कोलकाता: दुर्गा पूजा के दौरान ढाक की गूंज, धुनुची से उठता धुआं और उसी ताल पर थिरकते कदमों का नजारा बंगाल की पूजा को एक अलग ही रंग देता है। जैसे ही संध्या आरती का समय होता है, पूजा पंडालों में भक्त हाथों में धुनुची लेकर ढाक की लय पर नृत्य करते नजर आते हैं। धुएं की खुशबू, ढाक की तेज आवाज और भक्ति में डूबे लोगों का उत्साह मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं, जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से पंडालों तक पहुंचते हैं। खासकर कोलकाता और बंगाल के दूसरे हिस्सों में धुनुची नाच दुर्गा पूजा की पहचान से जुड़ी एक खास परंपरा माना जाता है।

क्या होती है धुनुची?
धुनुची मिट्टी से बना एक खास तरह का पात्र होता है, जिसका इस्तेमाल पूजा के दौरान धूप और सुगंधित सामग्री जलाने के लिए किया जाता है। इसमें आमतौर पर नारियल का छिलका या कोयला जलाया जाता है और उसके ऊपर धूप या दूसरी सुगंधित सामग्री डाली जाती है। इससे निकलने वाले धुएं के बीच श्रद्धालु देवी के सामने धुनुची लेकर नृत्य करते हैं। इसे केवल नृत्य नहीं, बल्कि पूजा और भक्ति का हिस्सा माना जाता है।
धुनुची नाच का क्या है धार्मिक महत्व?
दुर्गा पूजा में धूप और धुनो का इस्तेमाल देवी की आराधना के दौरान किया जाता है। धुनुची से निकलने वाला सुगंधित धुआं पूजा के वातावरण का हिस्सा माना जाता है। इसी परंपरा से धुनुची नाच भी जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार, देवी के सामने धुनुची अर्पित करते हुए नृत्य करना श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का एक तरीका है। हालांकि, अलग-अलग परिवारों और पूजा समितियों में इससे जुड़ी मान्यताओं और परंपराओं में अंतर देखने को मिल सकता है।

ढाक की ताल पर क्यों किया जाता है नृत्य?
धुनुची नाच में ढाक की भूमिका बेहद खास होती है। ढाक की तेज और लयबद्ध आवाज के साथ श्रद्धालु हाथ में धुनुची लेकर नृत्य करते हैं। ढाक की गूंज और धुनुची के धुएं से पंडाल का माहौल भक्तिमय होने के साथ उत्साह से भी भर जाता है। कई जगहों पर लोग एक हाथ में धुनुची लेकर नाचते हैं, जबकि अनुभवी प्रतिभागी एक से ज्यादा धुनुची के साथ भी प्रदर्शन करते हैं। हालांकि, धुनुची में जलती हुई सामग्री होने के कारण नृत्य के दौरान सावधानी बरतना जरूरी होता है।
धुनुची नाच कब किया जाता है?
धुनुची नाच आमतौर पर दुर्गा पूजा के दौरान संध्या आरती या आरती के आसपास किया जाता है। खासकर पूजा के अंतिम दिनों में इसका नजारा बेहद खास होता है। पंडालों में महिलाएं, पुरुष और युवा बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा लेते हैं। कई पूजा समितियां धुनुची नाच प्रतियोगिताओं का भी आयोजन करती हैं। इसमें प्रतिभागी ढाक की ताल के साथ अपने नृत्य और लय का प्रदर्शन करते हैं, जबकि पंडाल में मौजूद लोग उनका उत्साह बढ़ाते हैं।
परंपरा के साथ जुड़ा है उत्सव का रंग
समय के साथ धुनुची नाच केवल पूजा की एक रस्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह दुर्गा पूजा के सामुदायिक उत्सव का भी अहम हिस्सा बन गया है। ढाक की आवाज, धुनुची का धुआं और नृत्य करते श्रद्धालुओं का उत्साह पूजा पंडाल के माहौल को खास बना देता है। यही वजह है कि धुनुची नाच आज भी दुर्गा पूजा की उन परंपराओं में शामिल है, जो भक्ति, संगीत, नृत्य और सामूहिक उत्सव को एक साथ जोड़ती हैं।