कोलकाता: कोलकाता की दुर्गा पूजा में इस बार बागुईआटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब का पंडाल खास आकर्षण का केंद्र बनने जा रहा है। क्लब अपने 73वें दुर्गा पूजा आयोजन के लिए ‘कोलाज’ थीम पर पंडाल तैयार कर रहा है। इस पंडाल में हजारों किलोग्राम पुराने और बेकार अखबारों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कलाकार सोमनाथ तमली की संकल्पना पर यह पंडाल आकार ले रहा है। अखबारों के पुराने पन्ने, तस्वीरें और अलग-अलग टेक्सचर इसकी संरचना का हिस्सा होंगे। पूरी कलाकृति के जरिए कई अलग-अलग कहानियों को एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि यह पंडाल इस बार खास चर्चा में है।
अखबार के पन्नों से गढ़ी जाएगी बड़ी कहानी
‘कोलाज’ थीम का आधार अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर एक बड़ी तस्वीर तैयार करना है। इसी विचार को पंडाल की पूरी संरचना में उतारा जा रहा है। पुराने अखबारों के पन्नों और तस्वीरों को अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। कई तरह के टेक्सचर को मिलाकर पंडाल को एक अलग दृश्य रूप दिया जाएगा। क्लब के सचिव स्नेहाशीष देबनाथ के मुताबिक, अलग-अलग हिस्से मिलकर एक बड़े अर्थ को सामने लाएंगे। यहां अखबार सिर्फ सजावट का सामान नहीं बल्कि पूरी कहानी का माध्यम बनेंगे। इस तरह बेकार समझे जाने वाले कागजों को एक नई कलात्मक भूमिका मिलेगी।
‘कोलाज’ का कनेक्शन देवी दुर्गा की कथा से
पंडाल की ‘कोलाज’ अवधारणा को देवी दुर्गा की पौराणिक कथा से भी जोड़ा गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा के स्वरूप के निर्माण में विभिन्न देवी-देवताओं की शक्तियों का योगदान रहा। अलग-अलग शक्तियां और अस्त्र-शस्त्र मिलकर देवी के पूर्ण स्वरूप का निर्माण करते हैं। पंडाल में इसी विचार को अलग-अलग हिस्सों के जरिए दिखाने की कोशिश की जाएगी। अकेले में हर हिस्सा सीमित नजर आएगा, लेकिन साथ आने पर पूरी कहानी सामने आएगी। कलाकारों ने इसी विचार को ‘कोलाज’ की मूल भावना से जोड़ा है। इसके जरिए सामूहिक शक्ति और एकजुटता का संदेश भी सामने आएगा।
टैगोर से नेताजी तक, दिग्गजों को श्रद्धांजलि
पंडाल में बंगाल और भारत की कई प्रमुख विभूतियों को भी जगह दी जाएगी। इसमें रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सत्यजीत रे जैसे नाम शामिल हैं। वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस को भी इस कलात्मक प्रस्तुति में शामिल किया जाएगा। इसके अलावा मातंगिनी हाजरा, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद जैसी विभूतियां भी पंडाल का हिस्सा होंगी। इन व्यक्तित्वों के योगदान को पुराने अखबारों और तस्वीरों के माध्यम से दर्शाने की कोशिश होगी। इस तरह पंडाल में बंगाल की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत की झलक मिलेगी। अलग-अलग व्यक्तित्वों को एक ही कलाकृति में जोड़कर सामूहिक विरासत को सामने रखा जाएगा।
साइकिल से अखबार पहुंचने का दौर भी दिखेगा
पंडाल में अखबारों की पुरानी दुनिया को भी खास अंदाज में दिखाया जाएगा। इसमें अखबारों के बड़े पैमाने पर परिवहन और साइकिल से उनके वितरण के दृश्य शामिल होंगे। यह उस दौर की याद दिलाएगा जब सुबह का अखबार लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा हुआ करता था। घर-घर साइकिल से अखबार पहुंचाने की तस्वीर भी पंडाल की कहानी का हिस्सा होगी। पुराने अखबारों को ही पंडाल में इस्तेमाल करने से यह प्रस्तुति और अधिक जुड़ाव पैदा करेगी। बीते दौर की अखबार संस्कृति को कला के जरिए फिर से सामने लाया जाएगा। इसके जरिए लोगों को प्रिंट मीडिया के उस दौर की झलक भी देखने को मिलेगी।
प्रिंट मीडिया से डिजिटल मीडिया तक का सफर
पंडाल की थीम सिर्फ पुराने अखबारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें खबरों और सूचनाओं के बदलते माध्यमों को भी दिखाने की कोशिश की गई है। कभी अखबार समाचार का सबसे प्रमुख माध्यम हुआ करता था। लोग खबर पढ़ने के बाद अखबारों को संभालकर भी रखते थे। समय के साथ सूचना साझा करने का तरीका बदला और डिजिटल मीडिया तेजी से सामने आया। पंडाल इसी बदलाव को प्रिंट से डिजिटल तक के सफर के रूप में प्रस्तुत करेगा। पुराने अखबारों को कला में बदलकर यह बदलाव एक अलग दृश्य रूप में दिखाई देगा।
बेकार अखबारों को मिली नई भूमिका
इस पंडाल की एक खास बात पुराने अखबारों का पुनर्चक्रित इस्तेमाल भी है। हजारों किलोग्राम बेकार अखबारों को फेंकने के बजाय उन्हें पंडाल की संरचना में शामिल किया जा रहा है। इससे पुराने कागजों को एक नई उपयोगिता मिल रही है। अखबारों के जरिए पढ़ने और समाचार साझा करने की बदलती संस्कृति को भी याद किया जाएगा। जो अखबार कभी रोज की खबरों का प्रमुख माध्यम थे, वही अब कला का हिस्सा बन रहे हैं। यह पूरी प्रक्रिया पुराने और नए दौर के बीच एक कड़ी तैयार करती है। पंडाल के जरिए रीसाइक्लिंग और रचनात्मकता का मेल भी देखने को मिलेगा।
एक पंडाल में इतिहास, समाज और बदलता मीडिया
‘कोलाज’ थीम वाला यह पंडाल कई अलग-अलग पहलुओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश है। इसमें देवी दुर्गा की पौराणिक कथा से लेकर बंगाल की महान विभूतियों तक को जगह दी जाएगी। इसके साथ अखबार संस्कृति और प्रिंट से डिजिटल मीडिया तक के बदलाव को भी दिखाया जाएगा। हजारों किलोग्राम पुराने अखबार इस पूरी कहानी को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी होंगे। अलग-अलग समय, व्यक्तित्व और विचार एक ही कलाकृति में नजर आएंगे। इस तरह पंडाल सिर्फ पूजा की सजावट नहीं बल्कि एक बड़े दृश्य कथानक के रूप में सामने आएगा। दुर्गा पूजा के दौरान यहां आने वाले लोगों को कला के साथ इतिहास और बदलती सूचना संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी।