कोलकाता: पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को दो विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह बदलने के मामले में कोलकाता हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए हैं। नौशाद सिद्दीकी की पार्टी 'इंडियन सेक्युलर फ्रंट' (ISF) का प्रतीक चिन्ह बदलने के खिलाफ दायर याचिका पर गुरुवार को सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति कृष्णा राव की पीठ ने कहा कि आयोग के कामकाज के तरीके से निराश होकर लोगों को अदालतों का रुख करना पड़ रहा है। अदालत ने पूछा कि महज चार महीने पहले इस्तेमाल किए गए चुनाव चिन्ह को दूसरे दल को क्यों आवंटित कर दिया गया?
"183 फ्री सिम्बल होने के बावजूद विवादित फैसला क्यों?" – न्यायमूर्ति कृष्णा राव
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने निर्वाचन आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए कहा, "चुनाव आयोग का कामकाज काफी परेशान करने वाला है। वे ऐसा कदम उठा रहे हैं जिससे लोगों को कोर्ट भागना पड़ रहा है। जब 183 फ्री सिम्बल (मुक्त चुनाव चिन्ह) उपलब्ध थे, तो आपने वही 'लिफाफा' (खाम) चिन्ह क्यों चुना? चार महीने पहले जिस दल को जो प्रतीक दिया गया था, उसे आयोग ने आरक्षित (फ्रीज) क्यों नहीं रखा? प्राधिकारी से पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है।"अदालत ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे चुनाव शुरू होते ही खेल भी शुरू हो जाता है। मुख्य चुनाव में दिया गया प्रतीक कुछ ही महीनों बाद उपचुनाव में क्यों बदल दिया गया, यह समझ से परे है।
आयोग की दलील- पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त दलों के लिए नियम अलग, वकील विकास रंजन की तीखी बहस
आयोग के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि नियमानुसार आईएसएफ आयोग के रिकॉर्ड में एक स्वीकृत/मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं है। 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 'फ्री सिम्बल' के तौर पर 'लिफाफा' (खाम) प्रतीक पर चुनाव लड़ा था। आयोग का कहना था कि गैर-मान्यता प्राप्त दल आरक्षित प्रतीक का दावा नहीं कर सकते और यह विकल्प खुद राजनीतिक दलों ने चुना था।इसके जवाब में आईएसएफ के वरिष्ठ वकील विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा, "मई महीने में हमने 'लिफाफा' चिन्ह पर चुनाव लड़ा था और पांच महीने बाद उप-चुनाव में दूसरा सिम्बल थमा दिया गया। पूरा मामला चुनाव आयोग की संदिग्ध भूमिका की ओर इशारा करता है। आयोग खुद चुनाव चिन्ह तय कर बांट रहा है।"
ऋतब्रत की पार्टी को मिला 'खाम', हुमायूं कबीर की पार्टी को 'टेबल'
आयोग के इस नए फेरबदल के तहत आईएसएफ (ISF) का पुराना 'लिफाफा' (खाम) प्रतीक ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाली 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' को आवंटित कर दिया गया है। वहीं आईएसएफ को 'बांसुरी' या 'अलमारी' जैसे विकल्प दिए गए हैं। गौरतलब है कि पूर्व में विधानसभा चुनाव के दौरान हुमायूं कबीर की 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) को 'बांसुरी' चिन्ह दिया गया था, जबकि इस उपचुनाव में उन्हें 'टेबल' मिला है।हाईकोर्ट में उपस्थित 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' के वकील विश्वरूप भट्टाचार्य से जब जज ने पूछा कि उन्होंने दूसरे का चिन्ह क्यों मांगा, तो उन्होंने बताया कि आयोग ने तीन विकल्प दिए थे, जिनमें से एक का चयन किया गया।
25 सितंबर को होगी अगली सुनवाई, आयोग से मांगी रिपोर्ट
अदालत ने इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि आईएसएफ का प्रतीक बदलने या दूसरे दल को आवंटित करने से पहले कोई अधिसूचना (Notification) क्यों जारी नहीं की गई।न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने सवाल किया, "मैं यह जानना चाहता हूं कि जिस नई पार्टी को यह प्रतीक दिया गया, क्या वह इतनी खास है कि उसे वही सिम्बल देना पड़ा?" अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह इस संबंध में स्पष्टीकरण के साथ अपनी रिपोर्ट पेश करे। मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार, 25 सितंबर को होगी।