कोलकाता: चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर उठे विवाद के बीच पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रवक्ता देवजीत सरकार ने राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल के आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है। सरकार ने कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर सवाल हैं तो उन्हें उचित आधिकारिक या कानूनी मंच पर उठाया जाना चाहिए, केवल मीडिया में बयान देने से किसी फैसले को एकतरफा नहीं माना जा सकता। यह विवाद उस रिपोर्ट के बाद बढ़ा है जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और मतदाता सूची से जुड़े कदमों पर कई बार आपत्तियां दर्ज की थीं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद स्पष्ट किया कि SIR समेत आयोग के सभी अंतिम फैसले तीनों सदस्यों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
देवजीत सरकार बोले- मतभेद है तो आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आए
खबरों के अनुसार, भाजपा प्रवक्ता देवजीत सरकार ने कपिल सिब्बल के आरोपों पर कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके भीतर किसी विषय पर वास्तविक मतभेद होने की स्थिति में संबंधित आयुक्त आधिकारिक रूप से अपनी बात रख सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को चुनाव आयोग की किसी प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो अदालत या संबंधित संवैधानिक मंच का रास्ता अपनाया जा सकता है। केवल मीडिया में बयान देने से किसी निर्णय की संवैधानिक वैधता तय नहीं होती। देवजीत सरकार की प्रतिक्रिया को भाजपा की ओर से सिब्बल के आरोपों का राजनीतिक जवाब माना जा रहा है। हालांकि, आयोग के भीतर दर्ज कथित आपत्तियों और आयोग की ओर से दी गई सर्वसम्मति की सफाई, दोनों को लेकर सार्वजनिक चर्चा जारी है।
कपिल सिब्बल ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए थे आरोप
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने 23 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने और SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की। सिब्बल का आरोप है कि चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों ने SIR और मतदाता सूची से जुड़े कई फैसलों पर आपत्ति जताई थी। सिब्बल ने इन आरोपों के समर्थन में सामने आई मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि यदि तीन सदस्यीय आयोग में दो आयुक्त किसी फैसले या प्रक्रिया पर आपत्ति जता रहे हैं, तो इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह सिब्बल का राजनीतिक और कानूनी दावा है। चुनाव आयोग ने अलग रुख अपनाते हुए कहा है कि अंतिम निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं।
रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों का दावा
एक विस्तृत रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के कुछ कदमों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता नाम हटाने, मतदाता डेटा के प्रबंधन और SIR से जुड़े विभिन्न पहलुओं से संबंधित थीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटा के कथित केंद्रीकरण और राज्य स्तर के अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच से जुड़े सवाल उठाए थे। पश्चिम बंगाल में मतदाता नामों की बहाली से जुड़े कुछ मामलों में अपील दायर करने के अधिकार को लेकर भी सवाल उठाए जाने का दावा किया गया है।
चुनाव आयोग ने कहा- अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए
विवाद के बीच चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। आयोग के अधिकारियों के अनुसार, SIR समेत सभी निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि किसी आयुक्त द्वारा किसी प्रक्रिया या प्रस्ताव पर सवाल उठाना और अंतिम निर्णय पर असहमति होना एक ही बात नहीं है। अधिकारियों के मुताबिक, आयोग की बैठकों में आयुक्त अपनी राय और आपत्तियां रख सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय आयोग के रूप में लिया जाता है।
SIR को लेकर पहले से जारी है राजनीतिक विवाद
SIR के तहत मतदाता सूचियों को अपडेट करने और पात्र मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रक्रिया के दौरान वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और अपात्र या दोहराए गए नामों को हटाना है। पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर पहले से ही कानूनी और राजनीतिक विवाद चल रहा है। हालिया जानकारी के अनुसार, राज्य में SIR से जुड़े मामलों में लाखों अपीलें लंबित हैं और इस प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी भी रही है। ऐसे में कपिल सिब्बल के आरोप, चुनाव आयोग की सफाई और भाजपा की प्रतिक्रिया के बाद SIR को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है।