कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और पारिवारिक मिलन का प्रतीक है। महालया के साथ ही बंगाल में उत्सव का माहौल बनने लगता है। ढाक की आवाज, धूप की खुशबू और पूजा की तैयारियों के बीच देश-विदेश में रहने वाले लोग भी अपने घर लौटकर परिवार के साथ दुर्गोत्सव मनाते हैं।
कोलकाता की दुर्गापूजा की अपनी अलग पहचान
कोलकाता की दुर्गापूजा देश-दुनिया में अपनी खास पहचान रखती है। एक ओर जहां शहर में भव्य थीम आधारित बारोवारी पूजा देखने को मिलती है, वहीं दूसरी ओर आज भी कई बनियादी घरों में पीढ़ियों पुरानी परंपराओं के साथ मां दुर्गा की पूजा की जाती है। इन पूजा आयोजनों से परिवारों का इतिहास, धार्मिक रीति-रिवाज और भावनाएं जुड़ी हुई हैं।
चार दिन नहीं, 20 दिनों तक होती है मां की आराधना
कोलकाता के टंगरा इलाके की शील लेन स्थित दास बाड़ी की दुर्गापूजा इन पारंपरिक पूजाओं से भी अलग है। यहां मां दुर्गा की आराधना सिर्फ चार दिनों तक नहीं, बल्कि करीब 15 से 20 दिनों तक चलती है। परिवार के मुताबिक, पूजा की शुरुआत कृष्ण नवमी की आद्या नक्षत्र तिथि से होती है और यह शुक्ल नवमी तक चलती है। इसके बाद शुक्ल दशमी को विसर्जन किया जाता है।
सात कल्पों के विधान के अनुसार पूजा
परिवार की ओर से बताया गया है कि यहां शास्त्रों में वर्णित दुर्गापूजा के सात कल्पों के विधान का पालन किया जाता है। पूजा के लंबे क्रम के दौरान हर दिन अलग-अलग आचार और उपाचार होते हैं। तिथि के अनुसार मां को चढ़ाए जाने वाले पूजा सामग्री और भोग में भी बदलाव होता है।
हर दिन सुबह पूजा, शाम को आरती
पूजा के दौरान हर दिन सुबह से मां दुर्गा की आराधना शुरू होती है। शाम को विधि-विधान के साथ आरती की जाती है। मां को अलग-अलग तरह की मिठाइयां और फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के शुरुआती दिनों में मुख्य रूप से मिठाई और फलों का भोग लगाया जाता है, जबकि षष्ठी से दशमी तक नैवेद्य में विभिन्न प्रकार के व्यंजन शामिल होते हैं।
षष्ठी से दशमी तक विशेष अनुष्ठान
महालय के बाद पूजा का माहौल और अधिक विशेष हो जाता है। षष्ठी के दिन मां का बोधन किया जाता है। सप्तमी को परंपरा के अनुसार नवपत्रिका यानी कोलाबौ स्नान की रस्म होती है। अष्टमी को संधि पूजा और नवमी को विशेष पूजा-अनुष्ठान किए जाते हैं। परिवार की परंपरा के अनुसार बलि और हवन की रस्म भी निभाई जाती है।
दुर्गापूजा बनती है परिवार के मिलन का अवसर
दास बाड़ी की इस लंबी चलने वाली पूजा का एक अहम पहलू पारिवारिक मिलन भी है। साल के बाकी समय परिवार के कई सदस्य काम के सिलसिले में अलग-अलग जगहों पर रहते हैं। लेकिन दुर्गापूजा के दौरान सभी सदस्य घर लौटते हैं और एक छत के नीचे इकट्ठा होते हैं। इस दौरान पूजा के साथ भोजन, बातचीत और पारिवारिक कार्यक्रमों का दौर चलता है।
करीब 20 वर्षों से इसी परंपरा में हो रही पूजा
परिवार के मुताबिक, पिछले करीब 20 वर्षों से इस विशेष परंपरा के अनुसार दुर्गापूजा आयोजित की जा रही है। पूजा के अधिकांश अनुष्ठान परिवार के सदस्य खुद करते हैं। ऐसे में यह पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि परिवार के लिए भावनात्मक जुड़ाव और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का हिस्सा बन चुकी है।
आधुनिकता के बीच पुरानी परंपरा का संरक्षण
जहां कोलकाता की दुर्गापूजा हर साल नए थीम, नई तकनीक और भव्य सजावट के साथ बदल रही है, वहीं टंगरा की शील लेन दास बाड़ी में आज भी पारंपरिक पूजा का स्वरूप कायम है। करीब 15 से 20 दिनों तक चलने वाली यह दुर्गापूजा धार्मिक आस्था के साथ-साथ पारिवारिक एकता, इतिहास और बंगाल की पुरानी सांस्कृतिक परंपरा को भी जीवित रखे हुए है।
टंगरा की दुर्गापूजा बनी अनोखी मिसाल
कुल मिलाकर, टंगरा की शील लेन स्थित दास बाड़ी की दुर्गापूजा कोलकाता की बनियादी पूजा परंपरा का एक अलग और खास उदाहरण है। लंबी अवधि तक मां दुर्गा की आराधना, विशेष धार्मिक अनुष्ठान और परिवार के सदस्यों का एक साथ आना इस पूजा को शहर की अन्य पारंपरिक पूजाओं से अलग पहचान देता है।