कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान पुस्तक स्टॉलों के जरिए राजनीतिक विचारधारा और जनसंपर्क का अभियान इस बार नए सिरे से चर्चा में है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पूजा पंडालों के आसपास बड़े पैमाने पर बुक स्टॉल लगाने की रणनीति अपनाई। पार्टी का दावा है कि इस अभियान के तहत किताबों की बिक्री ने दो करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर लिया। हालांकि, 2.15 करोड़ रुपए की कुल बिक्री के दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। भाजपा ने दुर्गा पूजा के दौरान राज्यभर में करीब 1,500 बुक स्टॉल लगाने की योजना बनाई थी। पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष अमिताभ राय ने इससे पहले बताया था कि प्रमुख पूजा पंडालों के पास स्टॉल लगाए जाएंगे। इन स्टॉलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), भाजपा के इतिहास और राष्ट्रवादी विचारधारा से संबंधित पुस्तकें उपलब्ध कराने की योजना थी।
पुस्तक स्टॉलों के जरिए जनसंपर्क की रणनीति
बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान पुस्तक स्टॉल लंबे समय से राजनीतिक और वैचारिक संवाद का माध्यम रहे हैं। खास तौर पर वामपंथी दलों के पुस्तक स्टॉल दशकों से इस परंपरा का हिस्सा रहे हैं। अब भाजपा भी इस मंच का इस्तेमाल अपनी विचारधारा, राजनीतिक इतिहास और सरकार की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए कर रही है। भाजपा की योजना केवल पुस्तकें बेचने तक सीमित नहीं थी। पार्टी ने केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा अपनी सरकार के कामकाज से संबंधित पुस्तिकाएं भी निःशुल्क वितरित करने की बात कही थी। इन पुस्तिकाओं में निवेश, कल्याणकारी योजनाओं, प्रशासनिक सुधार, महिला सुरक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण जैसे विषयों को शामिल करने की योजना थी।
मोदी और श्यामा प्रसाद मुखर्जी से जुड़े साहित्य पर जोर
भाजपा के बुक स्टॉलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन, प्रशासनिक कार्यकाल और राजनीतिक विचारों से जुड़ी पुस्तकों को प्रमुखता दी गई। इसके अलावा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, राजनीतिक योगदान और विचारधारा पर आधारित साहित्य भी अभियान का अहम हिस्सा रहा। आरएसएस के इतिहास, संगठनात्मक गतिविधियों, हिंदू धार्मिक परंपराओं, राष्ट्रवाद और राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी पुस्तकों को भी स्टॉलों पर रखने की योजना थी। स्वामी विवेकानंद और अन्य भारतीय विचारकों के साहित्य के जरिए भी पाठकों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया गया।हालांकि, इन पुस्तकों में से किसकी बिक्री सबसे अधिक हुई और युवा पाठकों की वास्तविक भागीदारी कितनी रही, इस संबंध में विस्तृत और स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
वामपंथी पुस्तक स्टॉलों की परंपरा के बीच भाजपा की चुनौती
बंगाल में दुर्गा पूजा के पुस्तक स्टॉलों को लेकर भाजपा और वामपंथी दलों के बीच वैचारिक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिली है। जहां वामपंथी दल मार्क्सवादी और प्रगतिशील साहित्य के जरिए पाठकों तक पहुंच बनाते रहे हैं, वहीं भाजपा हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और अपने राजनीतिक विचारों से जुड़ी पुस्तकों को आगे बढ़ा रही है। इस प्रतिस्पर्धा को केवल पुस्तक बिक्री के आंकड़ों से राज्य की वैचारिक दिशा में निर्णायक बदलाव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। इसके लिए पाठकों की पसंद, बिक्री के सत्यापित आंकड़ों और अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के साहित्य के प्रति लोगों की रुचि का व्यापक आकलन जरूरी है।
सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा का सांस्कृतिक विमर्श
राज्य में भाजपा की राजनीतिक रणनीति में सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक परंपराओं और राष्ट्रवादी विचारधारा को प्रमुखता दी जा रही है। पार्टी नेतृत्व पुस्तक स्टॉलों को इसी व्यापक जनसंपर्क अभियान का हिस्सा मानता है। भाजपा की ओर से बिक्री के आंकड़ों को बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है, लेकिन इसे बंगाल में वामपंथी विचारधारा के पूर्ण खारिज होने का प्रमाण मानने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र साक्ष्य सामने नहीं आए हैं। दूसरी ओर, वामपंथी दलों की पुस्तक स्टॉल परंपरा भी दुर्गा पूजा के दौरान चर्चा में रही। ऐसे में बंगाल के पूजा पंडालों के आसपास पुस्तक बिक्री का यह मुकाबला राज्य की राजनीति में विचारधारा, संस्कृति और जनसंपर्क के बदलते स्वरूप को सामने लाता है।आखिरकार, दुर्गा पूजा के पुस्तक स्टॉलों की अहमियत केवल कितनी किताबें बिकीं, इससे तय नहीं होगी। यह भी देखना होगा कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का साहित्य पाठकों तक कितनी पहुंच बना पाता है और क्या यह रुचि पूजा के बाद भी बनी रहती है।