अलीपुरद्वार: उत्तर बंगाल के अलीपुरद्वार स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व में लंबे इंतजार के बाद शुक्रवार को बाघों की स्थायी आबादी बसाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई करीब तीन वर्षीय रॉयल बंगाल बाघिन को बक्सा के जंगल में छोड़ा गया। यह पश्चिम बंगाल की पहली संगठित टाइगर रीइंट्रोडक्शन परियोजना का अहम चरण है। बाघिन को 30 सितंबर को भारतीय वायुसेना के सैन्य परिवहन विमान से हाशिमारा एयरबेस लाया गया था। इसके बाद उसे बक्सा के राजाभातखावा क्षेत्र में तैयार किए गए विशेष सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में रखा गया, जहां वन विभाग की टीम ने उसके स्वास्थ्य और व्यवहार पर नजर रखी। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी में बाघिन को जंगल में छोड़ा गया। अधिकारियों ने बताया कि अगले दो महीनों में तीन और बाघों को बक्सा लाने की योजना है।
वाल्मीकि से बक्सा तक पहुंची बाघिन, एयरफोर्स विमान से हुआ ट्रांसलोकेशन
बक्सा में बाघों की आबादी बहाल करने के लिए बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से एक युवा बाघिन का चयन किया गया। कई दिनों की कोशिश के बाद उसे 29 सितंबर की शाम ट्रैंक्विलाइज कर सुरक्षित रूप से पकड़ा गया। इसके बाद आवश्यक स्वास्थ्य जांच और अन्य प्रक्रियाएं पूरी कर उसे हवाई मार्ग से पश्चिम बंगाल लाया गया। बाघिन भारतीय वायुसेना के C-130J सैन्य परिवहन विमान से हाशिमारा एयरबेस पहुंची। वहां से उसे विशेष वाहन के जरिए बक्सा टाइगर रिजर्व के निर्धारित क्षेत्र में ले जाया गया। वन अधिकारियों के मुताबिक, स्थानांतरण के बाद उसका स्वास्थ्य सामान्य था और उसका व्यवहार भी सामान्य पाया गया। जंगल में सीधे छोड़ने से पहले उसे सॉफ्ट-रिलीज एनक्लोजर में निगरानी में रखा गया। इस दौरान उसके भोजन और व्यवहार पर भी नजर रखी गई। रिपोर्टों के मुताबिक, बाघिन ने बक्सा पहुंचने के बाद करीब 10 किलो ताजा मांस खाया।
बक्सा में लंबे समय से नहीं था स्थायी बाघ, अब शुरू हुआ पुनर्वास अभियान
बक्सा टाइगर रिजर्व लंबे समय से बाघों की स्थायी आबादी की कमी से जूझ रहा है। हालांकि समय-समय पर कैमरा ट्रैप में बाघों की मौजूदगी दर्ज हुई है, लेकिन अधिकारियों का लक्ष्य अब यहां एक स्थायी और प्रजननक्षम आबादी विकसित करना है। इस अभियान के तहत केवल बाघों को स्थानांतरित करना ही नहीं, बल्कि पूरे आवास को उनके अनुकूल बनाना भी परियोजना का हिस्सा है। वन विभाग ने बक्सा में शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने पर काम किया है। रिपोर्टों के अनुसार, चीतल समेत अन्य शाकाहारी जीवों की संख्या बढ़ाने के लिए वर्षों से प्रयास किए जा रहे हैं और करीब 870 चीतल विभिन्न स्रोतों से बक्सा में छोड़े जा चुके हैं। बक्सा का भौगोलिक महत्व भी इस परियोजना को खास बनाता है। रिजर्व भूटान के फिप्सू वन्यजीव अभयारण्य और असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ा हुआ है, जिससे यह वन्यजीवों के आवागमन के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता है।
अगले दो महीनों में तीन और बाघ लाने की तैयारी
पहली बाघिन की सफल रिहाई के बाद अब बक्सा में बाघों की संख्या बढ़ाने की योजना पर आगे बढ़ने की तैयारी है। अधिकारियों के अनुसार, अगले दो महीनों के भीतर तीन और बाघों को रिजर्व में लाने की योजना है।इसके अलावा, अगले दो वर्षों में कम से कम छह और बाघों को बक्सा लाने को लेकर अन्य राज्यों के साथ बातचीत चल रही है। इससे परियोजना का लक्ष्य केवल तत्काल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि लंबे समय में एक स्थिर आबादी तैयार करना है। बाघिन को रेडियो-कॉलर से लैस किया गया है, जिससे जंगल में छोड़े जाने के बाद उसकी गतिविधियों और अनुकूलन पर लगातार नजर रखी जा सकेगी। वन विभाग के लिए यह निगरानी यह समझने में भी मदद करेगी कि बाघिन नए आवास में किस तरह व्यवहार कर रही है।
बक्सा में बाघों की वापसी से इको-टूरिज्म को भी उम्मीद
बक्सा में बाघों की वापसी को वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ डुआर्स क्षेत्र के पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य के वन मंत्री मनोज कुमार ओरांव ने कहा है कि बाघों की मौजूदगी से क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि बाघों की पुनर्स्थापना केवल पर्यटन बढ़ाने का अभियान नहीं है। विशेषज्ञों और वन अधिकारियों के अनुसार, किसी क्षेत्र में शीर्ष शिकारी की स्थायी मौजूदगी के लिए पर्याप्त शिकार, पानी, सुरक्षित वन क्षेत्र और कम मानव हस्तक्षेप जरूरी है। इसी वजह से बक्सा में टाइगर रीइंट्रोडक्शन के साथ पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है।