानी का मुद्दा उठाया, जिनके नाम SIR के दौरान मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग असमंजस में हैं कि उन्हें आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान करने दिया जाएगा या नहीं। उन्होंने यह भी बताया कि हाल में हुए उपचुनावों में संबंधित मतदाताओं को वोट देने की अनुमति नहीं मिली थी। ऐसे में लंबित अपीलों का समय पर निपटारा करना बेहद जरूरी है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि जिन लोगों ने अपने नाम दोबारा जुड़वाने के लिए अपील की है, उनके मामलों पर प्राथमिकता से विचार किया जाए। इससे मतदाताओं को चुनाव से पहले अपनी स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। अब अदालत के अगले कदम से यह तय करने में मदद मिलेगी कि इन मामलों का निपटारा किस तरह किया जाएगा।
न्यायाधिकरणों के सामने सॉफ्टवेयर की समस्या
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने अपीलीय न्यायाधिकरणों में सॉफ्टवेयर से जुड़ी तकनीकी समस्याओं का भी उल्लेख किया। इन समस्याओं के कारण लंबित अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया प्रभावित होने की चुनौती सामने आई है। पीठ ने कहा कि इन कठिनाइयों को दूर करने की कोशिश की जा रही है। न्यायाधिकरणों को एक ओर बड़ी संख्या में लंबित मामलों पर फैसला करना है, तो दूसरी ओर तकनीकी अड़चनों का भी समाधान करना है। ऐसे में मामलों का समय पर निपटारा सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण हो गया है। खासकर उन मतदाताओं के लिए यह प्रक्रिया अहम है, जो अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने की मांग कर रहे हैं। तकनीकी समस्याओं का समाधान होने से अपीलों की सुनवाई और निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है।
93 प्रतिशत अपीलें मंजूर होने का वकीलों का दावा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत को बताया कि न्यायाधिकरणों में अब तक जिन अपीलों का निपटारा किया गया है, उनमें से 93 प्रतिशत को मंजूरी मिली है। वकीलों ने इस आंकड़े का हवाला देते हुए बाकी लंबित अपीलों पर भी जल्द फैसला लेने की मांग की। उनका तर्क है कि अपीलों के शीघ्र निपटारे से पात्र मतदाताओं को आगामी निकाय चुनावों में मतदान का अवसर मिल सकता है। हालांकि, 93 प्रतिशत मंजूरी का आंकड़ा याचिकाकर्ताओं के वकीलों की ओर से अदालत में किया गया दावा है। इसे अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए। अब 16 अक्टूबर की सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट लंबित मामलों के निपटारे को लेकर क्या निर्देश देता है। इस फैसले का असर पश्चिम बंगाल में SIR के तहत प्रभावित मतदाताओं की आगे की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
अब 16 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मामला अब चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से अहम बन गया है। प्रभावित मतदाता अपने नाम दोबारा जुड़वाने के लिए न्यायाधिकरणों में अपील कर रहे हैं। वहीं, याचिकाकर्ताओं की मांग है कि नवंबर के स्थानीय निकाय चुनावों से पहले इन मामलों पर फैसला हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधिकरणों की समस्याओं और अपीलों के निपटारे से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दिया है। नाम जोड़ने से संबंधित मामलों को प्राथमिकता देने का सुझाव भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हालांकि, मतदाताओं को मतदान का अवसर मिलेगा या नहीं, यह संबंधित मामलों के निपटारे और लागू चुनावी नियमों पर निर्भर करेगा। ऐसे में 16 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई पश्चिम बंगाल के प्रभावित मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।