बहरमपुर: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। कहीं भव्य पंडाल सज रहे हैं, तो कहीं रोशनी और ढाक की गूंज से उत्सव का माहौल बन रहा है। इसी बीच बहरमपुर के मंडल परिवार की दुर्गा पूजा अपनी अनूठी परंपरा और मानवता के संदेश को लेकर चर्चा में है। पांच साल पहले शुरू हुई इस पूजा में जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर सभी को समान सम्मान देने का संदेश दिया जा रहा है। यहां मां दुर्गा को परिवार की ‘बड़ी बेटी’ माना जाता है।
10 कन्याओं की पूजा, विविधता में एकता का संदेश
मंडल परिवार की दुर्गा पूजा का सबसे खास अनुष्ठान दस कुमारी कन्याओं की पूजा है। हर साल जिले के अलग-अलग इलाकों और विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाली 10 बच्चियों को देवी के रूप में पूजित किया जाता है। इस परंपरा के जरिए परिवार समाज में जाति, धर्म और वर्ण के आधार पर होने वाले भेदभाव को मिटाने का संदेश देता है।
ऑटिज्म से प्रभावित 7 साल की आरवी भी बनेगी कुमारी
इस साल पूजा की खास बात यह है कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित सात साल की बच्ची आरवी को दसवीं कुमारी के रूप में चुना गया है। आदिवासी और ब्राह्मण समुदाय की बच्चियों के साथ आरवी की भी देवी के रूप में पूजा की जाएगी। यह पहल ऑटिज्म को लेकर समाज में मौजूद गलत धारणाओं और पूर्वाग्रहों को दूर करने का संदेश देती है। साथ ही यह बताती है कि हर बच्चे को प्यार, सम्मान और समान अवसर मिलना चाहिए।
पांच साल पहले हुई थी अनूठी पूजा की शुरुआत
इस पूजा की शुरुआत मंडल परिवार के मुखिया स्वर्गीय हरिहर मंडल और ललिता मंडल की सबसे छोटी बहू संचाली मंडल की पहल पर हुई थी। धीरे-धीरे यह पूजा परिवार की परंपरा से आगे बढ़कर लोगों के बीच मानवता और सामाजिक एकता का संदेश देने वाला आयोजन बन गई है। हर साल दूर-दूर से लोग इसमें शामिल होने पहुंचते हैं।
‘मां का कोई अलग रूप, जाति या धर्म नहीं होता’
परिवार की बहू संचाली मंडल के मुताबिक, मां का कोई अलग रूप, जाति या धर्म नहीं होता और मां का स्थान सभी के लिए समान है। उन्होंने कहा कि यहां पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पूजा होती है। दस कुमारी कन्याओं की पूजा इस आयोजन को खास बनाती है। उनके अनुसार, महज पांच साल में यह पूजा भेदभाव से ऊपर उठकर सभी की पूजा बन गई है।
मानवता ही सबसे बड़ा धर्म
बहरमपुर के मंडल परिवार की यह दुर्गा पूजा समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि किसी भी बच्चे को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि या विशेष जरूरतों के आधार पर अलग नहीं समझना चाहिए। ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को भी प्यार, सम्मान और अवसर देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। मां दुर्गा की आराधना के साथ यह परिवार हर साल समानता, समावेश और मानवता की भावना को आगे बढ़ा रहा है।