कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति को करीब से देखने का भी मौका देती है। इस बार पूर्व पुटियारी प्रगति संघ की दुर्गा पूजा में बांग्ला साहित्य के दिग्गज साहित्यकार और कवि सुकुमार राय की कल्पनाओं को खास अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। उनकी कालजयी रचना ‘आबोल ताबोल’ से जुड़े किरदार पूजा मंडप की सजावट का मुख्य आकर्षण बने हुए हैं। मंडप में पहुंचते ही ऐसा महसूस होता है, जैसे किताबों के पन्नों से निकलकर ये काल्पनिक पात्र लोगों के सामने जीवंत हो गए हों। रंग-बिरंगे डिजाइन और कलात्मक प्रस्तुति के जरिए बचपन की उन यादों को दोबारा सामने लाने की कोशिश की गई है, जिनसे बंगाल की कई पीढ़ियां जुड़ी रही हैं।
बाबूराम सापुड़े से लेकर हुक्को-मुखो ह्यांगला तक
सुकुमार राय की रचनाओं में मौजूद कई अनोखे और हास्यपूर्ण किरदार आज भी पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। बाबूराम सापुड़े, कुमड़ो पटाश और हुक्को-मुखो ह्यांगला जैसे पात्रों को इस पूजा मंडप में खास जगह दी गई है। इन किरदारों की अपनी अलग पहचान और अपनी अलग दुनिया है, जो बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी आकर्षित करती है। मंडप की कलाकृति में इन पात्रों को इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि लोगों को अपने बचपन की कहानियां और किताबें याद आने लगती हैं। खास बात यह है कि यह प्रस्तुति सिर्फ पुरानी पीढ़ी को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई, बल्कि नई पीढ़ी को भी सुकुमार राय की रचनात्मक दुनिया से परिचित कराने की कोशिश की गई है।
72वें वर्ष में खास रही पूजा की थीम
पूर्व पुटियारी प्रगति संघ इस बार अपनी पूजा के 72वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इसी खास मौके पर कलाकार सोमनाथ दास ने सुकुमार राय की रचनाओं को एक बेहद रंगीन और जीवंत रूप देने की कोशिश की है। कलाकार ने साहित्य के काल्पनिक किरदारों को पूजा पंडाल की कला से जोड़ते हुए एक ऐसी दुनिया तैयार की है, जहां कहानी, कल्पना और दृश्य कला एक साथ नजर आती है। मंडप की सजावट में सुकुमार राय की रचनाओं की झलक अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। इससे पूजा पंडाल सिर्फ देखने की जगह नहीं, बल्कि साहित्य और कला को महसूस करने का अनुभव भी देता है।
‘गप्पो आर गप्पो’ यानी कहानी ही कहानी
इस बार पूर्व पुटियारी प्रगति संघ की पूजा की थीम ‘गप्पो आर गप्पो’ रखी गई है। इसका अर्थ है- कहानी ही कहानी। इसी विचार के तहत सुकुमार राय की कल्पनाओं और उनके अनोखे पात्रों को पूजा मंडप की पूरी प्रस्तुति का हिस्सा बनाया गया है। थीम के जरिए लोगों को बचपन की कहानियों, बांग्ला साहित्य और कल्पनाओं की उस दुनिया में वापस ले जाने का प्रयास किया गया है, जहां हर किरदार अपने आप में एक कहानी कहता है। पूजा मंडप में मौजूद कलाकृतियां इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं।
हास्य और व्यंग्य में छिपा समाज का आईना
सुकुमार राय की रचनाओं की खासियत सिर्फ उनका हास्य और कल्पना नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपा व्यंग्य भी है। उनके कई किरदार और कहानियां समाज की अलग-अलग स्थितियों और इंसानी व्यवहार पर मजेदार अंदाज में टिप्पणी करती हैं। यही वजह है कि उनकी रचनाएं बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ बड़ों को भी सोचने का मौका देती हैं। पूर्व पुटियारी प्रगति संघ की पूजा में इन्हीं पहलुओं को दृश्य रूप देने की कोशिश की गई है। ऐसे में यह आयोजन सुकुमार राय को श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ उनकी रचनाओं की सामाजिक प्रासंगिकता को भी सामने लाता है।
नई पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने की कोशिश
आज के डिजिटल दौर में नई पीढ़ी का बचपन किताबों और पारंपरिक साहित्य से पहले की तुलना में अलग हो गया है। ऐसे में सुकुमार राय के किरदारों को दुर्गा पूजा जैसे बड़े सार्वजनिक आयोजन के जरिए सामने लाना साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक अलग प्रयास है। पूजा मंडप में आने वाले बच्चे इन किरदारों को करीब से देख सकते हैं और उनके पीछे छिपी कहानियों के बारे में जानने की उत्सुकता भी पैदा हो सकती है। वहीं, बड़ों के लिए यह प्रस्तुति पुराने बचपन और पढ़ी गई कहानियों की यादें ताजा करने का माध्यम बन रही है।
किताबों के पन्नों से पंडाल तक पहुंची कल्पना
पूर्व पुटियारी प्रगति संघ का यह पूजा मंडप इस बात की मिसाल पेश करता है कि साहित्य को किस तरह कला और उत्सव के साथ जोड़ा जा सकता है। ‘आबोल ताबोल’ के काल्पनिक संसार को पंडाल में उतारकर कलाकार सोमनाथ दास ने बचपन, साहित्य और समाज के बीच एक खूबसूरत संबंध बनाने की कोशिश की है। रंगीन किरदारों और कल्पनाशील सजावट के बीच यहां आने वाले लोगों को एक साथ मनोरंजन, साहित्य और पुरानी यादों का अनुभव मिलता है। यही वजह है कि ‘गप्पो आर गप्पो’ की यह थीम इस बार पूजा में आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती है।